प्रश्न की मुख्य माँग
- भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्त्वपूर्ण कदम के रूप में वर्ष 1924 के बेलगाम कांग्रेस अधिवेशन पर प्रकाश डालिये।
- इसके महत्त्व की जाँच कीजिए क्योंकि यह महात्मा गाँधी की अध्यक्षता वाला एकमात्र सत्र है
- जन-आंदोलन के लिए कांग्रेस की रणनीति को आकार देने में इसकी भूमिका पर चर्चा कीजिए।
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उत्तर
महात्मा गाँधी की अध्यक्षता में वर्ष 1924 का बेलगाम कांग्रेस अधिवेशन, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्त्वपूर्ण घटना के रूप में जाना जाता है। गाँधी जी की अध्यक्षता में हुये इस सत्र ने अहिंसक जन-आंदोलन के गाँधी जी के दृष्टिकोण को उजागर किया। यह अधिवेशन सांप्रदायिक तनाव और संगठनात्मक कलह जैसी चुनौतियों के बीच हुआ, जिसने स्वराज के प्रति कांग्रेस की प्रतिबद्धता की पुष्टि की और इसके जमीनी स्तर के जुड़ाव को मजबूत किया।
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक महत्त्वपूर्ण कदम के रूप में 1924 के बेलगाम कांग्रेस अधिवेशन की भूमिका
- गाँधी की अध्यक्षता में पहला सत्र: यह सत्र गाँधी जी की अध्यक्षता में आयोजित एकमात्र कांग्रेस बैठक थी, जो स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी नेतृत्वकारी भूमिका का प्रतीक है।
- उदाहरण के लिए: बेलगाम में गाँधी की अध्यक्षता ने परस्पर विरोधी गुटों को एकजुट करने और ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक सुसंगत रणनीति बनाने की उनकी क्षमता को प्रदर्शित किया।
- पार्टी के भीतर संघर्ष का समाधान: इसने गाँधी और स्वराजवादियों के बीच समझौते की पुष्टि की, जिससे अंदरूनी कलह समाप्त हो गई और कांग्रेस में एकता सुनिश्चित हुई।
- उदाहरण के लिए: कांग्रेस ने सरकारी परिषदों में स्वराजवादियों के प्रतिनिधित्व को मान्यता दी, जबकि स्वराजवादियों ने पार्टी की सदस्यता के लिए गाँधी की खादी शर्त को अपनाया।
- सांप्रदायिक दंगों पर प्रतिक्रिया: गाँधी ने सांप्रदायिक हिंसा का मुद्दा उठाया और स्वतंत्रता प्राप्ति में धार्मिक सद्भाव के महत्त्व पर जोर दिया।
- उदाहरण के लिए: उन्होंने कोहाट दंगों को एक गंभीर मुद्दा बताया जिसके लिए सामूहिक आत्मनिरीक्षण और आगे की विभाजनकारी घटनाओं को रोकने के लिए कार्रवाई की आवश्यकता है।
- अस्पृश्यता प्रथा में सुधार के लिए मंच: गाँधी जी ने कांग्रेस को अछूतों की दुर्दशा से परिचित कराया तथा सामाजिक सुधारों को राजनीतिक रणनीतियों में एकीकृत किया।
- कांग्रेस की पहुंच का विस्तार: इस अधिवेशन ने कांग्रेस को एक अभिजात्य संगठन से ग्रामीण और वंचित समुदायों को शामिल करके एक जन आंदोलन में बदल दिया।
- उदाहरण के लिए: अधिवेशन के दौरान गाँधी के निवास के रूप में विद्यारण्य आश्रम की स्थापना ने कांग्रेस तक आम लोगों की पहुंच को सुगम बनाया।
महात्मा गाँधी की अध्यक्षता वाले एकमात्र सत्र के रूप में महत्त्व
- गाँधी का प्रतीकात्मक नेतृत्व: गाँधी की अध्यक्षता ने कांग्रेस को एकजुट करने और स्वतंत्रता आंदोलन के लिए राष्ट्रव्यापी समर्थन को प्रेरित करने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया।
- उदाहरण के लिए: विरोध के बावजूद, उनकी अध्यक्षता ने पार्टी विवादों जैसे कि परिवर्तन के पक्षधर बनाम परिवर्तन के पक्षधर के बीच विवाद को सुलझाने के लिए उनके अधिकार और प्रतिबद्धता को प्रदर्शित किया।
- महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर कांग्रेस का मार्गदर्शन किया: गाँधी ने सांप्रदायिक सद्भाव और सामाजिक-आर्थिक असमानता जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों का समाधान करने का प्रयास किया, जिससे कांग्रेस की प्राथमिकताएँ तय हुईं।
