प्रश्न की मुख्य माँग
- संवैधानिक वादों और व्यवहार में लैंगिक समानता के बीच अंतर का परीक्षण कीजिए।
- नारीवादी विचारधारा को लागू करने की चुनौतियों और अवसरों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
- संवैधानिक वादों और वास्तविकता के बीच इन अंतरालों को दूर करने के उपाय सुझाइये।
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उत्तर
भारतीय संविधान में एक ऐसा समाज बनाने की आकांक्षा करी गई है, जहाँ लैंगिक समानता एक मुख्य सिद्धांत हो। इसके बावजूद, 2024 के वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक में भारत की रैंकिंग 146 देशों में से 129वें स्थान पर आ गई, जिसका मुख्य कारण ‘शैक्षणिक उपलब्धि’ और ‘राजनीतिक सशक्तीकरण’ में असफलता है। इस सूचकांक में भारत की रैंकिंग,संवैधानिक आदर्शों और जमीनी हकीकतों के बीच के स्थायी अंतर को दर्शाती हैं, जो सुधारों की तत्काल आवश्यकता को उजागर करती है।
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लैंगिक समानता सुनिश्चित करने वाले संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 14: सभी नागरिकों के लिए विधि के समक्ष समानता और विधियों का समान संरक्षण सुनिश्चित करता है।
- अनुच्छेद 15(1): धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर होने वाले भेदभाव पर रोक लगाता है।
- अनुच्छेद 15(3): राज्य को ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करने के लिए महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है।
- अनुच्छेद 16: सार्वजनिक रोजगार में पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान अवसर को बढ़ावा देता है।
- अनुच्छेद 39(a): इस बात पर बल देता है, कि पुरुषों और महिलाओं को आजीविका के अवसरों तक समान पहुँच होनी चाहिए।
- अनुच्छेद 42: राज्य को न्यायोचित एवं मानवीय कार्यदशायें तथा प्रसूति सुविधा सुनिश्चित करने का अधिकार देता है।
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लैंगिक समानता के संबंध में संवैधानिक वादों और वास्तविकता के बीच अंतर
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी: शासन में महिलाओं की भागीदारी न्यूनतम बनी हुई है, जिससे समानता के संबंध में नीतियाँ बनाने की उनकी क्षमता सीमित हो गई है।
- उदाहरण के लिए: 18वीं लोकसभा में महिलाओं की संख्या केवल 13.6% है, जो उनके बेहतर प्रतिनिधित्व की आवश्यकता को दर्शाता है।
- घरेलू हिंसा: लगातार होने वाली घरेलू हिंसा की घटनायें सुरक्षात्मक कानूनों के कमजोर प्रवर्तन को दर्शाती है, जिससे महिलाएँ अपने घरों में असुरक्षित रहती हैं।
- उदाहरण के लिए: NFHS-5 (2019-21) के आँकड़ों से पता चलता है कि 18-49 वर्ष की आयु की 29.3% विवाहित महिलाओं को मौजूदा कानूनों के बावजूद वैवाहिक हिंसा का सामना करना पड़ा है।
- आर्थिक भागीदारी: संवैधानिक सुरक्षा उपायों के बावजूद महिलाओं को कार्यबल में प्रवेश करने और वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
- उदाहरण के लिए: महिलाओं के लिए श्रम बल भागीदारी दर (F-LFPR) 2022-23 में बढ़कर 37.0% हो गई, लेकिन वेतन अंतर जैसी बाधाएँ बनी हुई हैं।
- शैक्षिक असमानता: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक सीमित पहुँच और कम उम्र में होने वाला विवाह, महिलाओं के विकास और सशक्तिकरण को बाधित करता हैं।
- उदाहरण के लिए: हालाँकि महिलाओं की साक्षरता दर 77% तक बढ़ गई है परंतु ग्रामीण साक्षरता दर अभी 67.77% ही है।
- बाल विवाह का प्रचलन: यद्यपि इसमें कमी आ रही है, फिर भी बाल विवाह लड़कियों की शिक्षा और आत्मनिर्भरता के अवसरों को प्रभावित कर रहा है।
नारीवादी विचारधारा को लागू करने में आने वाली चुनौतियाँ
- कमजोर संस्थाएँ: लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार संगठनों में अक्सर पर्याप्त संसाधन, स्वायत्तता और प्रवर्तन शक्तियों की कमी होती है, जिससे प्रणालीगत मुद्दों का समाधान करने की उनकी क्षमता सीमित हो जाती है।
- उदाहरण के लिए: NCW सीमित जाँच शक्तियों के साथ कार्य करता है, जिससे अधिक शिकायतों का समाधान करने की इसकी क्षमता सीमित हो जाती है।
- खंडित नीतियाँ: महिला-केंद्रित योजनाओं के प्रति असंगत दृष्टिकोण उनके प्रभाव को कम करते हैं और परस्पर जुड़े मुद्दों का समाधान करने में विफल होते हैं।
- उदाहरण के लिए: बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना ने अपनी निधि का 56% से अधिक हिस्सा, प्रत्यक्ष मध्यक्षेपों के बजाय प्रचार-प्रसार पर खर्च कर दिया जिसके परिणामस्वरूप बाल लिंग अनुपात और महिला शिक्षा में न्यूनतम सुधार हुआ।
- कानूनी खामियाँ: कानूनी ढाँचे में कई भेदभावपूर्ण प्रथाएँ अभी भी व्याप्त हैं, जो लैंगिक समानता की प्राप्ति में बाधा डालने वाली प्रणालीगत खामियों को दर्शाती हैं।
- उदाहरण के लिए: भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 में मैरिटल रेप को बलात्कार की परिभाषा से बाहर रखा गया है, जब तक कि पत्नी की आयु 15 वर्ष से कम न हो, जिससे महिलाओं के लिए कानूनी सुरक्षा के संबंध में एक महत्त्वपूर्ण कमी रह जाती है।
- आर्थिक बाधाएँ: वेतन में अंतर, ऋण तक सीमित पहुँच और कार्यस्थल पर भेदभाव, महिलाओं की वित्तीय स्वतंत्रता को बाधित करते रहते हैं।
- उदाहरण के लिए: भारत की महिलाएँ कुल श्रम आय का केवल 18% कमाती हैं , जबकि पुरुष 82% कमाते हैं (विश्व असमानता रिपोर्ट, 2022)।
- शैक्षिक बाधाएँ: लैंगिक रूढ़िवादिता लड़कियों को उच्च शिक्षा या कौशल-आधारित प्रशिक्षण प्राप्त करने से हतोत्साहित करती है।
- उदाहरण के लिए: PLFS 2021-22 के अनुसार, 33.6% महिलाओं ने श्रम बल में गैर-भागीदारी के लिए शिक्षा को एक कारण बताया, लेकिन सामाजिक मानदंड उन्हें अभी भी इस मामले में पीछे रख रहे हैं।
नारीवादी विचारधारा को लागू करने के अवसर
- विधायी समर्थन: शासन में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के उद्देश्य से बनाए गए कानून, समावेशिता और न्यायसंगत निर्णयन को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं।
- उदाहरण के लिए: महिला आरक्षण विधेयक (2023) महिलाओं के लिए विधायी निकायों में 33% सीटें आरक्षित करता है, जो राजनीति में उनकी भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम है।
- आर्थिक सशक्तिकरण योजनाएँ: महिला उद्यमियों को सहायता देने वाली पहल वित्तीय स्वतंत्रता को बढ़ावा देने और आर्थिक असमानताओं को कम करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- उदाहरण के लिए: वर्ष 2023 तक, स्टैंड अप इंडिया योजना ने स्वीकृत कुल 2.09 लाख ऋणों में से 84% महिला उद्यमियों को आवंटित किए हैं।
- जमीनी स्तर पर शासन: स्थानीय शासन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से अधिक समावेशी निर्णय लेने की प्रक्रिया सुनिश्चित होती है।
- उदाहरण के लिए: स्थानीय निकायों में आरक्षण के कारण अब कई पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की 50% सीटें हैं।
- न्यायिक समावेशन: न्यायिक पदों पर अधिक महिलाओं की नियुक्ति से कानूनों की अधिक लिंग-संवेदनशील व्याख्या सुनिश्चित होती है।
- उदाहरण के लिए: भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना (B. V. Nagrathna) की नियुक्ति ने, उच्च न्यायपालिका में समावेशिता बढ़ाने के प्रयासों को रेखांकित किया।
- वैश्विक प्रतिबद्धताएँ: घरेलू नीतियों को अंतर्राष्ट्रीय प्रथाओं के साथ संरेखित करने से लैंगिक समानता प्राप्त करने के प्रयासों को बल मिलता है।
- उदाहरण के लिए: भारत में जेंडर बजटिंग, महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर कन्वेंशन (CEDAW) के लक्षित नीतियों के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाने पर बल देता है।
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अंतर को कम करने के उपाय
- संस्थाओं को मजबूत बनाना: लैंगिक समानता कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए संस्थागत निकायों को अधिक संसाधन और शक्तियाँ प्रदान करनी चाहिए।
- उदाहरण के लिए: जिला-स्तरीय शिकायत प्रकोष्ठों की स्थापना से राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) को ग्रामीण क्षेत्रों में मुद्दों का अधिक प्रभावी ढंग से समाधान करने में मदद मिल सकती है ।
- एकीकृत नीतियाँ: महिलाओं के मुद्दों को समग्र रूप से संबोधित करने के लिए शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सेवा पहलों को मिलाना होगा।
- उदाहरण के लिए: समग्र शिक्षा योजना प्रीस्कूल से लेकर उच्चतर माध्यमिक स्तर तक बालिकाओं की शिक्षा में निरन्तरता को बढ़ावा देती है।
- कानूनी सुधार: मैरिटल रेप को अपराध घोषित करके मौजूदा अंतर को कम करना और लिंग आधारित अपराधों के लिए न्याय में तेजी लाना चाहिए।
- उदाहरण के लिए: फास्ट-ट्रैक कोर्ट की स्थापना से घरेलू हिंसा के मामलों को निपटाने में होने वाली देरी कम हुई है।
- कौशल विकास कार्यक्रम: महिलाओं को AI, रोबोटिक्स और बायोटेक्नोलॉजी जैसे उभरते उद्योगों में प्रशिक्षण देना चाहिए ताकि उनकी रोजगार क्षमता बढ़े।
- उदाहरण के लिए: स्किल इंडिया ने वर्ष 2022 तक 40% महिला लाभार्थियों को उन्नत तकनीकी क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया है।
- जन जागरूकता अभियान: बालिकाओं को शिक्षित करने के महत्त्व को बढ़ावा देने के लिए बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे कार्यक्रमों का विस्तार करना चाहिए।
- उदाहरण के लिए: इस पहल के शुरू होने के बाद से स्कूलों में लड़कियों के नामांकन में 10% की वृद्धि हुई है।
संवैधानिक वादों और लैंगिक समानता की वास्तविकता के बीच का अंतर एक ठोस प्रयास की आवश्यकता को उजागर करता है। संस्थागत क्षमताओं में सुधार करके, सुसंगत नीतियों को लागू करके और सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने से भारत अपनी महिलाओं को सशक्त बना सकता है। वर्ष 2047 तक, राष्ट्र लैंगिक समानता के अपने दृष्टिकोण को प्राप्त कर सकता है और एक ऐसा समाज बना सकता है जहाँ प्रत्येक नागरिक को सफल होने के समान अवसर मिले।