प्रश्न की मुख्य माँग
- शहरों में जलवायु परिवर्तन : पर्यावरणीय, शासन एवं समानता का संकट
- असंगठित क्षेत्र एवं स्वच्छता कर्मियों पर असमानुपातिक प्रभाव
- आगे की राह
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उत्तर
परिचय
भारतीय शहरों में जलवायु परिवर्तन अब केवल बढ़ते तापमान या चरम मौसमी घटनाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह शहरी शासन एवं सामाजिक असमानता के गहरे संकट के रूप में विकसित हो चुका है। लू (Heatwaves), बाढ़ तथा पर्यावरणीय क्षरण के दुष्प्रभावों का असमान बोझ मुख्यतः असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों एवं स्वच्छता कर्मियों पर पड़ता है, जो शहरी नियोजन, श्रमिक संरक्षण तथा सेवा वितरण प्रणाली में विद्यमान संरचनात्मक कमियों को उजागर करता है।
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शासन संकट के रूप में जलवायु परिवर्तन
- खंडित शहरी नियोजन एवं कमजोर समन्वय: जलवायु कार्रवाई, श्रमिक कल्याण तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य अलग-अलग क्षेत्रों (Silos) में संचालित होते हैं। नगर निगमों, स्वास्थ्य विभागों एवं आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के बीच समुचित समन्वय के अभाव से शहरी लचीलापन कमजोर पड़ता है।
- उदाहरण: शहरी जलवायु कार्य योजनाएँ प्रायः कार्बन उत्सर्जन में कमी पर केंद्रित रहती हैं, किंतु श्रमिकों के लिए व्यावसायिक ऊष्मा सुरक्षा (Occupational Heat Safety) की उपेक्षा करती हैं।
- अवसंरचना की कमी एवं असमान सेवा वितरण: अनौपचारिक बस्तियों में जल निकासी, आवास एवं स्वच्छता संबंधी अवसंरचना अभी भी अपर्याप्त है। जलवायु-लचीली अवसंरचना (Climate-Resilient Infrastructure), जैसे ठंडी छतें (Cool Roofs), हरित आवरण (Green Cover) एवं जल पारगम्य सतहें (Permeable Surfaces) के अभाव से ऊष्मा तनाव (Heat Stress) और अधिक बढ़ जाता है।
- उदाहरण: निम्न-आय वाले शहरी क्षेत्रों में अपर्याप्त जल निकासी के कारण अत्यधिक वर्षा के दौरान बाढ़ का जोखिम बढ़ जाता है।
- हीट एक्शन एवं लचीलापन योजनाओं का कमजोर क्रियान्वयन: नीतियाँ उपस्थित हैं, किंतु उनके प्रभावी प्रवर्तन एवं श्रमिक-केंद्रित स्वरूप का अभाव है।
- उदाहरण: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के वर्ष 2025–2026 हीटवेव दिशा-निर्देशों में प्रत्येक दो घंटे के कार्य के बाद 20 मिनट के सवैतनिक शीतलन अवकाश (Paid Cooling Break) तथा प्रातः 11 बजे से अपराह्न 4 बजे तक कार्य स्थगित करने की अनुशंसा की गई है, किंतु कारखाना अधिनियम (Factories Act) अथवा राज्य श्रम संहिताओं (State Labour Codes) के अंतर्गत इन्हें अभी तक वैधानिक एवं बाध्यकारी दर्जा प्राप्त नहीं है।
असंगठित क्षेत्र पर प्रभाव
- सुरक्षा के अभाव में व्यावसायिक जोखिम: फेरी विक्रेता (Street Vendors), निर्माण श्रमिक तथा अपशिष्ट संग्रहकर्ता (Waste Collectors) अत्यधिक गर्मी एवं प्रदूषण के सीधे संपर्क में रहते हैं। इसके अतिरिक्त नियोक्ताओं की जवाबदेही के अभाव से कार्यस्थल संबंधी जोखिम और बढ़ जाता है।
- उदाहरण: खुले वातावरण में कार्य करने वाले असंगठित क्षेत्र के श्रमिक ऊष्मा तनाव (Heat Stress) का सामना करते हैं, जिससे निर्जलीकरण (Dehydration) एवं कार्य उत्पादकता में कमी आती है।
- आवास एवं बस्तियों की संवेदनशीलता: अपर्याप्त अवसंरचना के कारण अनौपचारिक बस्तियाँ जलवायु संबंधी जोखिमों को और अधिक बढ़ा देती हैं।
- उदाहरण: झुग्गी-बस्तियों में अत्यधिक भीड़भाड़ एवं अपर्याप्त वेंटिलेशन (Ventilation) के कारण गर्मी से संबंधित बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है।
