प्रश्न की मुख्य माँग
- माउंटबेटन के दृष्टिकोण को प्रभावित करने वाले कारकों का विश्लेषण कीजिए।
- विभाजन (Partition) क्यों एकमात्र व्यावहारिक समाधान प्रतीत हुआ, इसकी विवेचना कीजिए।
- विभाजन के संभावित वैकल्पिक उपायों पर चर्चा कीजिए।
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उत्तर
परिचय
माउंटबेटन योजना (3 जून 1947) ने भारत के विभाजन (Partition) को औपचारिक स्वीकृति प्रदान की तथा सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को तेज करते हुए 15 अगस्त, 1947 की तिथि निर्धारित की। ब्रिटिश शासन के अंतिम चरण में बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा, राजनीतिक गतिरोध और प्रशासनिक तात्कालिकता का सामना करते हुए, लॉर्ड माउंटबेटन ने विभाजन को सबसे व्यावहारिक समाधान के रूप में देखा।
माउंटबेटन के दृष्टिकोण को प्रभावित करने वाले कारक
- सांप्रदायिक हिंसा: व्यापक हिंदू-मुस्लिम हिंसा ने माउंटबेटन को यह विश्वास दिलाया कि एक ही राजनीतिक ढाँचे के अंतर्गत सह-अस्तित्व की संभावना अत्यंत कम है।
- उदाहरण: कलकत्ता हत्याकांड (1946) के बाद नोआखाली, बिहार, बंबई, अमृतसर, तक्षशिला और रावलपिंडी में हुए दंगे।
- मुस्लिम लीग की माँग: मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की अडिग माँग ने एक संयुक्त संवैधानिक समाधान की संभावनाओं को कम कर दिया।
- राजनीतिक गतिरोध: कांग्रेस और मुस्लिम लीग मौजूदा संवैधानिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत प्रभावी सहयोग स्थापित करने में असफल रहे।
- समय का दबाव: ब्रिटेन के शीघ्र सत्ता हस्तांतरण के निर्णय के कारण लंबी वार्ताओं के लिए बहुत कम समय उपलब्ध था।
- उदाहरण: प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने निर्देश दिया था कि सत्ता का हस्तांतरण 30 जून, 1948 तक कर दिया जाए।
- प्रशासनिक स्थिरता: माउंटबेटन को आशंका थी कि अनिश्चितता की स्थिति जारी रहने से अव्यवस्था बढ़ेगी और शासन व्यवस्था कमजोर होगी।
विभाजन क्यों एकमात्र व्यावहारिक समाधान प्रतीत हुआ
- तत्काल समाधान: विभाजन ने ऐसा स्पष्ट संवैधानिक ढाँचा प्रदान किया, जिसे दोनों प्रमुख राजनीतिक दल स्वीकार कर सकते थे।
- उदाहरण: 3 जून योजना को कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने स्वीकार किया।
- सत्ता हस्तांतरण: इससे ब्रिटेन का भारत से अधिक तीव्र एवं अपेक्षाकृत व्यवस्थित प्रस्थान संभव हुआ तथा सत्ता हस्तांतरण की तिथि जून 1948 से आगे बढ़ाकर 15 अगस्त, 1947 कर दी गई।
- हिंसा पर नियंत्रण: नेताओं को आशा थी कि विभाजन से सांप्रदायिक तनाव कम होगा और गृहयुद्ध जैसी स्थिति को रोका जा सकेगा।
- मजबूत केंद्र: कांग्रेस एक छोटे लेकिन अधिक संगठित भारत के पक्ष में थी, जिसमें एक सशक्त केंद्रीय सरकार हो।
- मुस्लिम लीग की स्वीकृति: विभाजन ने मुस्लिम लीग के प्रमुख राजनीतिक उद्देश्य पाकिस्तान की स्थापना को पूरा किया, जिससे उसका सहयोग सुनिश्चित हुआ।
संभावित वैकल्पिक उपाय
- कैबिनेट मिशन योजना: प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy) पर आधारित एक लचीला संघीय ढाँचा भारत की एकता को बनाए रख सकता था।
- उदाहरण: कैबिनेट मिशन योजना (1946) ने समूहबद्ध प्रांतों तथा कमजोर केंद्र के साथ एक संयुक्त भारत का प्रस्ताव रखा था।
- परिसंघीय मॉडल: एक परिसंघीय व्यवस्था क्षेत्रीय आकांक्षाओं को समायोजित करते हुए क्षेत्रीय विभाजन से बच सकती थी।
- विलंबित सत्ता हस्तांतरण: वार्ताओं के लिए अतिरिक्त समय मिलने पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहमति निर्माण की संभावना बढ़ सकती थी।
- अंतरिम संवैधानिक सुरक्षा: अल्पसंख्यकों के लिए अधिक सशक्त संवैधानिक सुरक्षा प्रावधान मुस्लिम राजनीतिक चिंताओं का समाधान कर सकते थे।
- प्लान बाल्कन: तत्काल विभाजन के बजाय प्रांतों को अधिक स्वायत्तता देने का विकल्प प्रारंभिक रूप से विचाराधीन था।
- उदाहरण: कांग्रेस ने माउंटबेटन की प्रारंभिक “प्लान बाल्कन” योजना का विरोध किया था, जिसमें प्रांतों को अपने अलग संवैधानिक भविष्य चुनने की अनुमति दी गई थी।
निष्कर्ष
यद्यपि विभाजन (Partition) ने वर्ष 1947 के संवैधानिक गतिरोध का तत्काल समाधान प्रदान किया, किंतु इसके मानवीय एवं राजनीतिक परिणाम अत्यंत गहरे और दूरगामी रहे। यह अनुभव प्रतिस्पर्द्धी पहचानों के प्रबंधन हेतु समायोजन, विश्वास-निर्माण तथा सुदृढ़ सुरक्षा उपायों के महत्त्व को रेखांकित करता है।