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Q. "नागरिकता अधिकारों को पाने का अधिकार है।" हाल के कानूनी और राजनीतिक घटनाक्रमों के आलोक में, भारत में नागरिकता के संबंध में बदलते 'सबूत के बोझ' (burden of proof) का विश्लेषण कीजिए और मानव गरिमा पर इसके प्रभावों की चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

July 6, 2026

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • नागरिकता से संबंधित विधिक एवं प्रशासनिक विकास।
  • भारत में नागरिकता के संदर्भ में साक्ष्य प्रदान करने का भार (Burden of Proof) किस प्रकार नागरिक से अपेक्षित होता जा रहा है।
  • मानवीय गरिमा (Human Dignity) पर इसके प्रभाव और आगे की राह। 

उत्तर

परिचय

नागरिकता संविधान प्रदत्त अधिकारों के प्रयोग का आधार है, जिसमें अनुच्छेद-14, 19 एवं 21 के अंतर्गत प्राप्त अधिकार शामिल हैं। यह व्यक्ति को “अधिकार पाने का अधिकार (Right to Have Rights)” प्रदान करती है, जिसमें मतदान, आवागमन, आजीविका एवं विधिक संरक्षण जैसे अधिकार सम्मिलित हैं। हाल के वर्षों में नागरिकता अधिनियम में संशोधन, मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) तथा विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण न मानने संबंधी स्पष्टीकरण जैसे घटनाक्रमों ने नागरिकता के सत्यापन का दायित्व राज्य से हटाकर व्यक्ति पर अधिक केंद्रित कर दिया है। इससे मानवीय गरिमा एवं समान संरक्षण से जुड़े गंभीर प्रश्न उभरकर सामने आए हैं।

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विधिक एवं प्रशासनिक विकास

  • मतदाता सूची पुनरीक्षण एवं विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR): विशेष जाँच प्रक्रियाएँ नागरिकों को नौकरशाही विलंब तथा संभावित मताधिकार से वंचित होने के जोखिम के समक्ष ला सकती हैं।
    • उदाहरण: बिहार SIR 2026 ने वैध दस्तावेज रखने वाले निवासियों को भी प्रशासनिक अनिश्चितता की स्थिति में ला दिया।
  • विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा पासपोर्ट संबंधी स्पष्टीकरण: विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारतीय पासपोर्ट मुख्यतः यात्रा दस्तावेज है, इसलिए इसे भारतीय नागरिकता का अंतिम अथवा निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाता। ।
    • उदाहरण: पूर्वोत्तर भारत के निवासियों को वैध पासपोर्ट होने के बावजूद नागरिकता स्थिति को लेकर अनिश्चितता का सामना करना पड़ा।
  • नागरिकता अधिनियम में संशोधन: देशीयकरण एवं पंजीकरण से संबंधित नियमों में बढ़ती ऐतिहासिक दस्तावेजों की आवश्यकता ने कुछ समूहों के लिए नागरिकता प्राप्ति की प्रक्रिया को अधिक कठिन बना दिया है।

साक्ष्य प्रदान करने का भार में परिवर्तन

  • राज्य सत्यापन से व्यक्तिगत दस्तावेजीकरण की ओर: नागरिकों को अपनी नागरिकता स्थिति सिद्ध करने के लिए बार-बार आधार, मतदाता पहचान-पत्र एवं पासपोर्ट जैसे दस्तावेज प्रस्तुत करने पड़ते हैं, जिन्हें नागरिकता के आंशिक प्रमाण के रूप में माना जाता है।
    • उदाहरण: असम के निवासियों को नागरिकता की पूर्वधारणा के बिना अधिकारियों के समक्ष अनेक दस्तावेज प्रस्तुत करने पड़े।
  • न्यायिक समर्थन एवं प्रशासनिक विवेकाधिकार: सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों ने चुनावी उद्देश्यों के लिए प्राधिकरणों को नागरिकता की जाँच करने की अनुमति देकर प्रशासनिक विवेकाधिकार को सुदृढ़ किया है।
    • उदाहरण: 27 मई, 2026 को बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण को चुनौती देने वाले मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के अंतर्गत भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को मतदाता पात्रता के लिए सीमित नागरिकता जाँच करने की वैधानिक शक्ति प्राप्त है।
  • व्यावहारिक चुनौतियाँ: व्यक्तियों पर प्रशासनिक भार बढ़ जाता है, उन्हें प्रक्रिया संबंधी विलंब का सामना करना पड़ता है तथा विधि-सम्मत नागरिक होने के बावजूद उनके अधिकारों के अस्थायी निलंबन का जोखिम बना रहता है।

