प्रश्न की मुख्य माँग
- अनाज-केंद्रित खाद्य सुरक्षा ने भारत को उर्वरक के जाल में कैसे फँसाया
- दलहन आत्मनिर्भरता मिशन की भूमिका
- दलहन आत्मनिर्भरता मिशन की सीमाएँ।
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उत्तर
निरंतर धान-गेहूँ की कृषि और उर्वरक सब्सिडी द्वारा संचालित भारत का खाद्यान्न-केंद्रित खाद्य सुरक्षा मॉडल, हालाँकि कृषि उत्पादन बढ़ाने में सफल रहा है, लेकिन इसने एक “उर्वरक जाल” भी उत्पन्न कर दिया है। यह जाल मृदा क्षरण (मृदा की गुणवत्ता में गिरावट), पारिस्थितिकी असंतुलन और इनपुट (लागत साधनों) पर बढ़ती निर्भरता से चिह्नित है, जो दीर्घकालिक स्थिरता और लचीलेपन (लचीले कृषि तंत्र) के लिए खतरा उत्पन्न कर रहा है।
भारतीय कृषि में उर्वरक जाल
- सब्सिडी की विकृति: भारी उर्वरक सब्सिडी ने यूरिया के अत्यधिक उपयोग को बढ़ावा दिया, विशेष रूप से धान और गेहूँ की कृषि में, जिससे संतुलित पोषक तत्त्वों के अनुप्रयोग (संतुलित पोषण चक्र) में विकृति आई।
- उदाहरण: भारत सालाना उर्वरक सब्सिडी पर लगभग ₹2 लाख करोड़ खर्च करता है।
- एकल-फसल (मोनोकल्चर) का विस्तार: MSP समर्थित धान-गेहूँ की एकल-फसल प्रणाली ने उत्पादकता के स्तर को बनाए रखने के लिए रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता बढ़ा दी है।
- उदाहरण: पंजाब-हरियाणा का हरित क्रांति क्षेत्र अत्यधिक नाइट्रोजन-गहन खेती को दर्शाता है।
- मृदा क्षरण: अत्यधिक उर्वरक उपयोग ने मृदा के कार्बनिक पदार्थों को समाप्त कर दिया है और प्राकृतिक पोषक तत्त्व धारण करने की क्षमता को कम कर दिया है, जिससे दीर्घकालिक फसल पैदावार पर खतरा मंडरा रहा है।
- प्रदूषण के कारण नुकसान: उर्वरकों की एक बड़ी मात्रा फसलों द्वारा अवशोषित होने के बजाय बहकर, रिसकर (निस्यन्दन) और उत्सर्जन के माध्यम से नष्ट हो जाती है।
- उदाहरण: उर्वरक सब्सिडी का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा प्रभावी रूप से प्रदूषण में नष्ट हो जाता है।
- आयात निर्भरता: खाद्यान्न-केंद्रित कृषि ने आयातित फॉस्फेटिक उर्वरकों और ईंधन से जुड़ी यूरिया निर्माण प्रक्रियाओं पर निर्भरता बढ़ा दी है।
दलहन आत्मनिर्भरता मिशन की भूमिका
- फसल विविधीकरण: यह मिशन धान-गेहूँ की एकल-फसल प्रणाली से हटकर दलहन की खेती की ओर बढ़ने को प्रोत्साहित करता है।
- उदाहरण: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM)-दलहन के तहत अरहर, उड़द और मूँग को बढ़ावा देना।
- नाइट्रोजन स्थिरीकरण: दालें प्राकृतिक रूप से वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मृदा में स्थिर करती हैं, जिससे मृदा की उर्वरता में सुधार होता है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है, जैसा कि ICAR द्वारा रेखांकित किया गया है।
- जल दक्षता: धान की खेती की तुलना में दालों को काफी कम जल की आवश्यकता होती है, जिससे जल-तनाव वाले क्षेत्रों में स्थिरता में सुधार होता है।
- उदाहरण: पीएम-कुसुम (PM-KUSUM) से जुड़े विविधीकरण प्रयासों के तहत शुष्क भूमि क्षेत्रों में मोटे अनाज (मिलेट्स) और दालों को बढ़ावा दिया गया।
- आयात में कमी: घरेलू दलहन उत्पादन अधिक होने से आयात पर निर्भरता कम होती है और पोषण सुरक्षा में सुधार होता है।
- उदाहरण: भारत ने हाल के वर्षों में 27 मिलियन टन से अधिक का रिकॉर्ड दलहन उत्पादन हासिल किया है।
- जलवायु लचीलापन: दलहन आधारित फसल प्रणालियाँ मृदा के स्वास्थ्य में सुधार करती हैं और जलवायु परिवर्तनशीलता के खिलाफ लचीलापन बढ़ाती हैं।
मिशन की सीमाएँ
- एमएसपी (MSP) का झुकाव: खरीद प्रणालियाँ अभी भी दालों की तुलना में धान और गेहूँ के पक्ष में हैं, जिससे किसान इस बदलाव (दालों की खेती) के लिए हतोत्साहित होते हैं।
- बाजार जोखिम: दलहन किसानों को अत्यधिक मूल्य अस्थिरता (उतार-चढ़ाव) और अनिश्चित बाजार पहुँच का सामना करना पड़ता है।
- उदाहरण: अत्यधिक उत्पादन के बाद अरहर और चने की दाल की कीमतों में अक्सर भारी गिरावट आना।
- उत्पादकता अंतराल: निम्न कोटि का बीज प्रतिस्थापन और कम तकनीक अपनाने के कारण खाद्यान्नों की तुलना में दलहन की उत्पादकता अभी भी कम है।
- सिंचाई की बाधाएँ: 80% से अधिक दलहन की कृषि सीमित सिंचाई बुनियादी ढाँचे वाले वर्षा-आधारित (बारानी) क्षेत्रों में होती है।
- जागरूकता की कमी: पोषक तत्त्व प्रबंधन और विविधीकृत फसल प्रणाली के संबंध में किसानों के पास अक्सर सहायता का अभाव होता है।
- उदाहरण: मृदा स्वास्थ्य कार्ड की सिफारिशों का कार्यान्वयन राज्यों में अभी भी असमान बना हुआ है।
निष्कर्ष
उर्वरक जाल से बाहर निकलने के लिए खाद्यान्न-केंद्रित नीतियों से आगे बढ़कर विविधीकृत, दलहन-आधारित और जलवायु-अनुकूल कृषि की ओर बढ़ने की आवश्यकता है। सुनिश्चित खरीद, टिकाऊ खेती के प्रोत्साहन और संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन के माध्यम से ‘दलहन आत्मनिर्भरता’ को मजबूत करके खाद्य सुरक्षा को पारिस्थितिकी स्थिरता और कृषक लचीलेपन के साथ संरेखित किया जा सकता है।