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Q. संसद में प्रतिस्पर्द्धी व्यवधानों के विधायी प्रक्रिया और लोकतंत्र की आधारशिला के रूप में संस्था की भूमिका पर पड़ने वाले प्रभाव का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। इसकी प्रभावशीलता को पुनर्स्थापित करने के उपाय सुझाएँ। (15 अंक, 250 शब्द)

January 2, 2025

GS Paper II

प्रश्न की मुख्य माँग

  • लोकतंत्र की आधारशिला के रूप में संसद में प्रतिस्पर्धी व्यवधानों के विधायी प्रक्रिया पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण कीजिए।
  • लोकतंत्र की आधारशिला के रूप में संसद की भूमिका पर प्रतिस्पर्धात्मक व्यवधानों के प्रभाव का विश्लेषण कीजिए।
  • इसकी प्रभावशीलता को बहाल करने के उपाय सुझाइये।

उत्तर

लोकतंत्र की आधारशिला के रूप में संसद प्रतिनिधित्व, विचार-विमर्श और विधि निर्माण के कार्यों को सुगम बनाती है। बार-बार स्थगन और वॉकआउट सहित अन्य प्रतिस्पर्धी व्यवधानों ने इसकी विधायी दक्षता और जवाबदेही में बाधा उत्पन्न की है। उदाहरण के लिए, शीतकालीन सत्र 2023 में इसकी कार्य क्षमता में 33% की कमी देखी गई, जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों को बनाए रखने और विधायी अखंडता को बहाल करने के लिए संस्थागत सुधार की तत्काल आवश्यकता को उजागर करता है।

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विधायी प्रक्रिया पर प्रतिस्पर्धी व्यवधानों का प्रभाव

  • कानून निर्माण में कमी: प्रतिस्पर्धात्मक व्यवधानों के कारण कार्यवाही स्थगित हो जाती है, महत्त्वपूर्ण विधेयकों में देरी होती है और परिणामस्वरूप सीमित जांँच और बहस के साथ जल्दबाजी में विधेयक पारित हो जाते हैं।
  • विधायी गुणवत्ता से समझौता: व्यवधान के दौरान जल्दबाजी में की गई चर्चाओं के परिणामस्वरूप अनुचित प्रकार से तैयार किए गए कानून निर्मित होते हैं, जिनमें समावेशिता और दूरदर्शिता का अभाव होता है, जिससे दीर्घकालिक शासन व्यवस्था कमजोर होती है।
  • प्रश्नकाल में बाधा: व्यवधानों के कारण प्रश्नकाल बाधित होता है, जिससे जवाबदेही कम होती है क्योंकि मंत्री नीति कार्यान्वयन और शासन संबंधी चुनौतियों पर निगरानी से बच जाते हैं। 
    • उदाहरण के लिए: वर्ष 2021 के मानसून सत्र में, 70% से अधिक प्रश्नकाल बाधित रहा, जिससे कोविड-19 प्रबंधन पर चर्चा कम हुई।
  • संसदीय प्रक्रियाओं का हनन: बार-बार होने वाले व्यवधानों से प्रक्रियागत निष्पक्षता  क्षीण  होती है, महत्त्वपूर्ण विधेयकों की संसदीय समिति द्वारा उचित समीक्षा नहीं हो पाती है और नियंत्रण व संतुलन का सिद्धांत कमजोर हो जाता है।
  • जन विश्वास में कमी: विधायी निष्क्रियता, जनता में निराशा को बढ़ाती है, तथा राष्ट्रीय हितों की प्रभावी ढंग से सेवा करने की संस्था की क्षमता में विश्वास को खत्म करती है।

