Q. उच्च शिक्षा में 50% सकल नामांकन अनुपात (GER) प्राप्त करने के लिए, छात्रवृत्तियों को केवल वित्तीय सहायता के रूप में देखने के बजाय, उन्हें शैक्षणिक संस्कृति का एक अभिन्न अंग बनाने की दिशा में बदलाव लाना आवश्यक है। भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली के समक्ष मौजूद 'त्रिपक्षीय चुनौती' के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • त्रिपक्षीय चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।
  • छात्रवृत्ति की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
  • आगे की राह सुझाइए।

उत्तर

उच्च शिक्षा में 50% सकल नामांकन अनुपात (GER) प्राप्त करने की भारत की महत्त्वाकांक्षा केवल संस्थानों के विस्तार पर निर्भर नहीं है, बल्कि संरचनात्मक बाधाओं को दूर करने पर भी आधारित है। इस संदर्भ में, छात्रवृत्तियों को केवल वित्तीय सहायता तक सीमित न रहकर, पहुँच, समानता और शैक्षणिक सफलता को आकार देने वाले समग्र उपकरण के रूप में विकसित होना आवश्यक है।

मुख्य भाग

त्रिपक्षीय चुनौती 

  • पहुँच का अंतर: संस्थानों के विस्तार के बावजूद भागीदारी सीमित है, जो दर्शाता है कि पहुँच से जुड़ी बाधाएँ अब भी बनी हुई हैं।
    • उदाहरण: 70,000 से अधिक संस्थानों के बावजूद GER 2022-23 में केवल 29.5 है (आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26)।
  • वहनीयता की समस्या: उच्च लागत विशेषकर छोटे शहरों और कमजोर वर्गों के छात्रों को हतोत्साहित करती है।
    • उदाहरण: लगभग 75% छात्र निजी संस्थानों में अध्ययन करते हैं (AISHE), जहाँ शुल्क सरकारी महाविद्यालयों की तुलना में काफी अधिक है।
  • गुणवत्ता की चिंता: गुणवत्ता के बिना विस्तार से प्रतिधारण और परिणाम प्रभावित होते हैं।
    • उदाहरण: केवल लगभग 50% स्नातक ही रोजगार योग्य हैं, जो शैक्षणिक गुणवत्ता की कमजोरी को दर्शाता है।
  • क्षेत्रीय असमानता: टियर-II/III शहरों के छात्रों को प्रवेश और निरंतरता में अधिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
    • उदाहरण: बिहार (~15%) से लेकर तमिलनाडु (~50%+) तक GER में बड़ा अंतर (AISHE) स्पष्ट असमानता को दर्शाता है।
  • प्रतिधारण की चुनौती: केवल प्रवेश पर्याप्त नहीं है; निरंतरता और पाठ्यक्रम पूर्ण करना भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

छात्रवृत्ति की भूमिका 

  • पहुँच सक्षमकर्ता: उच्च शिक्षा में प्रवेश हेतु वित्तीय बाधाओं को कम करती है।
    • उदाहरण: केंद्रीय क्षेत्र छात्रवृत्ति योजना (CSSS) प्रति वर्ष 82,000 से अधिक छात्रों को समर्थन प्रदान करती है (शिक्षा मंत्रालय के आँकड़े)।
  • समानता का साधन: वंचित वर्गों को समर्थन देकर सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को कम करती है।
    • उदाहरण: अनुसूचित जाति/जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजनाएँ करोड़ों लाभार्थियों को कवर करती हैं, जिससे नामांकन में वृद्धि होती है।
  • प्रतिधारण समर्थन: निरंतर वित्तीय सहायता से पढ़ाई जारी रखने और पूर्ण करने की दर में सुधार होता है।
    • उदाहरण: INSPIRE छात्रवृत्ति (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग) ₹80,000 प्रति वर्ष प्रदान करती है, जिससे विज्ञान के छात्र अपनी पढ़ाई पूरी कर पाते हैं।
  • शैक्षणिक एकीकरण: छात्रवृत्तियों को संस्थागत प्रक्रियाओं में समाहित किया जाना चाहिए, न कि केवल अतिरिक्त सुविधा के रूप में देखा जाए।
    • उदाहरण: पीएम यशस्वी (PM-YASASVI) योजना वित्तीय सहायता को मेरिट के साथ जोड़कर सतत् शैक्षणिक प्रदर्शन को प्रोत्साहित करती है।
  • केंद्रीकृत पहुँच: डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से पहुँच और पारदर्शिता को सरल बनाया जाता है।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल (NSP) एक एकीकृत मंच के रूप में कार्य करता है।

आगे की राह 

  • लक्षित रूपरेखा: छात्रवृत्तियों को विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक और क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार तैयार किया जाए।
    • उदाहरण: पीएम यशस्वी (PM-YASASVI) योजना चयनित जिलों में OBC/EBC/DNT छात्रों को लक्षित करती है।
  • जीवन-चक्र आधारित समर्थन: केवल प्रवेश स्तर तक सीमित न रहकर पूरी शैक्षणिक यात्रा को कवर किया जाए, जिससे पहुँच और निरंतरता दोनों से जुड़ी समस्याओं का समाधान हो।
  • प्रदर्शन आधारित एकीकरण: शैक्षणिक मार्गदर्शन और प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहनों को शामिल किया जाए।
  • डिजिटल विस्तार: बेहतर पहुँच और प्रभावी वितरण के लिए NSP जैसे प्लेटफॉर्म को सुदृढ़ किया जाए।
  • नीतिगत एकीकरण: छात्रवृत्तियों को व्यापक उच्च शिक्षा सुधारों के साथ जोड़ा जाए।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 वर्ष 2035 तक 50% GER लक्ष्य प्राप्त करने हेतु वित्तीय सहायता के विस्तार पर बल देती है।

निष्कर्ष

50% सकल नामांकन अनुपात (GER) प्राप्त करने के लिए छात्रवृत्तियों को समावेशन और शैक्षणिक सफलता के संरचनात्मक साधन के रूप में पुनर्परिभाषित करना आवश्यक है। इन्हें शैक्षणिक पारितंत्र में समाहित करके पहुँच, वहनीयता और गुणवत्ता से जुड़ी खाइयों को पाटा जा सकता है, जिससे भारत में उच्च शिक्षा का समानतापूर्ण और सतत् विस्तार सुनिश्चित हो सके।

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