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Q. संवैधानिक संशोधन संस्थानों के बीच शक्ति संतुलन को बदल सकते हैं। पाकिस्तान की संसद में पारित 27वें संशोधन के संदर्भ में इसका विश्लेषण कीजिए और न्यायिक स्वायत्तता की रक्षा के लिए भारत इससे क्या सीख ले सकता है, इस पर चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

January 31, 2026

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • 27वां संशोधन: पाकिस्तान में सत्ता का पुनर्गठन
  • संबंधित चिंताएँ: विधि के शासन का क्षरण
  • न्यायिक स्वायत्तता की सुरक्षा: भारत के लिए सबक

उत्तर

संवैधानिक संशोधन ऐसे शक्तिशाली उपकरण हैं, जो या तो लोकतांत्रिक नियंत्रणों को मजबूत कर सकते हैं या उन्हें व्यवस्थित रूप से ध्वस्त कर सकते हैं। पाकिस्तान के संविधान में हालिया 27वाँ संशोधन (नवंबर 2025 में पारित) एक निर्णायक क्षण का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ कार्यपालिका और सेना ने राज्य के पदानुक्रम को मौलिक रूप से पुनर्गठित किया है, जिससे न्यायपालिका संभावित रूप से एक अधीनस्थ भूमिका में आ गई है।

मुख्य भाग 

27वाँ संशोधन: पाकिस्तान में सत्ता का पुनर्गठन

  • संघीय संवैधानिक न्यायालय (FCC) का निर्माण: यह संशोधन एक नया FCC स्थापित करता है, जो संवैधानिक व्याख्या और मौलिक अधिकारों पर विशेष अधिकार क्षेत्र ग्रहण करता है, वे कार्य जो पहले सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में थे।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय अब प्रभावी रूप से गैर-संवैधानिक मामलों के लिए केवल एक अपीलीय निकाय बनकर रह गया है, जिससे उसे “संविधान के संरक्षक” की भूमिका से वंचित कर दिया गया है।
  • नियुक्तियों पर कार्यपालिकीय नियंत्रण: राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सलाह पर, पारदर्शी और पूर्व-निर्धारित चयन मानदंडों के अभाव में FCC न्यायाधीशों की प्रारंभिक नियुक्तियाँ करते हैं, जिससे राजनीतिक संरक्षण को संस्थागत रूप मिलता है।
  • बिना सहमति के तबादले: यह संशोधन प्रांतों के बीच उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उनकी सहमति के बिना स्थानांतरित करने की अनुमति देता है; पालन करने से इनकार करने पर अनुशासनात्मक निष्कासन की कार्रवाई की जा सकती है।
  • सैन्य शक्ति का समेकन : यह चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) का पद सृजित करता है, जिसे सेना प्रमुख ही समवर्ती रूप से सँभालेंगे, जिससे उन्हें सभी सेवाओं पर प्रधानता और अभियोजन से आजीवन छूट मिलती है।
    • उदाहरण: यह प्रभावी रूप से शासन के “हाइब्रिड-प्लस” मॉडल को औपचारिक रूप देता है, जहाँ सेना को संवैधानिक दर्जा और छूट प्राप्त है।

संबंधित चिंताएँ: विधि के शासन का क्षरण

  • संस्थागत विखंडन: न्यायपालिका को “संवैधानिक न्यायालय” और “अपीलीय न्यायालय” में विभाजित करना एक समानांतर प्रणाली का विकास करना है, जिसे कार्यपालिका आसानी से प्रभावित कर सकती है
  • जवाबदेही का अभाव: राष्ट्रपति और शीर्ष सैन्य अधिकारियों को आजीवन छूट देना विधि के समक्ष समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है, जिससे कानून से परे विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्तियों का एक वर्ग निर्मित हो जाता है।
  • असहमति को दबाना: सार्वजनिक बहस या विपक्ष के परामर्श के बिना जिस जल्दबाजी में विधेयक पारित किया गया, वह संसदीय संप्रभुता को कमजोर करता है।
  • न्यायिक इस्तीफे: जस्टिस मंसूर अली शाह जैसे वरिष्ठ न्यायाधीशों का इस्तीफा नागरिक अधिकारों की रक्षा करने की न्यायिक प्रणाली की क्षमता में विश्वास की भारी कमी को उजागर करता है।

न्यायिक स्वायत्तता की सुरक्षा: भारत के लिए सबक

  • मूल ढाँचे  को मजबूत करना : भारत को ‘मूल ढाँचे  के सिद्धांत’ (केशवानंद भारती मामला) को उन संशोधनों के विरुद्ध एक ढाल के रूप में बनाए रखना चाहिए, जो न्यायिक समीक्षा या शक्तियों के पृथक्करण को कमजोर करना चाहते हैं।
  • पारदर्शी कॉलेजियम सुधार: हालाँकि कॉलेजियम प्रणाली की आलोचना होती है, किंतु  पाकिस्तान से यह सबक लेना चाहिए कि बेंच (न्यायपीठ) के “राजनीतिक आधिपत्य” को रोकने के लिए कार्यपालिका के नेतृत्व वाली नियुक्तियों की ओर किसी भी परिवर्तन का विरोध किया जाना चाहिए।
  • मनमाने तबादलों से सुरक्षा: भारतीय नीति निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न्यायाधीशों के तबादले पारदर्शी बनाए रहें तथा कार्यपालिका की मनमर्जी या “दंडात्मक” मंशा के बजाय प्रशासनिक आवश्यकता पर आधारित हों।
  • समानांतर न्यायालयों का प्रतिरोध: विशेष संवैधानिक न्यायालयों (सर्वोच्च न्यायालय से अलग) को बनाने के किसी भी प्रस्ताव की बारीकी से जाँच की जानी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे “कार्यपालिका-हितैषी” केंद्र न बनें।
  • संस्थागत एकजुटता : भारतीय बार और बेंच (वकीलों और न्यायाधीशों) को एक समान मोर्चा बनाए रखना चाहिए, क्योंकि “विभाजित न्यायपालिका” विधायी अतिक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील होती है।

निष्कर्ष

27वाँ संशोधन एक “लोकतांत्रिक दुविधा” को दर्शाता है, जहाँ विधिक प्रक्रियाओं का उपयोग लोकतांत्रिक मूल तत्त्व को कमजोर करने के लिए किया जाता है। भारत के लिए, पाकिस्तानी अनुभव एक कठोर अनुस्मारक के रूप में कार्य करता है कि न्यायिक स्वतंत्रता केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि एक निरंतर संघर्ष है। इस स्वायत्तता की रक्षा आवश्यक है, ताकि न्यायपालिका मनमानी सत्ता और बहुमत की निरंकुशता पर प्रभावी अंकुश बनाए रख सके तथा भारतीय गणराज्य की पवित्रता सुरक्षित रहे।

Constitutional amendments can alter the balance of power between institutions. Analyse this in the context of the 27th Amendment passed in the Pakistan parliament and discuss lessons India can draw to safeguard judicial autonomy. in hindi

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