प्रश्न की मुख्य माँग
- केंद्र-राज्य गतिशीलता का पुनर्निर्माण।
- सहकारी संघीय संतुलन की बहाली।
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उत्तर
चंडीगढ़ को सीधे अनुच्छेद-240 के अधीन लाने की केंद्र सरकार की पहल ने पंजाब की दीर्घकालिक भू-क्षेत्रीय और प्रशासनिक चिंताओं को पुनर्जीवित कर दिया है। हालिया विमर्शों में यह स्पष्ट हुआ कि यह प्रस्ताव पुराने आक्रोशों को फिर से पुनर्जीवित करता है, प्राधिकरण के प्राधिकार को कम करने की आशंकाएँ बढ़ाता है तथा एक संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में संघीय संतुलन के नए प्रश्न उत्पन्न करता है।
केंद्र–राज्य संबंधों के पुनर्गठन के संकेत
सकारात्मक प्रभाव
- प्रशासनिक एकरूपता: चंडीगढ़ को अन्य केंद्रशासित प्रदेशों की तरह संचालित करने से निर्णय-प्रक्रिया सरल और त्वरित हो सकती है।
- उदाहरण: उपराज्यपाल की नियुक्ति आपात अवस्थाओं में त्वरित नीति-निर्यात सुनिश्चित कर सकती है।
- सुदृढ़ सुरक्षा पर्यवेक्षण: एक संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण प्रत्यक्ष केंद्रीय नियंत्रण से सुरक्षा बलों की त्वरित तैनाती और सतत् निगरानी संभव होती है।
- संसाधनों का बेहतर प्रबंधन: जल और अवसंरचना से जुड़े अंतर-राज्यीय विवादों को केंद्र स्तर पर बिना गतिरोध के अधिक प्रभावी ढंग से निपटाया जा सकता है।
- उदाहरण: भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड से जुड़े विवादों का अधिक संरचित समाधान।
- दोहरे प्रशासनिक ढाँचे का अंत: पंजाब–हरियाणा के संयुक्त नियंत्रण की समाप्ति से अधिकारियों की तैनाती और प्रशासनिक समन्वय में घर्षण कम होता है।
- उदाहरण: वर्तमान 60:40 अधिकारी-वितरण निर्णय प्रक्रिया को धीमा करता है।
- वित्तीय क्षमता में सुधार: प्रत्यक्ष केंद्रीय सहायता से चंडीगढ़ के अवसंरचना और सार्वजनिक सेवाओं के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध होंगे, जिसका परोक्ष लाभ पंजाब से जुड़े निवासियों को भी मिलेगा।
नकारात्मक प्रभाव
- पंजाब के ऐतिहासिक दावों का ह्रास: इस कदम से वह दीर्घकालिक अपेक्षा कमजोर होती है कि चंडीगढ़ अंततः पूर्ण रूप से पंजाब को सौंपा जाएगा।
- उदाहरण: वर्ष 1966 के पुनर्गठन के समय चंडीगढ़ को पंजाब को देने का वादा अब तक अधूरा है।
- केंद्र के अति-हस्तक्षेप की धारणा: एक ऐसे सीमावर्ती राज्य में, जिसने अतीत में अस्थिरता देखी है, एकतरफा निर्णय को राज्य की स्वायत्तता में हस्तक्षेप के रूप में देखा जाता है।
- पंजाब की प्रशासनिक भूमिका का सिमटना: अनुच्छेद-240 के लागू होने से पंजाब का उस नगर पर प्रभाव घटता है, जिसे वह अपनी राजधानी मानता है।
- उदाहरण: पंजाब कैडर के स्थान पर AGMUT कैडर के अधिकारियों की बढ़ती तैनाती।
- राजनीतीकरण और पहचान-संबंधी चिंता: चंडीगढ़ पंजाबी पहचान से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है; बिना सहमति किए गए निर्णय सुप्त असंतोष को जगाते हैं।
- संघीय मानदंडों पर दबाव: बिना सहयोगी संवाद के किए गए कदम संघ–राज्य विश्वास को कमजोर करते हैं।
- उदाहरण: हरियाणा जल-वितरण विवाद में BBMB और केंद्र की कथित एकपक्षीयता के कारण तनाव बढ़ा।
सहयोगी संघवाद की पुनर्स्थापना के उपाय
- संरचित केंद्र–पंजाब परामर्श तंत्र: औपचारिक संवाद तंत्र अविश्वास कम करता है और प्रशासनिक परिवर्तनों से पहले सहमति विकसित करता है।
- उदाहरण: चंडीगढ़ की स्थिति पर संयुक्त समिति जैसा ढाँचा।
- पंजाब के सांस्कृतिक और प्रशासनिक हितों की सुरक्षा: योजना निकायों में पंजाब की प्रतिनिधिक भागीदारी सुनिश्चित कर उसके प्रतीकात्मक और कार्यकारी हितों की रक्षा की जा सकती है।
- अधिकारी तैनाती के पारदर्शी नियम: AGMUT बनाम पंजाब–हरियाणा कैडर की तैनाती के स्पष्ट मानक भय और भ्रम को कम करेंगे।
- उदाहरण: निश्चित कोटा या चक्रीय तैनाती मॉडल।
- जल एवं संसाधन विवादों का संतुलित समाधान: BBMB जैसे निकायों की निष्पक्षता और विवाद-निपटान प्रक्रियाओं को सुदृढ़ करना आवश्यक है।
- संवेदनशीलता-आधारित शासन: ऐसे सीमावर्ती राज्य में, जहाँ ऐतिहासिक समस्याएँ मौजूद हैं, प्रशासनिक दक्षता के साथ सहानुभूति और संवाद भी अनिवार्य हैं।
- उदाहरण: पंजाब विश्वविद्यालय से जुड़े ढाँचागत परिवर्तनों पर पूर्व-परामर्श से विरोध टला और निर्णय वापस लिए गए।
निष्कर्ष
एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में, जहाँ प्रतीक और भावनाएँ अत्यधिक महत्त्व रखते हैं, चंडीगढ़ की शासन-व्यवस्था में किसी भी परिवर्तन के लिए सावधानी, परामर्श और संवैधानिक स्पष्टता आवश्यक है। सहानुभूति, संवाद और सहयोगी संघवाद पर आधारित सुधार ही तनावों को रोक सकते हैं और पंजाब तथा संघ सरकार के बीच विश्वास को पुनर्स्थापित कर सकते हैं।
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