- सामाजिक सुरक्षा कवरेज का सीमित दायरा: असंगठित क्षेत्र के अनेक श्रमिक बीमा, पेंशन तथा अन्य कल्याणकारी योजनाओं के दायरे से बाहर रह जाते हैं।
- उदाहरण: प्रवासी श्रमिकों को शहरी कल्याणकारी अधिकारों (Urban Welfare Entitlements) का लाभ प्राप्त करने में आवश्यक दस्तावेजों के अभाव जैसी बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
स्वच्छता कर्मियों पर प्रभाव
- द्विस्तरीय जोखिम (कार्यस्थल एवं आवासीय परिस्थितियाँ): स्वच्छता कर्मियों को निरंतर कचरे, विषैली गैसों तथा अत्यधिक गर्मी के संपर्क में रहना पड़ता है। सुरक्षात्मक उपकरणों (Protective Gear) एवं मशीनीकरण (Mechanisation) के अभाव से उनके स्वास्थ्य संबंधी जोखिम और बढ़ जाते हैं।
- उदाहरण: सीवर की सफाई करने वाले कर्मियों को एक साथ व्यावसायिक जोखिम (Occupational Hazards) तथा अत्यधिक ऊष्मा तनाव (Extreme Heat Stress) का सामना करना पड़ता है।
- स्वास्थ्य प्रणाली से अपर्याप्त जुड़ाव: स्वच्छता कर्मियों की व्यावसायिक स्वास्थ्य सेवाओं (Occupational Health Services) एवं निवारक स्वास्थ्य देखभाल (Preventive Care) तक पहुँच सीमित रहती है।
- उदाहरण: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (Primary Health Centres) प्रायः लू (Heatstroke) अथवा दीर्घकालिक श्वसन रोगों (Chronic Respiratory Illnesses) के प्रभावी उपचार के लिए पर्याप्त संसाधनों से सुसज्जित नहीं होते हैं।
- शासन व्यवस्था में सामाजिक अदृश्यता: आवश्यक सेवाएँ प्रदान करने के बावजूद स्वच्छता कर्मी शहरी नियोजन की प्राथमिकताओं में हाशिए पर बने रहते हैं।
- उदाहरण: जलवायु अनुकूलन रणनीतियों (Climate Adaptation Strategies) में प्रायः स्वच्छता कर्मियों के कल्याण को पर्याप्त स्थान नहीं दिया जाता।
आगे की राह
- श्रम कानूनों में संशोधन: श्रमिक सुरक्षा कानूनों में क्लाइमेट रेजिलिएंस (Climate Resilience) को शामिल करते हुए प्रभावी एवं बाध्यकारी मानकों का प्रावधान किया जाए।
- औपचारीकरण (Formalisation): असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा (Portable Social Security) एवं स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से औपचारिक व्यवस्था से जोड़ा जाए।
- अवसंरचना विकास: अनौपचारिक बस्तियों में जलवायु-लचीले आवास, सुदृढ़ जल निकासी व्यवस्था तथा शीतलन अवसंरचना (Cooling Infrastructure) का विकास किया जाए।
- शहरी नियोजन: वास्तविक समय (Real-Time) निगरानी तथा श्रमिक सुरक्षा उपायों को सम्मिलित करते हुए शहर-स्तरीय हीट एक्शन योजनाओं (Heat Action Plans) को सुदृढ़ बनाया जाए।
- परिचालनात्मक समन्वय (Operational Convergence): शहरी नियोजन, स्वास्थ्य तथा आपदा प्रबंधन प्रणालियों के मध्य बेहतर अंतर-विभागीय समन्वय (Inter-agency Convergence) को बढ़ावा दिया जाए।
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निष्कर्ष
भारतीय शहरों में जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय दबाव को ही नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की संरचनात्मक कमियों एवं गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक असमानताओं को भी उजागर करता है। असंगठित क्षेत्र के श्रमिक एवं स्वच्छता कर्मी इस व्यवस्था के सबसे अधिक प्रभावित, किंतु सबसे कम संरक्षित वर्ग हैं। इसलिए न्यायसंगत शहरी संक्रमण (Just Urban Transition) सुनिश्चित करने के लिए जलवायु शासन के केंद्र में समानता (Equity), श्रमिक संरक्षण तथा संस्थागत समन्वय (Institutional Convergence) को समाहित करना आवश्यक है।