Q. भारत में बाल तस्करी एक 'स्तरित संगठित अपराध' के रूप में संचालित होती है। चर्चा कीजिए कि पीड़ितों को 'पीड़ित गवाह' मानने के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश से कम दोषसिद्धि दर के लिए जिम्मेदार साक्ष्य संबंधी चुनौतियों का समाधान कैसे होता है। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • बाल तस्करी एक ‘स्तरित संगठित अपराध’ के रूप में।
  • ‘पीड़ित गवाह’ की स्थिति: साक्ष्य संबंधी चुनौतियों का समाधान।

उत्तर

भारत में बाल तस्करी एक गंभीर सामाजिक समस्या है, जो एक ‘स्तरित  संगठित अपराध’ के नेटवर्क के भीतर उत्पन्न होती  है। यद्यपि बालकों के यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम तथा अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम जैसे कड़े कानून विद्यमान हैं, फिर भी मुकदमों के दौरान पीड़ितों की गवाही के प्रणालीगत क्षरण के कारण दोषसिद्धि की दर अत्यंत निम्न (कई राज्यों में 5 प्रतिशत से कम) बनी हुई है।

‘स्तरित संगठित अपराध’ के रूप में बाल तस्करी

  • विखंडित परिचालन इकाइयाँ: मानव तस्करी में भर्ती, परिवहन और आश्रय देने के लिए जिम्मेदार स्वतंत्र “समूह” शामिल होते हैं, जो शायद ही कभी एक-दूसरे से संवाद करते हैं।
  • छल-कपट और धोखाधड़ी: अपराधों को प्रायः शिक्षा, “बेहतर रोजगार” अथवा यहाँ तक कि अंतरदेशीय दत्तक ग्रहण जैसी वैध गतिविधियों के आवरण में छिपाया जाता है।
  • अंतरराष्ट्रीय और अंतर-राज्यीय संबंध: यह अपराध जटिल पारगमन मार्गों के माध्यम से राज्य की सीमाओं को पार करता है, जिससे स्थानीय पुलिस के लिए जाँच करना कानूनी और तार्किक रूप से कठिन हो जाता है।
  • उन्नत डिजिटल फुटप्रिंट: आधुनिक तस्कर पीड़ितों का डेटा साझा करने हेतु कूटबद्ध सामाजिक माध्यमों और गुप्त जाल का उपयोग करते हैं, जिससे पारंपरिक निगरानी अप्रभावी हो जाती है।
    • उदाहरण: वर्ष 2025 के उत्तरार्द्ध में उच्चतम न्यायालय ने उल्लेख किया कि अपहरण गिरोह अब निर्दोष पीड़ितों को भ्रमित करने और पुलिस निगरानी से बचने हेतु उन्नत प्रौद्योगिकी का प्रयोग कर रहे हैं।

‘पीड़ित गवाह’ की स्थिति: साक्ष्य संबंधी चुनौतियों का समाधान

दिसंबर 2025 के ऐतिहासिक निर्णय (के. पी. किरणकुमार बनाम राज्य) में उच्चतम न्यायालय ने नाबालिग पीड़ितों को ‘पीड़ित साक्षी’ के रूप में मान्यता देने का निर्देश दिया। यह परिवर्तन कई साक्ष्यगत बाधाओं का समाधान करता है:

  • ‘सह-अपराधी’ की संज्ञा का खंडन: पूर्व में पीड़ितों को अपराध का सहभागी मान लिया जाता था, जिससे उनकी गवाही के लिए स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक ठहराई जाती थी।
  • सूक्ष्म असंगतियों के प्रति सहिष्णुता: आघात के कारण उत्पन्न विरोधाभासों के आधार पर न्यायालय अक्सर मामलों को खारिज कर देते थे।
    • उदाहरण: अब केवल इस आधार पर गवाही अस्वीकार नहीं की जा सकती कि बच्चा अपराध की स्तरित अंतःक्रिया को सटीक रूप से वर्णित नहीं कर पा रहा है।
  • विश्वसनीयता की प्रत्यास्था: ‘पीड़ित साक्षी’ का दर्जा देने से पीड़ित की गवाही को हमले के शिकार व्यक्तियों के समान साक्ष्यगत महत्त्व प्राप्त होता है।
  • सामाजिक-आर्थिक संवेदनशीलता की मान्यता: भय के कारण पीड़ितों द्वारा विरोध या शिकायत में विलंब को समझते हुए साक्ष्य का यथार्थपरक आकलन अनिवार्य किया गया।
    • उदाहरण: अब देर से रिपोर्ट करना या हिचकिचाहट, पीड़ित के कथन को अविश्वसनीय ठहराने का आधार नहीं है।
  • स्मृति-लोप (आघात) का संज्ञान: यह दर्जा विघटनकारी स्मृतिलोप को स्वीकार करता है, जिससे कठोर समय-रेखाओं के बजाय विखंडित कथनों को भी मान्यता मिलती है।
    • उदाहरण: इससे गिरोहों द्वारा प्रयुक्त छल-कपट और धोखाधड़ी के कारण पीड़ितों के भ्रमित होने पर भी अभियुक्तों के बरी होने की संभावना कम होती है।

निष्कर्ष

सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्देश प्रक्रियात्मक कठोरता से हटकर पीड़ित-केंद्रित यथार्थवाद की ओर एक महत्त्वपूर्ण बदलाव है। बाल गवाहों को तकनीकी खामियों के आधार पर बदनाम होने से बचाकर न्यायपालिका ने मानव तस्करी विरोधी इकाइयों को आवश्यक शक्ति प्रदान की है। शोषण को सही मायने में समाप्त करने के लिए, इस कानूनी सुरक्षा कवच के साथ-साथ एक व्यापक मानव तस्करी विरोधी विधेयक पारित करना और सशक्त पुनर्वास तंत्र स्थापित करना आवश्यक है।

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