प्रश्न की मुख्य माँग
- कॉलेजियम प्रणाली की कमजोरियाँ।
- न्यायपालिका के भीतर किए जाने वाले सुधार।
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उत्तर
परिचय
पिछले तीन दशकों से कॉलेजियम प्रणाली लगातार आलोचनाओं के बावजूद न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करती रही है। सर्वोच्च न्यायालय अपनी स्वीकृत 38 न्यायाधीशों की संख्या की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में संवैधानिक नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances) को बनाए रखने के लिए इस प्रणाली को प्रतिस्थापित करने के बजाय सुधार करना अत्यावश्यक है।
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कॉलेजियम प्रणाली की कमजोरियाँ
- अपारदर्शी प्रक्रिया: नियुक्तियाँ बंद कमरे में होती हैं तथा चयन के मानदंड सार्वजनिक नहीं किए जाते, जिससे पारदर्शिता कम होती है।
- उदाहरण: न्यायमूर्ति अकील कुरैशी को वरिष्ठता के बावजूद वर्ष 2019–22 के दौरान सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत न किए जाने के निर्णय के साथ चयन के मानदंड सार्वजनिक नहीं किए गए।
- कमजोर जवाबदेही: कॉलेजियम के निर्णय व्यापक रूप से सार्वजनिक समीक्षा से परे रहते हैं, जिससे संस्थागत जवाबदेही सीमित होती है।
- उदाहरण: महेश चंद्र गुप्ता बनाम भारत संघ (2009) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि न्यायिक उम्मीदवार की ‘उपयुक्तता (Suitability)’ न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आती।
- मनमाने निर्णय: नियुक्ति या अस्वीकृति के कारणों का विस्तृत विवरण न दिए जाने से मनमानेपन की धारणा बनती है।
- सीमित विविधता: क्षेत्रीय, लैंगिक एवं सामुदायिक प्रतिनिधित्व पर पर्याप्त ध्यान न देने से न्यायपालिका की समावेशिता प्रभावित होती है।
- उदाहरण: इंडिया जस्टिस रिपोर्ट, 2025 के अनुसार, उच्च न्यायालयों में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 14% है।
- गोपनीय असहमति: असहमति वाले मतों (Dissenting Opinions) को सार्वजनिक न करने से विचार-विमर्श की निष्पक्षता पर विश्वास कमजोर होता है।
न्यायपालिका के भीतर किए जाने वाले सुधार
- चयन मानदंड: संवेदनशील जानकारियों की गोपनीयता बनाए रखते हुए पात्रता एवं मूल्यांकन के वस्तुनिष्ठ मानदंड सार्वजनिक किए जाएँ।
- कारणयुक्त निर्णय: गोपनीय सूचनाओं से समझौता किए बिना अनुशंसाओं एवं अस्वीकृतियों के संक्षिप्त कारण सार्वजनिक किए जाएँ।
- उदाहरण: कॉलेजियम ने वर्ष 2017 में कुछ समय के लिए विस्तृत प्रस्ताव प्रकाशित किए थे, जिसे बाद में बंद कर दिया गया।
- असहमति का प्रकटीकरण: जहाँ उपयुक्त हो, असहमति वाले मतों को दर्ज कर सार्वजनिक किया जाए, जिससे संस्थागत विश्वसनीयता बढ़ेगी।
- विविधता को बढ़ावा: नियुक्तियों में लैंगिक, क्षेत्रीय एवं सामाजिक विविधता पर संस्थागत रूप से विचार सुनिश्चित किया जाए।
- आंतरिक सुधार: कार्यपालिका की भूमिका बढ़ाने के बजाय न्यायिक नियमों के माध्यम से कॉलेजियम प्रणाली में सुधार किया जाए।
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निष्कर्ष
कॉलेजियम प्रणाली न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए उपलब्ध व्यवस्थाओं में अल्पतम त्रुटिपूर्ण तंत्र बनी हुई है। यह पारदर्शी प्रक्रियाएँ, वस्तुनिष्ठ मानदंड तथा आंतरिक सुधारों के माध्यम से अधिक संस्थागत जवाबदेही अपनाकर न्यायपालिका अपनी संवैधानिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए जनविश्वास को और सुदृढ़ कर सकती है।