प्रश्न की मुख्य माँग
- प्लेटफॉर्म गवर्नेंस (Platform Governance) से संबंधित वैश्विक रुझान
- प्रतिबंध आधारित दृष्टिकोण की सीमाएँ
- आगे की राह।
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उत्तर
परिचय
नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव बच्चों को डिजिटल जोखिमों से बचाने की दिशा में उभरती वैश्विक नीति-प्रवृत्ति को दर्शाता है। किंतु ऐसे प्रतिबंध प्रायः एक विधायी शॉर्टकट (Legislative Shortcut) के रूप में कार्य करते हैं, जो प्लेटफॉर्म की संरचनात्मक खामियों को दूर करने के बजाय उपयोगकर्ताओं पर प्रतिबंध लगाने पर केंद्रित होते हैं। इससे एल्गोरिद्मिक एडिक्शन (Algorithmic Addiction), अधिकतम सहभागिता पर आधारित डिज़ाइन तथा डेटा निष्कर्षण जैसी ‘अटेंशन इकोनॉमी ’ (Attention Economy) की मूल समस्याओं का समाधान नहीं हो पाता।
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वैश्विक रुझान
- आयु-आधारित प्रतिबंध एवं सोशल मीडिया पर प्रतिबंध: यू.के., फ्राँस, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया तथा कनाडा जैसे देश 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुँच सीमित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
- उदाहरण: ऑस्ट्रेलिया के आयु-आधारित प्रतिबंधों के कारण कई नाबालिग अपेक्षाकृत कम विनियमित प्लेटफॉर्मों की ओर चले गए, जिससे सुरक्षित डिजिटल वातावरण सुनिश्चित नहीं हो सका है।
- स्क्रीन-टाइम सीमा को व्यवहार नियंत्रण के साधन के रूप में अपनाना: कुछ देशों ने पूर्ण प्रतिबंध के बजाय सोशल मीडिया उपयोग की समय-सीमा निर्धारित करने का विकल्प चुना है।
- उदाहरण: चीन में नाबालिगों के लिए अनिवार्य स्क्रीन-टाइम सीमा डिजिटल एडिक्शन कम करने का प्रयास करती है, किंतु इसका क्रियान्वयन व्यापक एवं हस्तक्षेपकारी आयु-सत्यापन प्रणाली पर निर्भर है।
- प्रतिबंध-आधारित मॉडल की संरचनात्मक सीमाएँ: ऐसे मॉडलों का प्रभावी प्रवर्तन आयु-सत्यापन तथा पारिवारिक निगरानी पर निर्भर करता है। परिणामस्वरूप, ये उपाय डिजिटल हानि कम करने के बजाय निगरानी और व्यक्तिगत डेटा संग्रह के जोखिमों को बढ़ा सकते हैं।
भारत का प्लेटफॉर्म गवर्नेंस ढाँचा
- विनियामक आधार: भारत का वर्तमान प्लेटफॉर्म गवर्नेंस ढाँचा डिजाइन-केंद्रित होने के बजाय अनुपालन-केंद्रित है, जहाँ प्लेटफॉर्म के संरचनात्मक डिजाइन की अपेक्षा नियमों के पालन पर अधिक बल दिया जाता है।
- राज्य स्तर पर प्रतिबंध की उभरती पहल: कई राज्यों ने नाबालिगों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने या उसे सीमित करने पर विचार किया है।
- उदाहरण: भारतीय राज्यों में प्रस्तावित 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध वैश्विक आयु-आधारित प्रवृत्ति के अनुरूप हैं, किंतु इससे अधिकार-क्षेत्र एवं प्रवर्तन से जुड़े प्रश्न भी उत्पन्न होते हैं।
