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Q. जलवायु परिवर्तन के प्रति भारतीय कृषि की संवेदनशीलता को देखते हुए, जैव ईंधन (बायोफ्यूल) उत्पादन की ओर बढ़ते कदमों को खाद्य सुरक्षा और जल संसाधन प्रबंधन के साथ संतुलित किया जाना चाहिए। आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

July 13, 2026

GS Paper IIIEconomy

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत के ऊर्जा संक्रमण में जैव ईंधन (बायोफ्यूल) के विस्तार की आवश्यकता एवं महत्त्व।
  • खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों तथा जलवायु-लचीली कृषि के समक्ष उत्पन्न जोखिम।
  • जैव ईंधन उत्पादन एवं सतत् कृषि प्रबंधन के मध्य संतुलन स्थापित करने के उपाय।

उत्तर

परिचय

भारत का एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम (EBP) कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने तथा किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से संचालित किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति के तहत E20 पेट्रोल मिश्रण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। किंतु जलवायु परिवर्तन के कारण जल की कमी तथा चरम मौसमी घटनाओं के माध्यम से भारतीय कृषि पर पहले से ही दबाव बढ़ चुका है। अतः जैव ईंधन के विस्तार को खाद्य सुरक्षा, जल दक्षता तथा सतत् कृषि पद्धतियों के अनुरूप सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है।

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जैव ईंधन विस्तार का महत्त्व

  • ऊर्जा आयात पर निर्भरता में कमी: एथेनॉल मिश्रण से आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम होती है तथा ऊर्जा सुरक्षा सुदृढ़ होती है।
    • उदाहरण: भारत ने नवंबर 2025 में निर्धारित समय से पाँच वर्ष पूर्व देशव्यापी 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य प्राप्त कर लिया था।
  • ग्रामीण आय में वृद्धि: इससे कृषि जिंसों की अतिरिक्त माँग उत्पन्न होती है तथा किसानों की आय को समर्थन मिलता है।
    • उदाहरण: तेल विपणन कंपनियों (OMCs) द्वारा एथेनॉल की सुनिश्चित खरीद से गन्ना किसानों को लाभ प्राप्त होता है।
  • पर्यावरणीय लाभ: जैव ईंधन, यदि सतत् रूप से उत्पादित किए जाएँ, तो जीवाश्म ईंधनों से होने वाले उत्सर्जन को कम कर सकते हैं।
    • उदाहरण: फसल अवशेषों से उत्पादित द्वितीय पीढ़ी (2G) एथेनॉल पराली दहन को कम कर सकता है।

खाद्य सुरक्षा एवं जल संसाधनों के समक्ष जोखिम

  • ईंधन एवं खाद्य फसलों के मध्य प्रतिस्पर्द्धा: खाद्य फसलों पर आधारित एथेनॉल उत्पादन से कृषि संसाधनों का उपयोग मानव उपभोग के बजाय ईंधन उत्पादन की ओर स्थानांतरित हो सकता है।
    • उदाहरण: गन्ना-आधारित एथेनॉल का उत्पादन अत्यधिक जल-गहन फसल पर निर्भर करता है।
  • जल संकट की तीव्रता में वृद्धि: गन्ने की कृषि पहले से जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में भूजल दोहन को और बढ़ा सकती है।
    • उदाहरण: महाराष्ट्र एवं कर्नाटक, जो गन्ना उत्पादन के प्रमुख राज्य हैं, प्रायः सूखे की स्थिति का सामना करते हैं।
  • इनपुट-गहन कृषि: कुछ एथेनॉल फीडस्टॉक के लिए उर्वरकों एवं जल की अधिक आवश्यकता होती है, जिससे पारिस्थितिकी दबाव बढ़ता है।
  • जलवायु संबंधी संवेदनशीलता: मानसून की अनिश्चितता तथा चरम मौसमी घटनाएँ खाद्य उत्पादन एवं जैव ईंधन आपूर्ति शृंखलाओं दोनों को प्रभावित कर सकती हैं।

आगे की राह

  • विविधीकृत फीडस्टॉक रणनीति को बढ़ावा देना: गन्ने पर निर्भरता कम करते हुए कम जल-गहन स्रोतों को प्रोत्साहित किया जाए।
    • उदाहरण: स्वीट सोरघम, मोटे अनाज तथा कृषि अवशेष अधिक सतत् विकल्प प्रदान कर सकते हैं।
  • जैव ईंधन नीति को जल प्रबंधन से जोड़ना: क्षेत्रीय जल उपलब्धता के आधार पर फसल प्रतिरूप को प्रोत्साहित किया जाए।
    • उदाहरण: जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में सूखा-सहिष्णु फसलों से एथेनॉल उत्पादन को प्रोत्साहन दिया जाए।
  • सतत् उत्पादन के लिए प्रोत्साहन प्रदान करना: फसल अवशेष संग्रहण, भंडारण अवसंरचना तथा स्वच्छ प्रौद्योगिकियों के लिए व्यवहार्यता अंतराल वित्तपोषण (VGF) को समर्थन दिया जाए।

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निष्कर्ष

जैव ईंधन का विस्तार भारत की ऊर्जा सुरक्षा तथा ग्रामीण विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है, किंतु इसके लिए कृषि-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। एक सतत् एथेनॉल नीति का उद्देश्य केवल ईंधन उत्पादन को अधिकतम करना नहीं होना चाहिए, बल्कि संसाधन-दक्ष फीडस्टॉक, खाद्य सुरक्षा तथा जलवायु-लचीली कृषि को प्राथमिकता देना चाहिए।

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Given the vulnerabilities of Indian agriculture to climate change, the shift towards biofuel production must be calibrated with food security and water resource management. Critically analyze. in hindi

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