प्रश्न की मुख्य माँग
- बीसीसीआई (BCCI) को आरटीआई (RTI) अधिनियम के दायरे में शामिल करने के पक्ष में तर्क
- बीसीसीआई को आरटीआई अधिनियम के दायरे से बाहर रखने के पक्ष में तर्क
- आगे की राह।
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उत्तर
परिचय
यद्यपि बीसीसीआई (BCCI) एक निजी संस्था/सोसायटी के रूप में पंजीकृत है, तथापि यह देश में क्रिकेट खेल का नियमन करने, राष्ट्रीय टीम का चयन करने, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने और देश के इस सबसे लोकप्रिय खेल पर एकाधिकार रखने के कारण ‘राज्य-जैसी’ (State-like) एवं ‘सार्वजनिक कार्यों’ (Public Functions) का निर्वहन करती है। यह स्थिति संस्था के भीतर पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न करती है।”
बीसीसीआई (BCCI) को आरटीआई (RTI) अधिनियम के दायरे में शामिल करने के पक्ष में तर्क
- सार्वजनिक कार्य: बीसीसीआई उन कार्यों का निर्वहन करता है, जो सीधे तौर पर राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व और व्यापक जनहित से जुड़े हैं, जैसे कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए खिलाड़ियों का चयन करना।
- एकाधिकार की स्थिति: बीसीसीआई बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा के भारत में क्रिकेट प्रशासन और उसके प्रबंधन पर पूर्ण एवं अनन्य (Exclusive) नियंत्रण रखता है।
- उदाहरण: जी टेलीफिल्म्स बनाम भारत संघ (2005) मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने क्रिकेट प्रशासन में बीसीसीआई की इस सर्वोच्च स्थिति (Dominant Position) को स्वीकार किया था।
- राज्य का समर्थन: बोर्ड को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सार्वजनिक संसाधनों और सरकारी सहायता का लाभ प्राप्त होता है।
- उदाहरण: क्रिकेट मैचों के दौरान सरकारी स्वामित्व वाले स्टेडियमों का उपयोग और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी मात्रा में पुलिस बलों की तैनाती।
- न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Oversight): न्यायालयों ने स्वीकार किया है कि सार्वजनिक कार्यों का निर्वहन करने के कारण बीसीसीआई (BCCI) न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के प्रति जवाबदेह है।
- उदाहरण: बीसीसीआई बनाम क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार (2016) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना था कि संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत बीसीसीआई के विरुद्ध रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) का प्रयोग किया जा सकता है।
- सुधार हेतु सिफारिशें: कई विशेषज्ञ निकायों ने बीसीसीआई को पारदर्शिता कानूनों के दायरे में लाने की अनुशंसा की है।
- उदाहरण: लोढ़ा समिति और विधि आयोग की 275वीं रिपोर्ट (2018) ने सार्वजनिक कार्यों का निर्वहन करने वाले खेल निकायों को आरटीआई (RTI) के अंतर्गत शामिल करने का समर्थन किया था।
बीसीसीआई (BCCI) को आरटीआई (RTI) अधिनियम के दायरे से बाहर रखने के पक्ष में तर्क
- निजी संस्था: बीसीसीआई विधिक रूप से एक निजी संस्था है और यह कोई सांविधिक निकाय नहीं है।
- उदाहरण: केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने यह माना था कि बीसीसीआई तमिलनाडु सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1975 के तहत पंजीकृत है, न कि किसी विशेष कानून (Statute) द्वारा इसका गठन किया गया है।
- राज्य के नियंत्रण का अभाव: भारत सरकार का बीसीसीआई के आंतरिक मामलों और कामकाज पर कोई प्रत्यक्ष, पर्याप्त या व्यापक नियंत्रण नहीं है।
