Q. संवैधानिक सुरक्षा उपायों के बावजूद, शिक्षित और कार्यरत वर्गों में भी जाति-आधारित पूर्वाग्रह बने हुए हैं। भारत में शहरी और व्यावसायिक क्षेत्रों में जाति चेतना की निरंतरता का मूल्यांकन कीजिए। (150 शब्द, 10 अंक)

October 25, 2025

GS Paper IIndian Society

प्रश्न की मुख्य माँग

  • जाति चेतना की निरंतरता दर्शाने वाले तर्क।
  • जाति चेतना के क्षरण या परिवर्तन को दर्शाने वाले तर्क।

उत्तर

जाति, यद्यपि संविधान द्वारा भेदभाव के आधार के रूप में निषिद्ध है, फिर भी भारत में सामाजिक व्यवहार और समूह पहचान को प्रभावित करती रहती है। शहरीकरण, शिक्षा और व्यावसायिक गतिशीलता से अपेक्षा की गई थी कि वे जातिगत पदानुक्रम को कमजोर करेंगे, परंतु सामाजिक दृष्टिकोण और नेटवर्क अक्सर नई रूपों में जाति चेतना को पुनः उत्पन्न करते हैं।

जाति चेतना की निरंतरता दर्शाने वाले तर्क

  • विवाह चयन में जाति की स्थायी भूमिका: शहरी शिक्षा और आधुनिक जीवनशैली के बावजूद विवाह संबंधों में जाति सीमाएँ बनी हुई हैं। मेट्रिमोनियल साइट्स और पारिवारिक गठबंधन अब भी जातीय संगतता को व्यक्तिगत पसंद से अधिक प्राथमिकता देते हैं।
  • पेशेवर एवं संस्थागत क्षेत्रों में सूक्ष्म पूर्वाग्रह:  कार्यस्थल की शृंखलाएँ अक्सर सामाजिक संरचना को प्रतिबिंबित करती हैं। CSDS (2018) के अध्ययन से पता चलता है कि अकादमिक, मीडिया और नौकरशाही में उच्च जातियों का वर्चस्व बना हुआ है, जो औपचारिक समानता के बावजूद विशेषाधिकार की निरंतरता को दर्शाता है।
  • शहरी क्षेत्रों में सामाजिक और आवासीय विभाजन: शहरी आवास और छात्रावासों में छिपा हुआ बहिष्कार देखा जा सकता है, जहाँ लोग समान जातीय पृष्ठभूमि वाले पड़ोसों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे वास्तविक सामाजिक एकीकरण बाधित होता है।
  • डिजिटल और सार्वजनिक विमर्श में जाति अभिव्यक्ति:  सोशल मीडिया अब जातीय गौरव और पहचान के नए मंच बन गए हैं। इससे कुछ समूहों में एकजुटता बढ़ी है, लेकिन साथ ही डिजिटल ध्रुवीकरण भी गहराया है।

जाति चेतना के क्षरण या परिवर्तन के तर्क

  • योग्यता और प्रदर्शन द्वारा सामाजिक स्थिति का पुनर्निर्धारण: कॉरपोरेट, स्टार्ट-अप और सरकारी संस्थान अब कौशल और उत्पादकता को जाति से अधिक महत्त्व देते हैं, जिससे पारंपरिक पदानुक्रम कमजोर हो रहा है।
  • पेशेवर सहयोग से सामाजिक सीमाओं का क्षरण:  साझा कार्य-लक्ष्य और संगठनात्मक पहचान जातीय सीमाओं के पार सहयोग को प्रोत्साहित करती है, जिससे पेशेवर एकजुटता विकसित होती है।
  • शहरी गतिशीलता से सामाजिक मिश्रण को बढ़ावा:  प्रवासन और शहर जीवन सामुदायिक निगरानी को कमजोर करते हैं, जिससे व्यक्ति विविध नेटवर्क बना सकते हैं और अपनी पहचान को जातीय संबंधों से स्वतंत्र रूप से पुनर्परिभाषित कर सकते हैं।
  • वंचित वर्गों का सशक्तीकरण और आत्म-अभिव्यक्ति:  शैक्षणिक प्रगति और आरक्षण नीति ने दलित और ओबीसी वर्गों को सशक्त बनाया है, जिससे वे सम्मान और समानता के साथ उच्च संस्थानों में जातिगत बहिष्कार को चुनौती दे रहे हैं।

निष्कर्ष

संविधान के अनुच्छेद-14, 15, 16 और 17 द्वारा प्रदत्त कानूनी गारंटी के बावजूद, जाति चेतना सूक्ष्म रूपों में बनी हुई है। सच्ची सामाजिक समानता के लिए केवल कानूनी सुरक्षा ही नहीं, बल्कि मानसिक परिवर्तन और डॉ. भीमराव अंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता की भावना का दैनिक जीवन में अनुपालन आवश्यक है।

Despite constitutional safeguards, caste-based prejudices persist even among the educated and employed classes. Evaluate the persistence of caste consciousness in urban and professional spaces in India. in hindi

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