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Q. सार्वजनिक संस्थाओं में जाति-आधारित भेदभाव गहरी सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियों को दर्शाता है। शासन संरचनाओं में विशिष्टता और असमानता के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

October 13, 2025

GS Paper IIGovernance

प्रश्न की मुख्य माँग

  • शासन संरचना में विशिष्टता के संदर्भ में सार्वजनिक संस्थाओं के अंतर्गत जाति-आधारित भेदभाव।
  • शासन संरचना में असमानता के संदर्भ में सार्वजनिक संस्थाओं के अंतर्गत जाति-आधारित भेदभाव।
  • शासन संरचना में विशिष्टता और असमानता को दूर करने के उपाय।

उत्तर

सार्वजनिक संस्थाओं में जाति-आधारित भेदभाव यह उजागर करता है कि कैसे शासन संरचनाओं में सामाजिक पदानुक्रम कायम रहता है, जो समानता और समावेशन को कमजोर करता है। संवैधानिक सुरक्षा उपायों के बावजूद, वाई. पूरन कुमार की आत्महत्या जैसी घटनाएँ दर्शाती हैं कि संस्थागत संस्कृतियाँ अक्सर व्यापक समाज की विशिष्टता और पूर्वाग्रह को प्रतिबिंबित करती हैं।

सार्वजनिक संस्थाओं के भीतर जाति-आधारित भेदभाव गहरे सामाजिक पहलुओं को दर्शाता है

शासन संरचना में विशिष्टता के संदर्भ में

  • निर्णय लेने में संरचनात्मक रूप से कम प्रतिनिधित्व और बहिष्कार: संवैधानिक गारंटी के बावजूद, नौकरशाही और शिक्षा जगत के उच्च स्तरों पर हाशिए पर पड़े समुदायों का प्रतिनिधित्व कम है।
  • कार्य संस्कृति में संस्थागत पूर्वाग्रह और भेदभाव: सार्वजनिक विश्वविद्यालयों, अस्पतालों और प्रशासन में सूक्ष्म जाति-आधारित पूर्वाग्रह मौजूद हैं, जिससे बहिष्कार का माहौल बनता है।
    • उदाहरण: हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला मामले (2016) ने उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रणालीगत जातिगत पूर्वाग्रह को उजागर किया।
  • सुरक्षात्मक तंत्रों का कमजोर कार्यान्वयन: अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 और आरक्षण मानदंड जैसे कानूनों का सामान्यत: प्रशासनिक निष्क्रियता और जवाबदेही की कमी के कारण पूर्ण रूप से अनुपालन नहीं हो पाता  है।
  • संवेदनशीलता और विविधता प्रशिक्षण का अभाव: अधिकांश सार्वजनिक संस्थानों में अधिकारियों के लिए संरचित जातिगत संवेदनशीलता प्रशिक्षण का अभाव है, जिसके कारण अनजाने में अधिकारियों द्वारा बहिष्कार संबंधी व्यवहार देखने को मिलता है।
  • विश्वास की कमी और संस्थाओं से अलगाव: लगातार भेदभाव हाशिए पर पड़े समूहों के बीच सार्वजनिक संस्थाओं के प्रति विश्वास को कमजोर करता है, जिससे लोकतांत्रिक वैधता नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।

शासन संरचना में असमानता के संदर्भ में

  • असमान प्रतिनिधित्व: सकारात्मक कार्रवाई के बावजूद, उच्च नौकरशाही और शिक्षा जगत में हाशिए पर पड़े समूहों का प्रतिनिधित्व कम है, जिससे समावेशी निर्णय लेने में बाधा आ रही है।
  • भर्ती और पदोन्नति में संस्थागत बाधाएँ: भर्ती, मूल्यांकन और पदोन्नति में असमानताएँ सार्वजनिक संस्थानों में असमानता को बढ़ाती हैं।
    • उदाहरण: NCSC (2022) ने कई केंद्रीय विश्वविद्यालयों को आरक्षित संकाय पदों को भरने में विफल रहने के लिए चिह्नित किया; IIT और IIM में SC/ST संकाय का प्रतिनिधित्व <10% है।
  • सामाजिक पूर्वाग्रह और भेदभावों का व्याप्त रहना: सूक्ष्म जातिगत पूर्वाग्रह कार्यस्थल संस्कृति और प्रशासनिक निष्पक्षता को प्रभावित करते हैं, जिससे बहिष्कार और अलगाव की भावना उत्पन्न होती है।
  • सकारात्मक और सुरक्षात्मक तंत्रों का कमजोर कार्यान्वयन: अनुच्छेद-16(4) और SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 जैसे मौजूदा सुरक्षा उपायों को कमजोर प्रवर्तन और संस्थागत उदासीनता का सामना करना पड़ रहा है।
    • उदाहरण: कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की वार्षिक रिपोर्टों में आरक्षण रोस्टर और शिकायत निवारण तंत्र के अनुपालन में कमी का उल्लेख किया गया है।

शासन संरचना में विशिष्टता और असमानता को दूर करने के उपाय

  • सार्वजनिक संस्थानों में प्रतिनिधित्व और विविधता को मजबूत बनाना: भर्ती और पदोन्नति में, विशेष रूप से उच्च नौकरशाही, शिक्षा जगत और सार्वजनिक क्षेत्र में, आरक्षण नीतियों का पूर्ण कार्यान्वयन सुनिश्चित करना।
  • निगरानी और जवाबदेही तंत्र को मजबूत बनाना: आरक्षण और भेदभाव के मामलों की निगरानी के लिए NCSC, NCST और OBC आयोग जैसे निकायों को अर्द्ध-न्यायिक शक्तियों और डिजिटल डैशबोर्ड से सशक्त बनाना।
  • समावेशी नेतृत्व और निर्णय लेने को बढ़ावा देना: समितियों, बोर्डों और नीतिगत पैनलों में विविधता कोटा अपनाना ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कमजोर वर्गों के हितों को संबोधित किया जा सके।
    • उदाहरण: केरल के सहभागी नियोजन मॉडल (जन योजना अभियान) ने स्थानीय निर्णय लेने में दलितों और आदिवासियों को सफलतापूर्वक शामिल किया।
  • शैक्षणिक और क्षमता निर्माण हस्तक्षेप: हाशिए पर पड़े समूहों के लिए उच्च शिक्षा, मार्गदर्शन और सिविल सेवा तैयारी कार्यक्रमों तक पहुँच बढ़ाना।
    • उदाहरण: UPSC की SC/ST/OBC प्रशिक्षण (कोचिंग) योजनाएँ और पीएम-यशस्वी फेलोशिप (2023) उच्च सेवाओं में प्रतिनिधित्व में सुधार करती हैं।

निष्कर्ष

संस्थाओं के भीतर जातिगत पूर्वाग्रह संवैधानिक नैतिकता और प्रशासनिक सहानुभूति की गहरी विफलता को दर्शाता है। समावेशी शासन के निर्माण के लिए मजबूत प्रतिनिधित्व, संवेदनशीलता और जवाबदेही की आवश्यकता होती है ताकि सार्वजनिक संस्थाएँ डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा परिकल्पित संविधान की समतावादी भावना को सही मायने में मूर्त रूप दे सकें।

Caste-based discrimination within public institutions reflects deeper social and administrative challenges. Analyse this statement in the context of exclusivity and inequality in governance structures. in hindi

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