प्रश्न की मुख्य माँग
- एशियाई शेरों (Asiatic Lions) की पृथक आबादी स्थापित करने की पारिस्थितिकी आवश्यकता।
- शेरों के स्थानांतरण में बाधा उत्पन्न करने वाले प्रशासनिक एवं नीतिगत बाधाएँ।
- आगे की राह।
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उत्तर
परिचय
भारत में एशियाई शेरों की संख्या 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में कुछ दर्जनों से बढ़कर वर्तमान में लगभग 891 हो गई है, जिसका प्रमुख कारण गुजरात के गिर वन क्षेत्र में किए गए निरंतर संरक्षण प्रयास हैं। हालाँकि, यह प्रजाति अभी भी पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील बनी हुई है, क्योंकि किसी एक बड़े संकट, जैसे रोग प्रकोप, सूखा या वनाग्नि से पूरी आबादी प्रभावित हो सकती है। वैज्ञानिक सहमति, न्यायिक निर्देशों एवं संरक्षण ढाँचों द्वारा दीर्घकालिक प्रजातीय सुरक्षा एवं लचीलापन सुनिश्चित करने के लिए दूसरी स्वतंत्र मुक्त-विचरणशील आबादी स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
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पृथक आबादी की पारिस्थितिकी आवश्यकता
- जोखिम का विविधीकरण: एक ही स्थान पर पूरी आबादी का केंद्रित होना महामारियों एवं पर्यावरणीय आपदाओं के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाता है।
- उदाहरण: वर्ष 2018 में गिर में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) के प्रकोप ने घनी शेर की आबादी में रोग के तीव्र प्रसार के खतरे को उजागर किया।
- आनुवंशिक लचीलापन: पृथक आबादियाँ अंतःप्रजनन (Inbreeding) के जोखिम को कम करती हैं तथा दीर्घकालिक विकासात्मक क्षमता को बनाए रखने में सहायता करती हैं। गिर के शेरों में आनुवंशिक विविधता सीमित है; एक अलग आबादी स्थापित करने से आनुवंशिक विविधता एवं अनुकूलन क्षमता को बनाए रखने में सहायता मिलेगी।
- मेटापॉपुलेशन रणनीति: विभिन्न आवासों में शेरों का विस्तार यह सुनिश्चित करता है कि किसी एक क्षेत्र में आपदा आने पर भी प्रजाति का अस्तित्व बना रहे।
- उदाहरण: कूनो राष्ट्रीय उद्यान को दूसरी स्वतंत्र मुक्त-विचरणशील शेर आबादी स्थापित करने के लिए उपयुक्त स्थल के रूप में चिह्नित किया गया था।
प्रशासनिक एवं नीतिगत बाधाएँ
- राज्य द्वारा विरोध: गुजरात सरकार द्वारा क्षेत्रीय गौरव एवं आवास संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए शेरों के स्थानांतरण का विरोध किया जाता रहा है।
- उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2013 के निर्देशों (CEL बनाम भारत संघ) के बावजूद कूनो राष्ट्रीय उद्यान में एशियाई शेरों की दूसरी मुक्त-विचरणशील आबादी स्थापित करने की प्रक्रिया अभी तक लंबित है।
- अंतर-एजेंसी समन्वय की कमी: वन विभाग, वन्यजीव प्राधिकरणों एवं राज्य सरकारों के बीच समन्वय की कमी से परियोजना क्रियान्वयन में देरी होती है।
- उदाहरण: कूनो में गाँवों के पुनर्वास एवं आवास सुधार की प्रक्रिया धीमी रही है।
- नीतिगत जड़ता एवं राजनीतिक विचार: संरक्षण संबंधी प्राथमिकताएँ अक्सर स्थानीय राजनीतिक नैरेटिव्स एवं पहचान आधारित राजनीति के दबाव में प्रभावित होती हैं, जिसके कारण वैज्ञानिक एवं दीर्घकालिक संरक्षण निर्णयों के क्रियान्वयन में बाधाएँ उत्पन्न होती हैं।
- संसाधन आवंटन की समस्या: अपर्याप्त वित्तीय संसाधन तथा लॉजिस्टिक योजना की कमी शेर स्थानांतरण, निगरानी एवं दीर्घकालिक प्रबंधन प्रयासों में बाधा उत्पन्न करती है।
आगे की राह
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को कानूनी रूप से लागू करना: गुजरात एवं अन्य हितधारकों द्वारा कूनो में शेर स्थानांतरण संबंधी न्यायिक निर्देशों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: चरणबद्ध स्थानांतरण के लिए समय-सीमा निर्धारित करते हुए न्यायिक निगरानी।
- अंतर-राज्यीय समन्वय को मजबूत करना: निगरानी एवं विवाद समाधान के लिए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के अंतर्गत एक केंद्रीय निगरानी निकाय स्थापित किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: राज्य वन विभागों, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) तथा राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के विशेषज्ञों को शामिल करते हुए एक कार्यबल का गठन।
- वैकल्पिक आवासों की सुरक्षा एवं विकास: गुजरात से बाहर ऐसे पारिस्थितिकी रूप से उपयुक्त एवं भौगोलिक रूप से दूरस्थ क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए, जहाँ शेरों की स्वतंत्र आबादी स्थापित की जा सके।
- समुदाय एवं हितधारक भागीदारी: स्थानीय समुदायों को मुआवजा, रोजगार अवसर एवं इको-टूरिज्म प्रोत्साहन के माध्यम से संरक्षण प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: कूनो में पुनर्वास कार्यक्रमों को आजीविका के वैकल्पिक साधनों से जोड़ना।
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निष्कर्ष
यद्यपि भारत में एशियाई शेर संरक्षण को वैश्विक स्तर पर एक सफल उदाहरण के रूप में सराहा जाता है, लेकिन इसकी पारिस्थितिकी संवेदनशीलता एक दूसरी, भौगोलिक रूप से पृथक आबादी स्थापित करने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है। प्रशासनिक बाधाओं का समाधान तथा न्यायिक निर्देशों का प्रभावी अनुपालन इस संरक्षण सफलता को एक अधिक लचीली एवं दीर्घकालिक संरक्षण विरासत में परिवर्तित कर सकता है, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए इस प्रजाति की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी।