Q. रूस-चीन साझेदारी की बदलती गतिशीलता, भारत की विदेश नीति में वैचारिक 'रणनीतिक स्वायत्तता' से हटकर व्यावहारिक 'भू-राजनीतिक यथार्थवाद' की ओर बदलाव को अनिवार्य बनाती है। भारत के व्यापार और रणनीतिक अनिवार्यताओं के संदर्भ में इसका आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

May 20, 2026

GS Paper IIInternational Relations

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत की व्यापारिक और रणनीतिक अनिवार्यताएँ।
  • भू-राजनीतिक यथार्थवाद की ओर परिवर्तन की आवश्यकता। 
  • रणनीतिक स्वायत्तता की निरंतर प्रासंगिकता।

उत्तर

परिचय

रूस-चीन की प्रगाढ़ होती साझेदारी और महाशक्तियों के बीच गहराती प्रतिस्पर्द्धा भारत के रणनीतिक परिवेश को एक नया आकार दे रही है। यद्यपि रणनीतिक स्वायत्तता का महत्त्व आज भी बना हुआ है, तथापि भारत के व्यापार, प्रौद्योगिकी और सुरक्षा हित, तेजी से एक ऐसी व्यावहारिक विदेश नीति की माँग करते हैं, जो भू-राजनीतिक यथार्थवाद और विविधीकृत साझेदारियों पर आधारित हो।

भारत की व्यापारिक और रणनीतिक अनिवार्यताएँ 

  • निर्यात निर्भरता: भारत के प्रमुख निर्यात बाजार, पश्चिमी देशों में स्थित हैं, जिसके कारण उनके साथ आर्थिक जुड़ाव रणनीतिक रूप से अनिवार्य हो जाता है।
    • उदाहरण: भारत का नीदरलैंड को होने वाला वस्तु निर्यात, चीन और रूस के सम्मिलित (संयुक्त) बाजार से भी अधिक है।
  • प्रौद्योगिकी तक पहुँच: उन्नत तकनीक, अनुसंधान एवं विकास (R&D) सहयोग और नवाचार, साझेदारियाँ मुख्य रूप से पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में केंद्रित हैं।
  • निवेश की आवश्यकताएँ: भारत के आधुनिकीकरण, तीव्र आर्थिक विकास और औद्योगिक क्षमता को बढ़ाने के लिए विदेशी पूँजी तथा विनिर्माण साझेदारियों की आवश्यकता है।
  • चीन पर निर्भरता: चीनी विनिर्माण वस्तुओं पर अत्यधिक निर्भरता भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक सुभेद्यताएँ उत्पन्न करती है।
    • उदाहरण: चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा $110 बिलियन को पार कर गया है।
  • आपूर्ति शृंखला का विविधीकरण: रणनीतिक जोखिमों को कम करने के लिए भारत विभिन्न साझेदारियों के माध्यम से लचीली आपूर्ति शृंखलाओं का विकास करना चाहता है।
    • उदाहरण: भारत ‘इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क’ (IPEF) जैसी पहलों में शामिल हुआ है।

भू-राजनीतिक यथार्थवाद की ओर परिवर्तन की आवश्यकता 

  • चीन की चुनौती: चीन की बढ़ती सैन्य, आर्थिक और क्षेत्रीय मुखरता (Assertiveness) का सामना करने के लिए बाहरी साझेदारियों के माध्यम से शक्ति संतुलन स्थापित करना अनिवार्य है।
    • उदाहरण: भारत वर्तमान में विवादित सीमा और दक्षिण एशिया में बढ़ते चीनी प्रभाव की दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है।
  • पश्चिमी देशों के साथ साझेदारी: पश्चिमी देशों, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ घनिष्ठ संबंध भारत की आर्थिक और रणनीतिक क्षमताओं को सुदृढ़ करते हैं।
  • क्वाड (Quad) सहयोग: क्वाड जैसे व्यावहारिक गठबंधन, समुद्री सुरक्षा, प्रौद्योगिकी साझाकरण और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता को बढ़ावा देते हैं।
    • उदाहरण: अमेरिका-चीन के बीच बढ़ते जुड़ाव की चुनौतियों के बावजूद, भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकताओं के तहत क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक की मेजबानी कर अपनी रणनीतिक दृढ़ता प्रदर्शित कर रहा है। 
  • आंतरिक सुदृढ़ीकरण: बाह्य सहयोग, विनिर्माण, रक्षा और महत्त्वपूर्ण तकनीकों के क्षेत्र में भारत के आधुनिकीकरण को गति देता है।
    • उदाहरण: iCET (Initiative on Critical and Emerging Technologies) के तहत सेमीकंडक्टर और महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों पर भारत-अमेरिका की पहल।
  • मुद्दों पर आधारित रणनीतिक साझेदारी: भू-राजनीतिक यथार्थवाद, भारत को किसी भी गुट में शामिल हुए बिना, अपनी सुविधा और राष्ट्रीय हितों के अनुसार चुनिंदा देशों के साथ सहयोग करने की अनुमति देता है।
    • उदाहरण: भारत पश्चिमी देशों के साथ जुड़ाव गहरा करने के साथ-साथ रूस के साथ भी अपने संबंधों को बनाए रखे हुए है।