मानवीय गरिमा पर प्रभाव

  • व्यक्तित्व एवं अधिकारों का क्षरण: प्रशासनिक अनिश्चितता नागरिकों की मूलभूत स्वतंत्रताओं को कमजोर करती है, जो हन्ना आरेंट के अधिकार पाने के अधिकार (Right to Have Rights) की अवधारणा को प्रतिबिंबित करती है।
  • असमानता एवं हाशियाकरण का जोखिम: कमजोर वर्ग, विशेषकर अल्पसंख्यक समुदाय, अधिक जाँच-पड़ताल तथा असमान व्यवहार का सामना कर सकते हैं।
  • लोकतांत्रिक भागीदारी में कमी: नागरिकता को लेकर अनिश्चितता मतदान, व्यापार एवं आवागमन जैसे अधिकारों को प्रभावित करती है तथा लोकतांत्रिक भागीदारी को सीमित कर सकती है।

आगे की राह

  • नागरिकता की पूर्वधारणा को पुनर्स्थापित करना: दीर्घकालिक निवासियों को तब तक नागरिक माना जाना चाहिए, जब तक कि विधि द्वारा अन्यथा सिद्ध न हो जाए।
    • उदाहरण: आधार एवं पासपोर्ट को निवास तथा नागरिकता के विश्वसनीय प्राथमिक प्रमाण के रूप में मान्यता देना।
  • सत्यापन प्रक्रियाओं का सरलीकरण: दस्तावेजी आवश्यकताओं को सुव्यवस्थित किया जाना चाहिए, प्रशासनिक विवेकाधिकार को सीमित करना चाहिए तथा स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित करनी चाहिए।
    • उदाहरण: सभी नागरिक दस्तावेजों के लिए राज्यों में मानकीकृत डिजिटल सत्यापन पोर्टल विकसित किए जा सकते हैं।
  • स्वतंत्र निगरानी तंत्र: नागरिकता विवादों की निगरानी तथा प्रशासनिक मनमानी को रोकने के लिए एक स्वायत्त निकाय स्थापित किया जाना चाहिए।
    • उदाहरण: विवादित मामलों के लिए अपीलीय शक्तियों से युक्त वैधानिक नागरिक अधिकार न्यायाधिकरण की स्थापना।
  • प्रवर्तन में मानवीय गरिमा की रक्षा: नागरिकता सत्यापन प्रक्रिया में कानूनी सहायता की उपलब्धता, अधिकारों के अनिश्चितकालीन निलंबन को रोकना तथा हाशिए पर स्थित समूहों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।
    • उदाहरण: नागरिकता सत्यापन से जुड़े मामलों में अल्पसंख्यकों एवं विस्थापित व्यक्तियों के लिए विशेष कानूनी सहायता प्रकोष्ठ स्थापित किए जा सकते हैं।

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निष्कर्ष

यद्यपि हालिया विधिक एवं प्रशासनिक सुधारों का उद्देश्य नागरिकता सत्यापन को सुदृढ़ करना है, लेकिन इनसे प्रमाण का भार व्यक्तियों पर स्थानांतरित हो गया है, जिससे मानवीय गरिमा एवं संवैधानिक अधिकारों के प्रभावित होने का जोखिम बढ़ गया है। नागरिकता की पूर्वधारणा को पुनर्स्थापित करना, प्रक्रियाओं का सरलीकरण तथा स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित करना आवश्यक है, ताकि नागरिकता निर्धारण की प्रक्रिया भारत के लोकतांत्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के अनुरूप बनी रहे।

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“Citizenship is the right to have rights.” In light of recent legal and political developments, analyze the shifting burden of proof regarding citizenship in India and its implications for human dignity. in hindi

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