- उदाहरण: केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने यह भी रेखांकित किया था कि बीसीसीआई की समितियों में कोई भी सरकार द्वारा नामित सदस्य शामिल नहीं होता है और इसके पदाधिकारियों का चुनाव आंतरिक रूप से किया जाता है।
- स्वतंत्र वित्तपोषण: बीसीसीआई वित्तीय रूप से एक स्वतंत्र निकाय है, जो राज्य संचित निधि (Consolidated Fund) से किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता या बजटीय अनुदान प्राप्त किए बिना स्वतंत्र रूप से अपना राजस्व सृजित करता है।
- उदाहरण: बोर्ड की अधिकांश आय मीडिया अधिकार (Media Rights), प्रायोजन (Sponsorships), प्रसारण समझौतों (Broadcasting Agreements) और टिकटों की बिक्री के माध्यम से होती है।
- विधिक सीमा: आरटीआई (RTI) अधिनियम की धारा 2(h) के अनुसार, किसी निकाय को ‘लोक प्राधिकारी’ मानने के लिए सरकार द्वारा उसका स्वामित्व, नियंत्रण या ‘पर्याप्त रूप से वित्तपोषित’ होना अनिवार्य है।
- उदाहरण: थलप्पलम् सर्विस कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम केरल राज्य (2013) मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि “नियंत्रण” केवल नाममात्र का नहीं, बल्कि ‘पर्याप्त और व्यापक’ (Substantial and Pervasive) होना चाहिए।
- संवैधानिक स्थिति: सर्वोच्च न्यायालय पहले ही यह निर्णय दे चुका है कि बीसीसीआई (BCCI) संविधान के अनुच्छेद-12 के तहत ‘राज्य’ (State) की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आता है।
- उदाहरण: जी टेलीफिल्म्स बनाम भारत संघ (2005) मामले में, न्यायालय ने निर्णय दिया था कि बीसीसीआई के पास सरकार का वित्तीय और प्रशासनिक प्रभुत्व नहीं है।
आगे की राह
- सीमित आरटीआई : खेल निकायों को आरटीआई (RTI) के दायरे में केवल जनहित से जुड़े कार्यों (जैसे टीम चयन) और राज्य द्वारा प्राप्त सहायता (जैसे स्टेडियम आवंटन) के संदर्भ में ही लाया जाना चाहिए।
- उदाहरण: राष्ट्रीय खेल शासन अधिनियम, 2025 (National Sports Governance Act, 2025) उन खेल निकायों तक आरटीआई के दायरे का विस्तार करता है, जिन्हें सरकारी अनुदान प्राप्त होता है।
- सांविधिक ढाँचा: खेल प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक समर्पित एवं व्यापक खेल शासन कानून लागू किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: लोढ़ा समिति ने बीसीसीआई (BCCI) के प्रशासन में संस्थागत सुधारों और पारदर्शिता के उपायों की सिफारिश की थी।
- वित्तीय पारदर्शिता: खेल निकायों द्वारा सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग और सरकार से मिलने वाली कर-संबंधी रियायतों के विवरण को सार्वजनिक करना अनिवार्य किया जाए।
- स्वतंत्र निरीक्षण: खिलाड़ियों की शिकायतों के निवारण और नैतिक मानदंडों की निगरानी के लिए एक स्वायत्त खेल नियामक प्राधिकरण का गठन किया जाना चाहिए।
- संतुलित स्वायत्तता: खेल निकायों की आंतरिक एवं परिचालन स्वायत्तता को बाधित किए बिना पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- उदाहरण: संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत न्यायिक समीक्षा पहले से ही संस्थागत स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही को संतुलित करने का कार्य करती है।
निष्कर्ष
बीसीसीआई (BCCI) से जुड़ा विवाद वास्तव में ‘राज्य-जैसे कार्यों’ का निर्वहन करने वाले निकायों में ‘निजी स्वायत्तता’ (Private Autonomy) और ‘सार्वजनिक जवाबदेही’ (Public Accountability) के मध्य के व्यापक अंतर्विरोध को दर्शाता है। भारतीय खेल प्रशासन में जनविश्वास, नैतिक शासन और लोकतांत्रिक जवाबदेही को सुदृढ़ करने के लिए एक ‘संतुलित पारदर्शिता ढाँचा’ अत्यंत आवश्यक है।