प्रश्न की मुख्य माँग
- असहयोग आंदोलन (1920–1922) के दौरान रचनात्मक कार्यक्रम को रेखांकित कीजिए।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–1934) के दौरान रचनात्मक कार्यक्रम को रेखांकित कीजिए।
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उत्तर
महात्मा गांधी के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता और सामाजिक परिवर्तन एक-दूसरे से अविभाज्य थे। असहयोग और सविनय अवज्ञा जैसे जन आंदोलनों के साथ-साथ उनके रचनात्मक कार्यक्रमों का उद्देश्य नैतिक, आर्थिक और सामाजिक आत्मनिर्भरता का निर्माण करना था।
असहयोग आंदोलन (1920–1922) के दौरान रचनात्मक कार्यक्रम
- खादी और चरखा आंदोलन: गांधीजी ने खादी को राष्ट्रीय गौरव और आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनाया। उन्होंने प्रत्येक भारतीय से प्रतिदिन चरखा चलाकर सूत कातने का आह्वान किया, जिससे ग्रामोद्योगों के पुनरुत्थान का जन आंदोलन खड़ा हुआ।
- उदाहरण: चरखे को राष्ट्रीय आंदोलन के प्रतीक के रूप में अपनाया गया, जिसका प्रतिबिंब राष्ट्रीय ध्वज में भी दिखाई दिया।
- राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना: गांधीजी ने छात्रों से औपनिवेशिक विद्यालयों और महाविद्यालयों का बहिष्कार करने तथा उनके स्थान पर भारतीयों द्वारा संचालित संस्थानों में प्रवेश लेने का आग्रह किया, जहाँ राष्ट्रवादी मूल्यों और व्यावसायिक कौशल का विकास हो।
- उदाहरण: काशी विद्यापीठ (1921) की स्थापना इसी काल में हुई, जहाँ शिक्षा भारतीय भाषाओं में प्रदान की गई।
- विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार: गांधीजी ने ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं, विशेषकर कपड़े, के बहिष्कार और स्वदेशी उत्पादों के उपयोग का आह्वान किया, जिससे देशी उद्योगों को प्रोत्साहन मिले।
- उदाहरण: प्रमुख आंदोलनों के दौरान विदेशी वस्त्रों की सार्वजनिक होली जलाई गई।
- मद्यनिषेध अभियान: गांधीजी ने संयम को नैतिक और सामाजिक उत्थान से जोड़ा। उन्होंने कांग्रेस स्वयंसेवकों को मदिरा की दुकानों के सामने धरना देने और शराब के सेवन को हतोत्साहित करने के लिए प्रेरित किया।
- उदाहरण: मदिरा दुकानों पर धरना एक प्रमुख अहिंसक प्रतिरोध का रूप बना, जिसमें महिलाओं की सक्रिय भागीदारी रही।
- हिंदू-मुस्लिम एकता का संवर्द्धन: गांधीजी ने एक संयुक्त राष्ट्रवादी मोर्चा बनाने हेतु अंतरधार्मिक सद्भाव पर बल दिया। खिलाफत आंदोलन के प्रति उनका समर्थन विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच सहयोग स्थापित करने की उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–1934) के दौरान रचनात्मक कार्यक्रम
- खादी और ग्रामोद्योगों पर पुनः बल: गांधीजी ने पुनः खादी को प्रतिरोध के केंद्र में स्थापित किया। इसके साथ ही उन्होंने साबुन निर्माण, तेल घानी, चमड़ा उद्योग जैसे अन्य ग्राम शिल्पों को प्रोत्साहित किया, ताकि ग्रामीण आत्मनिर्भरता सुदृढ़ हो सके।
- अस्पृश्यता उन्मूलन अभियान: पूना समझौते (1932) के बाद गांधीजी ने अस्पृश्यता समाप्त करने तथा दलितों को राष्ट्रीय मुख्यधारा में सम्मिलित करने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया।
- उदाहरण: वर्ष 1932 में हरिजन सेवक संघ की स्थापना की गई।
- सांप्रदायिक सद्भाव का संवर्द्धन: 1930 के दशक के प्रारंभ में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव के बीच गांधीजी ने भाषणों, उपवासों और विभिन्न समुदायों के नेताओं से संवाद के माध्यम से धार्मिक सद्भाव का संदेश सुदृढ़ किया।
- रचनात्मक कार्यों में महिलाओं की भागीदारी: गांधीजी का विश्वास था कि महिलाएँ सूत कातने, शिक्षण और सामाजिक सेवा जैसे रचनात्मक कार्यों के माध्यम से समाज में परिवर्तन ला सकती हैं।
- उदाहरण: कमलादेवी चट्टोपाध्याय, दुर्गाबाई देशमुख आदि ने खादी प्रचार, राष्ट्रीय विद्यालयों में शिक्षण तथा हरिजन उत्थान के कार्यों में नेतृत्व किया।
- ग्राम स्वराज की अवधारणा: गांधीजी ने ‘ग्राम स्वराज’ की संकल्पना को आगे बढ़ाया—आत्मनिर्भर ग्राम गणराज्य, जो स्वराज की आधारशिला हों।
- सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध अभियान: गांधीजी ने रचनात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से बाल विवाह और अस्पृश्यता जैसी कुरीतियों को चुनौती दी।
- उदाहरण: गाँवों में उनके भाषण राष्ट्रवाद के साथ सामाजिक आलोचना को जोड़ते थे, जिससे रचनात्मक कार्य नैतिक शिक्षा का माध्यम बन गया।
निष्कर्ष
इस प्रकार, गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम स्वतंत्रता संग्राम के परिधीय नहीं, बल्कि उसके केंद्रीय अंग थे। स्वदेशी उद्योगों के प्रोत्साहन, सामाजिक सुधार और जमीनी सशक्तीकरण के माध्यम से उन्होंने आत्मनिर्भर समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। इन कार्यक्रमों का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि गांधीजी का दृष्टिकोण केवल राजनीतिक आंदोलन तक सीमित नहीं था, बल्कि राष्ट्र के दीर्घकालिक पुनर्निर्माण की व्यापक परिकल्पना से जुड़ा हुआ था।
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