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Q. प्रस्तावित विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) विधेयक से उच्च शिक्षा के 'सहकारी संघवाद' मॉडल से 'नौकरशाही केंद्रीकरण' की ओर स्थानांतरित होने का खतरा है। राज्य विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) की स्वायत्तता के आलोक में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

April 11, 2026

GS Paper IIGovernance

प्रश्न की मुख्य माँग

  • केंद्रीकरण के लाभों का वर्णन कीजिए।
  • केंद्रीकरण से होने वाली हानियों का उल्लख कीजिए।
  • आगे की राह सुझाइए।

उत्तर

भारत में उच्च शिक्षा पारंपरिक रूप से एक संघीय संतुलन के तहत संचालित होती रही है, जहाँ केंद्र व्यापक मानक निर्धारित करता है, जबकि राज्य संस्थागत वास्तविकताओं को आकार देते हैं। प्रस्तावित विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, एकीकृत नियामक ढाँचे की परिकल्पना करते हुए केंद्रीकृत नियंत्रण की ओर झुकाव का संकेत देता है, जिससे राज्य विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों की शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्तता पर संभावित रूप से अंकुश लग सकता है।

मुख्य भाग

केंद्रीकरण के लाभ 

  • एकरूप मानक: केंद्रीय नियंत्रण से देशभर में शैक्षणिक, शोध और मूल्यांकन के समान मानक सुनिश्चित किए जा सकते हैं।
    • उदाहरण: विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान के तहत केंद्र-नियंत्रित परिषदें सभी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए मानक निर्धारित करती हैं, जिससे एकरूपता बनी रहती है।
  • नीतिगत समन्वय: राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 जैसे सुधारों का बिना राज्यों के मध्य भिन्नता के प्रभावी क्रियान्वयन संभव होता है।
  • प्रभावी विनियमन: अनेक नियामक संस्थाओं और उनके बीच के अतिव्यापन को कम किया जा सकता है।
    • उदाहरण: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग जैसी संस्थाओं की विखंडित भूमिकाओं का स्थान लेना।
  • तेजी से निर्णय: केंद्रीकृत प्राधिकरण अनुमोदन और निरीक्षण प्रक्रियाओं को तीव्र कर सकता है।
    • उदाहरण: विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान परिषदों को बिना पूर्व परामर्श के निरीक्षण करने की अनुमति देता है, जिससे विलंब कम होता है।
  • संसाधनों का आवंटन: एकीकृत नियंत्रण के तहत संसाधनों का रणनीतिक और आवश्यकता-आधारित वितरण संभव होता है।
    • उदाहरण: इस विधेयक के अंतर्गत शिक्षा मंत्रालय द्वारा वित्तीय आवंटन की भूमिका निभाना।

केंद्रीकरण से होने वाली हानि

  • संघीय अतिक्रमण: यह समन्वय से आगे बढ़कर केंद्र की भूमिका का विस्तार करता है, जिससे संवैधानिक संतुलन प्रभावित होता है।
    • उदाहरण: संविधान की प्रविष्टि 66 संसद को केवल मानक निर्धारण तक सीमित करती है, जबकि VBSA इसे वित्तपोषण और शासन तक विस्तारित करता है।
  • स्वायत्तता का क्षरण: विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक और प्रशासनिक स्वतंत्रता में कमी आती है।
    • उदाहरण: IIT, IIM और अंतर-विश्वविद्यालय केंद्रों के शासी निकायों की स्वायत्तता इस विधेयक के तहत प्रभावित होती है।
  • परामर्श में कमी: सहभागी निर्णय-प्रक्रिया कमजोर होती है।
    • उदाहरण: UGC अधिनियम की धारा 13 के तहत परामर्श-आधारित निरीक्षण प्रणाली का कमजोर होना।
  • नौकरशाही नियंत्रण: शैक्षणिक प्रशासन शिक्षाविदों के बजाय नौकरशाहों के नियंत्रण में चला जाता है।
  • राज्यों का हाशियाकरण: शिक्षा नीति में राज्य सरकारों और स्थानीय आवश्यकताओं की भूमिका कमजोर होती है।
    • उदाहरण: निर्णय लेने वाली संस्थाओं में राज्य उच्च शिक्षा परिषदों की अनुपस्थिति।

आगे की राह 

  • साझा शासन: नियामक परिषदों में राज्यों और उच्च शिक्षण संस्थानों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए, ताकि संतुलित प्रतिनिधित्व हो।
  • परामर्शात्मक तंत्र: निरीक्षण और सुधारों से पहले अनिवार्य परामर्श की व्यवस्था को पुनः स्थापित किया जाए।
    • उदाहरण: UGC अधिनियम की धारा 13 जैसी परामर्श-आधारित व्यवस्था को पुनर्स्थापित करना।
  • स्पष्ट शक्तियाँ: केंद्र की भूमिका को संविधान के अनुसार केवल मानक निर्धारण तक सीमित रखा जाए।
    • उदाहरण: संघ सूची की प्रविष्टि 66 के अनुरूप व्यवस्था सुनिश्चित करना।
  • संस्थागत स्वायत्तता: उच्च शिक्षण संस्थानों की शैक्षणिक और प्रशासनिक स्वतंत्रता की रक्षा की जाए।
  • संतुलित वित्तपोषण: राज्यों की भागीदारी के साथ पारदर्शी और नियम-आधारित वित्तीय आवंटन सुनिश्चित किया जाए।
    • उदाहरण: विश्वविद्यालयों के लिए केंद्र-राज्य संयुक्त वित्तपोषण ढाँचा विकसित करना।

निष्कर्ष

यद्यपि केंद्रीकरण से एकरूपता और प्रभावशीलता सुनिश्चित हो सकती है, परंतु अत्यधिक नौकरशाही नियंत्रण संघीय सिद्धांतों और संस्थागत स्वायत्तता को कमजोर कर सकता है। अतः भारत में सतत् उच्च शिक्षा सुधार के लिए राष्ट्रीय मानकों और सहभागी शासन के बीच संतुलित ढाँचा आवश्यक है।

The proposed Viksit Bharat Shiksha Adhisthan (VBSA) Bill risks shifting higher education from a model of ‘cooperative federalism’ to ‘bureaucratic centralization’. Critically analyze this statement in the light of the autonomy of State Universities and Higher Education Institutions (HEIs). in hindi

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