- उदाहरण के लिए: उन्होंने कोहाट दंगों के समाधान के लिए आह्वान किया और धार्मिक एकता को राष्ट्रीय स्वतंत्रता से जोड़ा।
- अहिंसा की वकालत: गाँधी ने अहिंसा के अपने दर्शन की पुष्टि की और स्वतंत्रता आंदोलन के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में इसके महत्त्व पर बल दिया।
- उदाहरण के लिए: उन्होंने चौरी चौरा जैसी हिंसक घटनाओं की निंदा की तथा जनता का समर्थन बनाए रखने के लिए अनुशासित विरोध की वकालत की।
- जमीनी स्तर की राजनीति की शुरुआत: गाँधी की मौजूदगी ने जमीनी स्तर की चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया और स्थानीय मुद्दों को कांग्रेस के एजेंडे में शामिल करने पर जोर दिया।
- उदाहरण के लिए: खादी और ग्रामीण आत्मनिर्भरता पर उनके फोकस ने गांव-स्तर के कुटीर उद्योगों जैसे आंदोलनों को प्रेरित किया।
- एकता को सुदृढ़ बनाना: बेलगाम में गाँधी के नेतृत्व ने एक आम रणनीति के तहत विभिन्न समूहों को एकजुट किया, जिससे कांग्रेस का प्रभाव मजबूत हुआ।
- उदाहरण के लिए: स्वराजवादियों के साथ हुये समझौते ने वैचारिक मतभेदों को दूर किया और विधायी भागीदारी व जन आंदोलन के लिए प्रयासों को संरेखित किया।
जन-आंदोलन के लिए कांग्रेस की रणनीति को आकार देने में भूमिका
- जन समावेश नीति: कांग्रेस ने अपना ध्यान ग्रामीण आबादी और हाशिए पर स्थित समुदायों सहित आम जनता को संगठित करने पर केंद्रित कर दिया।
- उदाहरण के लिए: खादी पर गाँधी के जोर ने एकता और स्वतंत्रता को बढ़ावा देने में आत्मनिर्भरता की भूमिका पर बल दिया।
- विकेंद्रीकृत नेतृत्व मॉडल: इस सत्र में स्थानीय नेतृत्व को केंद्रीय संगठन से जोड़ने और जमीनी स्तर पर भागीदारी बढ़ाने के लिए एक मॉडल स्थापित किया गया।
- उदाहरण के लिए: कार्यकारी सचिव के रूप में जवाहरलाल नेहरू की भूमिका ने जन-आंदोलन में युवा नेताओं की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
- सामाजिक सुधारों पर जोर: कांग्रेस ने अस्पृश्यता उन्मूलन जैसे सामाजिक मुद्दों को अपने व्यापक राजनीतिक मिशन के हिस्से के रूप में
अपनाया।
- उदाहरण के लिए: गाँधी के भाषण ने जाति के मुद्दों को स्वराज के राजनीतिक लक्ष्य के साथ जोड़ दिया , जिससे व्यापक जन समर्थन मिला।
- शांतिपूर्ण विरोध को बढ़ावा देना: गाँधीजी ने शांतिपूर्ण प्रतिरोध की आवश्यकता पर बल दिया और जन आंदोलनों में अनुशासित भागीदारी सुनिश्चित की।
- उदाहरण के लिए: उन्होंने चौरी चौरा हिंसा जैसी घटनाओं से बचने के लिए रणनीतियों की रूपरेखा तैयार की, जिसमें जनता का विश्वास बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित किया गया।
- विधायी भागीदारी का एकीकरण: कांग्रेस ने अपनी जन आंदोलन पहचान को बनाए रखते हुए परिषदों में स्वराजवादियों की भूमिका को स्वीकार किया।
- उदाहरण के लिए: वर्ष 1923 के चुनावों में स्वराज पार्टी की विधायी सफलताओं ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए कांग्रेस के दोहरे दृष्टिकोण को प्रदर्शित किया।
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बेलगाम कांग्रेस अधिवेशन गाँधी वादी नेतृत्व का प्रतीक था, जिसमें जमीनी स्तर पर लामबंदी और एकता पर जोर दिया गया था। आगे बढ़ते हुए, भारत का लोकतांत्रिक ढाँचा ऐसी समावेशी रणनीतियों से सबक ले सकता है, जिससे सहभागी शासन और समुदाय-संचालित सुधारों को बढ़ावा मिले। सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को कम करते हुए नागरिक सहभागिता को मजबूत करने से सत्र की विरासत का सम्मान होगा तथा समग्र विकास और एक प्रत्यास्थ लोकतांत्रिक लोकाचार को बढ़ावा मिलेगा।
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