रणनीतिक स्वायत्तता की निरंतर प्रासंगिकता 

  • निर्णय लेने की स्वतंत्रता: रणनीतिक स्वायत्तता भारत की स्वतंत्र विदेश नीति संबंधी निर्णय लेने की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखती है।
  • बहु-आयामी जुड़ाव: भारत विभिन्न वैश्विक शक्ति केंद्रों के साथ समानांतर जुड़ाव के माध्यम से कूटनीतिक लाभ अर्जित करता है।
    • उदाहरण: भारत एक साथ क्वाड (Quad), ब्रिक्स (BRICS), शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और जी-20 (G20) जैसे विविध मंचों में सक्रिय रूप से भाग लेता है।
  • ऊर्जा सुरक्षा: स्वतंत्र विदेश नीति भारत को किफायती ऊर्जा और रक्षा आपूर्ति सुनिश्चित करने में सक्षम बनाती है।
    • उदाहरण: भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता का परिचय देते हुए वर्ष 2022 के बाद रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल के आयात में भारी वृद्धि की।
  • ग्लोबल साउथ का प्रतिनिधित्व: रणनीतिक स्वायत्तता विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) के बीच भारत की विश्वसनीयता और नेतृत्व क्षमता को मजबूत करती है।
  • वैश्विक संघर्षों में रणनीतिक स्वायत्तता : किसी भी पारंपरिक सैन्य गुट में शामिल न होने की नीति, संकट के समय भारत को रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने में सहायता करती है।

निष्कर्ष

भारत की विदेश नीति को वैचारिक ‘रणनीतिक स्वायत्तता‘ और व्यावहारिक ‘भू-राजनीतिक यथार्थवाद‘ का एक सुदृढ़ समन्वय होना चाहिए। चीन के बढ़ते प्रभाव और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के मध्य भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह विविध साझेदारियों, आर्थिक आधुनिकीकरण तथा स्वायत्त निर्णय क्षमता को संरक्षित रखते हुए परिस्थिति-अनुकूल आधारित व्यावहारिक सहयोग की नीति अपनाए। 

वैचारिक ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की सीमाएँ 

  • बदली भू-राजनीति: गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता जैसी अवधारणाएँ शीतयुद्ध कालीन द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था की उपज थीं; इसके विपरीत, समकालीन बहु-ध्रुवीय और प्रतिस्पर्द्धी विश्व में भारत को ‘परिस्थिति-अनुकूल कूटनीतिक जुड़ाव‘ की आवश्यकता है। 
  • रूस-चीन धुरी: भारत का यह पारंपरिक अनुमान कि ‘रूस हमेशा चीन को संतुलित (Counter-balance) करेगा’, अब काफी कमजोर हो चुका है।
    • उदाहरण: पिछले 25 वर्षों में चीन के साथ रूस की रणनीतिक साझेदारी में निरंतर वृद्धि हुई है।
  • आर्थिक विच्छेदन (Economic Disconnect): पश्चिमी देशों के साथ पारंपरिक वैचारिक दूरी बनाए रखने की नीति, अक्सर उन अर्थव्यवस्थाओं के साथ भारत की वास्तविक आर्थिक अंतर-निर्भरता की अनदेखी कर व्यावहारिक हितों को नुकसान पहुँचाती है। 
    • उदाहरण: अमेरिका आज भी भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार और अत्याधुनिक तकनीक का मुख्य स्रोत बना हुआ है।
  • सुरक्षा संबंधी बाधाएँ: चीन के साथ विद्यमान व्यापक सैन्य और तकनीकी असंतुलन को देखते हुए, भारत के लिए अकेले इस रणनीतिक अंतर को अल्पावधि में भर पाना अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। 
    • तथ्य: चीन की अर्थव्यवस्था का आकार भारत की अर्थव्यवस्था से लगभग पाँच गुना बड़ा है।
  • नीतिगत गतिरोध: पश्चिमी साझेदारियों के प्रति पारंपरिक अविश्वास के कारण रणनीतिक निर्णयों में होने वाला विलंब, अंततः भारत के वैश्विक महाशक्ति बनने के मार्ग में बाधा उत्पन्न करता है।

The changing dynamics of the Russia-China partnership mandate a shift in India’s foreign policy from ideological ‘strategic autonomy’ to practical ‘geopolitical realism’. Critically analyze with reference to India’s trade and strategic imperatives. in hindi

Explore UPSC Foundation Course

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Aiming for UPSC?

Download Our App

      
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.