- प्लेटफॉर्म जवाबदेही के कमजोर प्रवर्तन: वर्तमान व्यवस्था में ध्यान मुख्यतः आपत्तिजनक कंटेंट हटाने पर केंद्रित है, जबकि एल्गोरिद्मिक पारदर्शिता एवं डिजाइन जवाबदेही पर अपेक्षाकृत कम बल दिया जाता है। परिणामस्वरूप, प्लेटफॉर्म सहभागिता-आधारित डिजाइन प्रणालियों के माध्यम से उपयोगकर्ताओं का ध्यान आकर्षित करने की व्यापक स्वतंत्रता बनाए रखते हैं।
प्रतिबंध की सीमाएँ
- एल्गोरिद्मिक एडिक्शन एक संरचनात्मक समस्या है, आकस्मिक नहीं: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपयोगकर्ताओं के कल्याण के बजाय अधिकतम सहभागिता को प्राथमिकता देते हैं। उनकी अनुशंसा प्रणालियाँ अधिक स्क्रीन-टाइम सुनिश्चित करने के लिए आक्रोशपूर्ण कंटेंट को बढ़ावा देती हैं।
- प्रतिबंधों से बचना एवं व्यावहारिक विस्थापन: नाबालिग साझा खातों, गलत आयु विवरण या वैकल्पिक प्लेटफॉर्मों का उपयोग कर प्रतिबंधों को आसानी से दरकिनार कर सकते हैं। परिणामस्वरूप, वे डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र से बाहर निकलने के बजाय कम विनियमित प्लेटफॉर्मों की ओर स्थानांतरित हो जाते हैं।
- डेटा निष्कर्षण की आर्थिक प्रेरणा बनी रहती है: केवल प्रतिबंध लगाने से प्लेटफॉर्मों का उपयोगकर्ता प्रतिधारण एवं प्रोफाइलिंग पर आधारित व्यावसायिक मॉडल प्रभावित नहीं होता। इस प्रकार निगरानी पूँजीवाद (Surveillance Capitalism) की आर्थिक संरचना यथावत बनी रहती है, जिससे उपयोगकर्ताओं के डेटा-संग्रह और अटेंशन इकोनॉमी को बढ़ावा मिलता रहता है।
आगे की राह
- एल्गोरिद्मिक जवाबदेही: केवल पहुँच पर प्रतिबंध लगाने के बजाय ऐसी नियामक व्यवस्था विकसित की जाए, जो अनुशंसा प्रणालियों में पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करे।
- डिज़ाइन ऑडिट: नाबालिगों को लक्षित करने वाले प्लेटफॉर्मों के लिए नियमित डिजाइन ऑडिट तथा सुरक्षा-आधारित डिजाइन मानकों का पालन अनिवार्य किया जाए।
- डिजिटल साक्षरता: दंडात्मक प्रतिबंधों के स्थान पर विद्यालयों में डिजिटल साक्षरता एवं संज्ञानात्मक दृढ़ता कार्यक्रमों को सुदृढ़ किया जाए, ताकि बच्चे डिजिटल जोखिमों की पहचान कर उनका सुरक्षित ढंग से सामना कर सकें।
- जोखिम-आधारित विनियमन: उच्च जोखिम वाले एडिक्शन उत्पन्न करने वाले डिजाइनों और सामान्य कंटेंट उपलब्ध कराने वाले प्लेटफॉर्मों के मध्य स्पष्ट अंतर करते हुए जोखिम-आधारित नियामक ढाँचा विकसित किया जाए।
- स्वतंत्र नियामक संस्था: स्व-नियमन से आगे बढ़कर प्लेटफॉर्म अनुपालन, एल्गोरिद्मिक पारदर्शिता तथा उपयोगकर्ता सुरक्षा की निगरानी हेतु स्वतंत्र नियामक संस्थाओं की स्थापना की जाए।
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निष्कर्ष
नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध प्रशासनिक दृष्टि से सरल समाधान प्रतीत हो सकता है, किंतु यह अटेंशन इकोनॉमी की संरचनात्मक प्रोत्साहन व्यवस्थाओं का समाधान नहीं करता। भारत के लिए एक प्रभावी एवं सतत नियामक ढाँचे हेतु आयु-आधारित बहिष्करण से आगे बढ़कर प्लेटफॉर्म जवाबदेही, डिजाइन पारदर्शिता तथा उपयोगकर्ता सशक्तीकरण पर आधारित सुदृढ़ डिजिटल गवर्नेंस पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण आवश्यक है।