प्रश्न की मुख्य माँग
- भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियाँ
- इन चुनौतियों से निपटने के उपाय।
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उत्तर
वैश्विक व्यवस्था में मुक्त व्यापार और बहुपक्षीय ढाँचों से हटकर संरक्षणवाद और द्विपक्षीयता की ओर परिवर्तन के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था को अब कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025 में बढ़ते आर्थिक विखंडन की चेतावनी दी गई है, जहाँ व्यापार बाधाएँ और गुट-आधारित गठबंधन भारत की वृद्धि, प्रतिस्पर्द्धात्मकता तथा वैश्विक बाजार तक पहुँच के लिए चुनौतियाँ खड़ी कर रहे हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियाँ
- बाजार पहुँच में कमी: प्रमुख गंतव्यों में लगाए गए टैरिफ और गैर-टैरिफ उपाय भारत की निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता के लिए खतरा हैं।
- उदाहरण: यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा नियमों और अमेरिकी टैरिफ संबंधी कार्रवाइयों पर बहस भारतीय वस्तुओं के लिए बढ़ती प्रवेश बाधाओं को दर्शाती है।
- निवेश अनिश्चितता: विकसित देश, विदेशी निवेश पर नियंत्रण कड़ा कर रहे हैं। इससे भारतीय कंपनियों द्वारा फर्मों को खरीदने या नई तकनीक हासिल करने में बाधा आ सकती है, जिससे उच्च-तकनीकी उद्योगों में उनकी बढ़त कम हो जाती है।
- मुद्रास्फीति का दबाव: विदेशों में निर्यात प्रतिबंधों से इनपुट लागत और अनिश्चितता बढ़ जाती है।
- उदाहरण: वस्तु निर्यात नियंत्रण और युद्ध से संबंधित कीमतों में उछाल ने भारत के आयात बिल को बढ़ा दिया है और आपूर्ति को बाधित किया है।
- सेवाओं और गतिशीलता पर दबाव: उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में कठोर वीजा व्यवस्था और डेटा नियम भारत के IT-BPM निर्यात और कुशल श्रमिकों के आवागमन को सीमित कर सकते हैं, जिससे अधिशेष के एक प्रमुख स्रोत पर असर पड़ सकता है।
- अस्थिर पूँजी प्रवाह: वैश्विक अनिश्चितता के कारण पूँजी का बहिर्वाह हो सकता है, रुपये का अवमूल्यन हो सकता है और भारतीय कंपनियों के लिए उधार लेने की लागत बढ़ सकती है।
इन चुनौतियों का सामना करने के उपाय
- निर्यात बाजारों में विविधता लाना: कुछ ही बाजारों पर निर्भरता कम करने के लिए अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और मध्य पूर्व में बिक्री बढ़ाना।
- उदाहरण: भारत-अफ्रीका, भारत-UAE CEPA।
- घरेलू विनिर्माण को मजबूत करना: स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने, आयात कम करने और उच्च मूल्य वाले निर्यात बढ़ाने के लिए PLI और मेक इन इंडिया का उपयोग करना।
- उदाहरण: इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मा क्षेत्र।
- रणनीतिक व्यापार समझौते: शुल्क कटौती और मानकों तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए स्मार्ट द्विपक्षीय या क्षेत्रीय समझौते करना।
- उदाहरण: ब्रेक्सिट के बाद भारत-U.K. FTA वार्ता।
- ग्लोबल वैल्यू चेन (GVC) में एकीकृत करना: इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और IT में ग्लोबल वैल्यू चेन (GVC) से जुड़कर विस्तार करना, विशेषज्ञता हासिल करना और अधिक निर्यात करना।
- व्यापार सुगमता और प्रौद्योगिकी उन्नयन: निर्यातकों के लिए समय और लागत कम करने के लिए बंदरगाहों, सीमा शुल्क और डिजिटल व्यापार प्रणालियों में सुधार करना।
- उदाहरण के लिए: कागज रहित व्यापार पहल।
निष्कर्ष
भारत चुनिंदा, उच्च गुणवत्ता वाले मुक्त व्यापार समझौतों को क्षमता बढ़ाने वाली औद्योगिक नीति के साथ जोड़ सकता है, साथ ही विश्व व्यापार संगठन (WTO) सुधारों और व्यावहारिक गठबंधनों का समर्थन कर सकता है। मानक-अनुरूप निर्यात और विश्वसनीय आपूर्ति साझेदारी से विश्वसनीयता मजबूत होगी, निवेश आकर्षित होगा और एक भरोसेमंद वैश्विक आर्थिक भागीदार के रूप में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
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