प्रश्न की मुख्य माँग
- राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने में दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के उद्देश्य एवं औचित्य
- संसदीय लोकतंत्र एवं अंतःकरण की स्वतंत्रता (Freedom of Conscience) के क्षरण संबंधी आलोचना
- इसके संस्थागत एवं लोकतांत्रिक प्रभावों का मूल्यांकन तथा आवश्यक सुधारों का सुझाव।
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उत्तर
परिचय
52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) का उद्देश्य बार-बार होने वाले राजनीतिक दल-बदल से उत्पन्न अस्थिरता पर अंकुश लगाना था। यद्यपि इसने सरकारों की स्थिरता एवं दलगत अनुशासन को सुदृढ़ किया है, किंतु इसके कारण विधायकों/सांसदों की स्वतंत्र निर्णय-क्षमता, अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा विचार-विमर्श आधारित संसदीय लोकतंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने संबंधी चिंताएँ भी उभरी हैं।
दल-बदल विरोधी कानून के उद्देश्य
- राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करना: राजनीतिक दल-बदल को रोककर शासन व्यवस्था में स्थिरता बनाए रखना। यह “आया राम-गया राम” राजनीति पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से बनाया गया था।
- उदाहरण: वर्ष 1967 में हरियाणा में विधायकों के बड़े पैमाने पर हुए दल-बदल ने राजनीतिक अस्थिरता के गंभीर जोखिमों को उजागर किया।
- दलगत अनुशासन को सुदृढ़ करना: विधायकों को विधायी मतदान के दौरान पार्टी व्हिप का पालन करना अनिवार्य बनाता है। इससे सरकारी नीतियों की निरंतरता बनी रहती है तथा अवसरवादी राजनीतिक पुनर्संरेखण को रोका जा सकता है।
- हॉर्स-ट्रेडिंग में कमी लाना: चुनावों के बाद प्रलोभन अथवा लाभ के आधार पर होने वाले दल-बदल को सीमित करता है। विशेष रूप से गठबंधन सरकारों में यह राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने में सहायक होता है।
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आलोचनाएँ
- संसदीय लोकतंत्र का क्षरण एवं अंतःकरण की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध: सांसदों एवं विधायकों को नीति-संबंधी मुद्दों पर भी पार्टी व्हिप का पालन करना पड़ता है, जिससे उनकी स्वतंत्र निर्णय-क्षमता प्रभावित होती है।
- उदाहरण: किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने कानून की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, किंतु विधायिकाओं में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ इसके अंतर्निहित तनाव को भी स्वीकार किया।
- विचार-विमर्श आधारित लोकतंत्र का कमजोर होना: जनप्रतिनिधि अक्सर मतदाताओं के प्रतिनिधि के बजाय दल के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने लगते हैं। इससे संसद एवं विधानसभाओं में बहस, असहमति और स्वतंत्र विमर्श का दायरा सीमित हो जाता है।
- दलीय नेतृत्व में शक्ति का केंद्रीकरण: पार्टी नेतृत्व व्हिप के माध्यम से विधायकों के आचरण को नियंत्रित करता है। इससे आंतरिक दलीय लोकतंत्र कमजोर पड़ सकता है तथा केंद्रीकृत नियंत्रण को बढ़ावा मिलता है।
- अपवादों एवं प्रवर्तन में अस्पष्टता: विलय और विभाजन संबंधी प्रावधानों का कई बार रणनीतिक रूप से दुरुपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त, अयोग्यता संबंधी मामलों में निर्णय देने में अध्यक्ष (Speaker) की भूमिका पर विलंब एवं पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं।
- उदाहरण: तेलंगाना एवं कर्नाटक से जुड़े दल-बदल मामलों में निर्णय प्रक्रिया में विलंब को लेकर आलोचनाएँ हुईं।
आगे की राह
- व्हिप के दायरे को सीमित करना: व्हिप को केवल विश्वास मत (Confidence Motion), अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) जैसे मामलों तक सीमित किया जाना चाहिए, न कि सभी विधायी मतदानों पर लागू किया जाए।
- उदाहरण: यूनाइटेड किंगडम की संसद में नैतिक एवं सामाजिक विषयों (जैसे गर्भपात संबंधी विधेयक) पर सांसदों को अक्सर फ्री वोट (Free Vote) की अनुमति दी जाती है, जिससे अंतरात्मा के अनुसार मतदान संभव हो पाता है।
- स्वतंत्र निकाय द्वारा समयबद्ध निर्णय: दल-बदल मामलों के निपटान हेतु अध्यक्ष (Speaker) केंद्रित व्यवस्था के स्थान पर स्थायी न्यायाधिकरण अथवा निर्वाचन आयोग जैसी स्वतंत्र संस्था का गठन किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: भारतीय विधि आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय/उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की अध्यक्षता में स्थायी अयोग्यता न्यायाधिकरण की अनुशंसा की थी, ताकि कर्नाटक एवं मणिपुर जैसे मामलों में होने वाली देरी से बचा जा सके।
- अयोग्यता याचिकाओं के लिए निश्चित समय-सीमा: दल-बदल संबंधी याचिकाओं के निस्तारण हेतु 90 दिनों की निश्चित समय-सीमा निर्धारित की जानी चाहिए।
- उदाहरण: तेलंगाना विधानसभा के दल-बदल मामलों में अध्यक्ष द्वारा निर्णय में विलंब के कारण दलबदल करने वाले सदस्य लंबे समय तक पद पर बने रहे।
- आंतरिक दलीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करना: अनावश्यक अथवा गैर-महत्त्वपूर्ण मतदानों पर व्हिप जारी करने से पूर्व राजनीतिक दलों में आंतरिक विमर्श एवं परामर्श को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
- उदाहरण: जर्मनी में राजनीतिक दल मतदान से पूर्व संसदीय समूहों के भीतर संस्थागत विचार-विमर्श की व्यवस्था अपनाते हैं, जिससे संरचित असहमति को स्थान मिलता है।
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निष्कर्ष
यद्यपि दल-बदल विरोधी कानून ने भारत में राजनीतिक स्थिरता एवं शासन की निरंतरता सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, किंतु इसके कारण विधायी स्वतंत्रता, अंतःकरण के अनुसार मतदान तथा विचार-विमर्श आधारित लोकतंत्र का दायरा भी संकुचित हुआ है। आंतरिक दलीय लोकतंत्र को सुदृढ़ कर, स्वतंत्र न्यायाधिकरणों द्वारा समयबद्ध निर्णय सुनिश्चित कर तथा व्हिप को केवल विश्वास एवं वित्तीय मामलों तक सीमित करके राजनीतिक स्थिरता और लोकतांत्रिक विमर्श के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है।