लोकतंत्र की आधारशिला के रूप में संस्थानों पर प्रतिस्पर्धी व्यवधान का प्रभाव

  • लोकतांत्रिक मानदंडो का  क्षीण होना: निरंतर व्यवधान, विचार-विमर्श मंच के रूप में संसद की भूमिका को कमज़ोर करते हैं, राजनीतिक बहसों को सड़कों और मीडिया तक ले जाते हैं और संस्थागत अधिकार को कमज़ोर करते हैं। 
    • उदाहरण के लिए: दिल्ली अध्यादेश विधेयक (2023) के लिए संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन हुए, जो विधायी प्रक्रियाओं में कम होते विश्वास को दर्शाता है।
  • बहस में शिष्टाचार की कमी: सरकार और विपक्ष के बीच कटुता, द्वेषपूर्ण व्यवहार को बढ़ावा देती है। तर्कपूर्ण बहस की जगह आक्रामकता ने ले ली है, जिससे संसद की मर्यादा को क्षतिग्रस्त होती है। 
    • उदाहरण के लिए: वर्ष 2023 के बजट सत्र में सांसदों के बीच हाथापाई की घटना देखी गई, जिससे राजकोषीय नीति चर्चा पर असर पड़ा।
  • विपक्ष का हाशिए पर जाना: व्यवधान सत्तारूढ़ दलों को आम सहमति बनाने से रोकता है, संसद की समावेशी प्रकृति को कमजोर करता है और अल्पसंख्यकों के हितों को दरकिनार करने में मदद करते हैं। 
    • उदाहरण के लिए: वर्ष 2023 के शीतकालीन सत्र में, वॉकआउट के कारण हुये स्थगनों के परिणामस्वरूप विपक्ष की भागीदारी के बिना प्रमुख विधेयक पारित किए गए थे।
  • सम्मानपूर्ण नेतृत्व में कमी: व्यवधानों के दौरान सक्रिय नेतृत्व की कमी संसद के महत्त्व को कम करती है, जिससे रचनात्मक लोकतांत्रिक नेतृत्व के लिए एक मंच के रूप में संसद की प्रतिष्ठा कम हो जाती है। 
    • उदाहरण के लिए: नेहरू की निरंतर भागीदारी के विपरीत, प्रमुख बहसों के दौरान वरिष्ठ नेताओं की सीमित भागीदारी संसदीय प्रतिबद्धता में गिरावट का संकेत देती है।
  • जनता की धारणा पर प्रभाव: बार-बार व्यवधान से जनता में निराशा बढ़ती है, संसद को अप्रभावी माना जाता है, तथा लोकतांत्रिक आधारशिला के रूप में इसकी प्रतिष्ठा और प्रासंगिकता कम होती है।

संसद की प्रभावशीलता बहाल करने के उपाय

  • शिष्टाचार का सख्ती से पालन: व्यवधानों को रोकने के लिए नियमों को लागू करना और उनका लगातार पालन करना चाहिए जिनमें अव्यवस्थित आचरण के लिए निलंबन या निष्कासन का प्रावधान हो। 
    • उदाहरण के लिए: शीतकालीन सत्र के दौरान व्यवधानकारी सांसदों को 2023 में निलंबित करने से महत्त्वपूर्ण आर्थिक मुद्दों पर रचनात्मक बहस संभव हुई।
  • द्विदलीय संवाद को संस्थागत बनाना: विवादास्पद मुद्दों को सुलझाने के लिए सरकार और विपक्ष के बीच सत्र-पूर्व संवाद के लिए मंच तैयार करने चाहिए।
    • उदाहरण के लिए: वर्ष 2022 के मानसून सत्र से पहले हुई सर्वदलीय बैठक ने कृषि सुधारों पर विवादों को सुलझाने में मदद की।
  • विधायी प्रक्रियाओं में सुधार: महत्त्वपूर्ण विधेयकों पर बहस के लिए निश्चित समय स्लॉट आवंटित करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी दलों की बातों पर ध्यान दिया जाए।
    • उदाहरण के लिए: यू.के. की संसद द्वारा बैकबेंच बिजनेस कमेटियों का उपयोग, गैर-सरकारी सदस्यों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर बहस सुनिश्चित करता है।
  • सार्वजनिक जवाबदेही को बढ़ाना: कार्यवाही का व्यापक रूप से प्रसारण करना और उपस्थिति, भागीदारी और मतदान रिकॉर्ड को सार्वजनिक रूप से सुलभ बनाना। 
    • उदाहरण के लिए: वर्ष 2019 के बाद सांसदों के प्रदर्शन की रिपोर्ट के प्रकाशन से संसदीय योगदान के बारे में मतदाताओं की जानकारी बढ़ी है।
  • सांसदों के लिए क्षमता निर्माण: विधायी प्रक्रियाओं और बहस तकनीकों पर नियमित कार्यशालाओं से संसदीय योगदान की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। 
    • उदाहरण के लिए: वर्ष 2019 में नव निर्वाचित सांसदों के लिए अभिमुखीकरण कार्यक्रमों ने बहसों में उनकी भागीदारी और प्रभावशीलता को बढ़ावा दिया।

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संसद की प्रभावशीलता को बहाल करने के लिए सर्वदलीय चर्चा के माध्यम से आम सहमति को बढ़ावा देना, रचनात्मक बहस के लिए संसदीय समितियों की भूमिका को बढ़ाना और व्यवधानों के विरुद्ध सख्त नियम लागू करना आवश्यक है। भविष्य के दृष्टिकोण में पारदर्शिता और नागरिक सहभागिता के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाया जा सकता है और नैतिक राजनीतिक व्यवहार के लिए सुधार लागू किये जा सकते हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने से यह सुनिश्चित होगा कि संसद शासन और लोकतंत्र का एक मजबूत स्तंभ बनी रहे।

Critically analyze the impact of competitive disruptions in Parliament on the legislative process and the institution’s role as the cornerstone of democracy. Suggest measures to restore its effectiveness. in hindi

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