UPSC PYQs

Prelims, Mains & Optional PYQs

UPSC Notes

Comprehensive & Short Notes

Q. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नैतिक आयामों का विश्लेषण कीजिए, जिसमें बोलने की स्वतंत्रता और घृणा फैलाने वाले भाषण के बीच की सीमाएं और इस मौलिक अधिकार का प्रयोग करने से जुड़ी जिम्मेदारियां शामिल हैं। (150 शब्द, 10 अंक)

December 7, 2023

GS Paper IVEthics, Integrity and Aptitude

उत्तर:

दृष्टिकोण:

  • प्रस्तावना: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार के रूप में परिभाषित कीजिए।  
  • मुख्य विषयवस्तु:
    • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और घृणास्पद भाषण के बीच की सीमाओं और इससे जुड़ी जिम्मेदारियों सहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विभिन्न नैतिक आयामों का वर्णन कीजिए।
    • विभिन्न कमियों का उल्लेख कीजिए।
    • आगे की राह लिखिए।
  • निष्कर्ष: सकारात्मक नोट पर निष्कर्ष निकालिए।

 

प्रस्तावना:

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है जो विभिन्न माध्यमों के माध्यम से विचारों, राय, मत, विश्वास और दृष्टिकोण की अप्रतिबंधित अभिव्यक्ति की अनुमति देता है।

मुख्य विषयवस्तु:

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नैतिक आयाम:

  • मूल अधिकारों और जिम्मेदारियों को संतुलित करना: अभिव्यक्ति की नैतिक स्वतंत्रता के लिए दूसरों पर प्रभाव को ध्यान में रखते हुए जिम्मेदार अभ्यास की आवश्यकता होती है। अनुच्छेद 19(2) सामाजिक सद्भाव बनाए रखने और व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा के लिए घृणास्पद भाषण सहित अन्य अनुचित सामग्रियों हेतु उचित प्रतिबंध निर्धारित करता है।

8.1

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और घृणास्पद भाषण के बीच की सीमाएँ: इन सीमाओं को परिभाषित करने में नैतिक विचार सामने आते हैं। भारत का आईपीसी धारा 153A, 153B, 295A और 505 के तहत घृणास्पद भाषण को अपराध मानता है। यह धर्म, नस्ल, जाति या समुदाय के आधार पर वैमनस्य को बढ़ावा देने वाले भाषण पर रोक लगाता है।
  • कमजोर समूहों की सुरक्षा: भारत का कानून, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की तरह, घृणास्पद भाषण और भेदभाव के खिलाफ कानूनी सुरक्षा प्रदान करके हाशिए पर रहने वाले समुदायों की सुरक्षा करता है व उनकी सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करता है।
  • हानि का सिद्धांत: भारत में, घृणा फैलाने वाले भाषण को कानूनी प्रावधानों (जैसे आईपीसी) के तहत प्रतिबंधित किया गया है। इन घृणास्पद भाषणों से सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचने के साथ व्यक्तियों एवं समुदायों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, ऐसे में कानूनी प्रावधान महत्वपूर्ण हैं।
  • सामाजिक एकता को बढ़ावा देना: नैतिक आयामों में सम्मानजनक संवाद के माध्यम से एकता को बढ़ावा देना शामिल है। भारत की राष्ट्रीय एकता परिषद जैसी पहल नफरत फैलाने वाले भाषण व सांप्रदायिक तनाव को संबोधित करती है और विविध लोगों के बीच आपसी समझ को बढ़ावा देती है।

कमियां

  • घृणास्पद भाषण को परिभाषित करने में अस्पष्टता: घृणास्पद भाषण को परिभाषित करना अस्पष्ट है, जिससे व्यक्तिपरक व्याख्याएं और प्रवर्तन संबंधी खामियां पैदा होती हैं।
  • ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म और साइबर घृणा: डिजिटल क्षेत्र में घृणा फैलाने वाले भाषण को विनियमित करना कई चुनौतियां पैदा करता है क्योंकि यह राष्ट्रीय सीमाओं को पार करता है, जिससे एक विशिष्ट कानूनी ढांचे के भीतर इसे संबोधित करना मुश्किल हो जाता है।
  • स्वतंत्रता और सेंसर को संतुलित करना जटिल है, क्योंकि नफरत फैलाने वाले भाषण का मुकाबला करने से अनजाने में वैध असहमति और विविध राय को दबाया जा सकता है।
  • राजनीतिक हस्तक्षेप: नैतिक चिंताएँ तब पैदा होती हैं जब घृणास्पद भाषण को एक राजनीतिक रणनीति के रूप में नियोजित किया जाता है, अर्थात व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ हेतु विभाजनकारी बयानबाजी को बढ़ावा देने के लिए खामियों और शक्ति की गतिशीलता का फायदा उठाया जा सकता है।

आगे की राह

  • कानूनी ढांचे को मजबूत करना: घृणास्पद भाषण के उभरते रूपों को प्रभावी ढंग से संबोधित करना और उनके मजबूत प्रवर्तन को सुनिश्चित करना जरूरी है।
  • खुले और सम्मानजनक संवाद को प्रोत्साहित करना: विभिन्न समुदायों के बीच सहानुभूति, सहिष्णुता और एक समावेशी समाज विकसित करना चाहिए जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को महत्व देता है और घृणास्पद भाषण को अस्वीकार करता है।
  • ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म और सोशल मीडिया कंपनियों के साथ मिलकर कार्य करें: जिम्मेदार सामग्री मॉडरेशन प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए प्रभावी तंत्र विकसित करना।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और ज्ञान-साझाकरण में संलग्न होना: विश्व स्तर पर घृणास्पद भाषण का मुकाबला करने के लिए।

निष्कर्ष:

स्वतंत्रता और जिम्मेदारी को संतुलित करते हुए, भारतीय संविधान की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी एक आशावादी भविष्य का मार्ग प्रशस्त करती है जहां खुली बातचीत और समावेशी प्रवचन पनपते हैं जबकि घृणास्पद भाषण पर उचित रूप से अंकुश लगाया जाता है।

 

Analyze the ethical dimensions of freedom of expression, including the boundaries between freedom of speech and hate speech, and the responsibilities associated with exercising this fundamental right. (additional) in hindi

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Free Counselling for UPSC Aspirants

Connect with our experts and take the right next step.

Expert Guidance
Personalized Strategy
100% Free

Book Your Free Session

NEED ASSISTANCE?

Request a Callback

Our counsellor will connect with you and help you choose the right course and centre.

  • Expert Guidance
  • Course & Fee Information
  • Quick Callback Support

Request a Callback

Books
UPSC PYQs
UPSC Notes
Current Affairs
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.