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Q. "RBI के बैलेंस शीट की बदलती प्रकृति और बढ़ते अधिशेष हस्तांतरण मौद्रिक स्थिरता के संस्थान से राजकोषीय क्षमता के एक साधन के रूप में बदलाव का संकेत देते हैं।" भारत के राजकोषीय संघवाद के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

June 20, 2026

GS Paper IIIEconomy

प्रश्न की मुख्य माँग 

  • मौद्रिक स्थिरता बनाए रखने से लेकर राजकोषीय समर्थन प्रदान करने तक RBI की भूमिका में आए परिवर्तन।
  • वित्तीय संघवाद (Fiscal Federalism) तथा राज्य वित्त पर इसके प्रभाव।
  • केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता को बनाए रखते हुए राजकोषीय आवश्यकताओं के समर्थन हेतु आवश्यक सुधार या उपाय।

उत्तर

परिचय

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), जो परंपरागत रूप से मौद्रिक स्थिरता का संरक्षक रहा है, हाल के वर्षों में केंद्र सरकार को बढ़ते अधिशेष अंतरणों के माध्यम से राजकोषीय क्षमता का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत बन गया है। यद्यपि ये अंतरण सरकार के उधारी बोझ को कम करते हैं, फिर भी ये केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता तथा राजकोषीय संघीय संतुलन को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करते हैं।

RBI की भूमिका में परिवर्तन: मौद्रिक से राजकोषीय उपकरण की ओर

  • रिकॉर्ड अधिशेष अंतरण: RBI का केंद्र सरकार को अंतरण वित्त वर्ष 2O23 में ₹87,416 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में ₹2.87 लाख करोड़ हो गया, जो बढ़ती राजकोषीय निर्भरता को दर्शाता है। वित्त वर्ष 2026 का यह अंतरण कई राज्यों के वार्षिक बजट से अधिक है, जो इसके पैमाने को स्पष्ट करता है।
  • बैलेंस शीट विस्तार: RBI की बैलेंस शीट एक वर्ष में 20.6% बढ़कर मार्च 2026 में ₹91.97 लाख करोड़ हो गई, जिसमें विदेशी परिसंपत्तियों, घरेलू प्रतिभूतियों तथा विदेशी मुद्रा संचालन से लाभ शामिल है। यह वृद्धि मौद्रिक संचालन को गैर-कर राजस्व के एक महत्त्वपूर्ण स्रोत में परिवर्तित करती है।
  • राजस्व बनाम पारंपरिक राजकोषीय उपकरण: केंद्रीय बैंक द्वारा उत्पन्न राजकोषीय स्थान कराधान या उधारी से भिन्न होता है, क्योंकि इसमें न तो राजनीतिक स्वीकृति की आवश्यकता होती है और न ही पुनर्भुगतान दायित्व। यह मौद्रिक नीति के “अप्रत्यक्ष राजकोषीयकरण” को दर्शाता है।

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वित्तीय संघवाद पर प्रभाव 

  • राजकोषीय संसाधनों का केंद्रीकरण: अधिशेष अंतरण केवल केंद्र सरकार को प्राप्त होते हैं; राज्यों को विभाज्य कर पूल की तरह इसका कोई स्वचालित हिस्सा नहीं प्राप्त होता है।
  • राज्य स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और शहरी सेवाओं जैसी प्रमुख जिम्मेदारियों का वहन करते हैं, जबकि अनुच्छेद-293 के तहत उधारी प्रतिबंधों के कारण उनकी वित्तीय क्षमता सीमित रहती है।
  • राज्य स्वायत्तता पर प्रभाव: केंद्र से अंतरणों पर बढ़ती निर्भरता राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता को कमजोर कर सकती है। इससे न्यायसंगत राजकोषीय हस्तांतरण और जवाबदेही से जुड़े प्रश्न उत्पन्न होते हैं।
  • संस्थागत पारदर्शिता की आवश्यकता: बड़े पैमाने पर अधिशेष अंतरण मौद्रिक और राजकोषीय नीति के बीच सीमाओं को अस्पष्ट कर सकते हैं, जिससे RBI की स्वतंत्रता प्रभावित होने की संभावना रहती है।
    • उदाहरण के लिए, आर्थिक पूँजी ढाँचा एक कानूनी आधार प्रदान करता है, लेकिन इसके बड़े पैमाने पर उपयोग से शासन से जुड़े प्रश्न उठते हैं।

आगे की राह

  • संस्थागत स्वायत्तता को सुदृढ़ करना: RBI के मौद्रिक उद्देश्यों को अल्पकालिक राजकोषीय दबावों से अलग रखा जाना चाहिए।
    • उदाहरण: आर्थिक पूँजी ढाँचा के अंतर्गत अधिशेष वितरण के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए जाएँ।
  • संघीय समन्वय को बढ़ाना: राजकोषीय केंद्रीकरण को रोकने हेतु राज्यों के साथ आंशिक साझेदारी या औपचारिक परामर्श की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए।
  • पारदर्शिता और जवाबदेही: अधिशेष अंतरण की विस्तृत संरचना को सार्वजनिक किया जाए, ताकि बेहतर जाँच-पड़ताल सुनिश्चित हो सके और जनविश्वास बना रहे।

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निष्कर्ष

यद्यपि RBI की विकसित होती भूमिका राजकोषीय क्षमता को सुदृढ़ करती है और सरकार के उधारी दबाव को कम करती है, फिर भी यह भारत के वित्तीय संघवाद में केंद्रीकरण की प्रवृत्ति को बढ़ाती है। मौद्रिक स्थिरता और राजकोषीय उत्तरदायित्व के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता, संस्थागत पारदर्शिता तथा राज्यों के साथ बेहतर समन्वय को सुदृढ़ करना आवश्यक है।

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“The changing nature of the RBI’s balance sheet and increasing surplus transfers signify a shift from an institution of monetary stability to an instrument of fiscal capacity.” Analyze this statement in the context of India’s fiscal federalism. in hindi

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