प्रश्न की मुख्य माँग
- प्रतिक्रियात्मक एवं सुरक्षा-केंद्रित आतंकवाद-रोधी उपायों की सीमाएँ।
- निवारक शासन एवं विकास-आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता
- आगे की राह।
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उत्तर
परिचय
वर्ष 2025 के वैश्विक आतंकवाद आँकड़ों के अनुसार, आतंकवादी घटनाओं में होने वाली मृत्यु की संख्या में 28% की कमी दर्ज की गई, जबकि अधिकांश हमले पाकिस्तान, नाइजीरिया, बुर्किना फासो, नाइजर तथा कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) में केंद्रित रहे। यद्यपि यह प्रवृत्ति सकारात्मक प्रतीत होती है, परंतु आतंकवाद की प्रकृति संरचनात्मक रूप से परिवर्तित हो चुकी है। विकेंद्रीकृत नेटवर्क, डिजिटल कट्टरपंथ तथा संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों की निकटता के कारण अब खतरा बड़े पैमाने के हमलों से हटकर स्थानीयकृत एवं लोन वुल्फ घटनाओं की ओर स्थानांतरित हो गया है।
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प्रतिक्रियात्मक एवं सुरक्षा-केंद्रित उपायों की सीमाएँ
- केवल तात्कालिक नियंत्रण तक सीमित: पारंपरिक सैन्य एवं पुलिस कार्रवाई तत्काल खतरे को नियंत्रित करती है, किंतु आतंकवाद के पुनरुत्थान को रोकने में प्रभावी नहीं होती है।
- खतरों का विखंडन: आतंकवादी नेटवर्क अत्यंत शीघ्रता से स्वयं को अनुकूलित कर लेते हैं; एक क्षेत्र में दमन होने पर वे अन्य क्षेत्रों में फैलकर स्थानीय विद्रोह का रूप ले लेते हैं।
- उदाहरण: वैश्विक स्तर पर आतंकवादी घटनाओं में कमी के बावजूद तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के हमलों में वृद्धि हुई, जो इसकी अनुकूलन क्षमता को दर्शाती है।
- संसाधन-प्रधान एवं दीर्घकाल में अस्थिर: निरंतर सैन्य तैनाती, निगरानी एवं आपातकालीन प्रतिक्रिया पर अत्यधिक संसाधन व्यय होते हैं, जबकि इससे आतंकवाद के मूल कारणों का समाधान नहीं हो पाता है।
- उदाहरण: भारत–पाकिस्तान सीमा पर व्यापक निगरानी एवं सुरक्षा तंत्र पर प्रतिवर्ष उल्लेखनीय संसाधन व्यय किए जाते हैं ।
निवारक शासन एवं विकास की आवश्यकता
- संवेदनशील क्षेत्रों में राज्य की क्षमता सुदृढ़ करना: शासन संबंधी कमजोरियाँ सत्ता में रिक्तता उत्पन्न करती हैं, जिनका लाभ उठाकर उग्रवादी संगठन अपनी गतिविधियाँ बढ़ाते हैं।
- उदाहरण: साहेल (Sahel) जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में कमजोर स्थानीय प्रशासन सुरक्षा उपलब्ध कराने में विफल रहता है, जिससे आतंकवादी संगठनों को पनपने का अवसर मिलता है।
- सामाजिक-आर्थिक समावेशन: शिक्षा, रोजगार एवं सामाजिक न्याय को बढ़ावा देकर कट्टरपंथी विचारधाराओं के आकर्षण को कम किया जा सकता है।
- उदाहरण: पूर्वोत्तर भारत के उग्रवाद-प्रभावित जिलों में लक्षित विकास कार्यक्रमों से सशस्त्र समूहों में भर्ती की प्रवृत्ति में कमी आई है।
- डिजिटल विनियमन एवं कट्टरपंथ-निरोध: ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों की प्रभावी निगरानी कर डिजिटल इको चैंबर तथा आतंकवादी भर्ती तंत्र को समाप्त करना आवश्यक है।
- उदाहरण: टेलीग्राम एवं एक्स (X) जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर उग्रवादी संदेशों की पहचान के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित कंटेंट मॉडरेशन का उपयोग करना चाहिए।
आगे की राह
- एकीकृत सीमा एवं सीमांत प्रबंधन: निगरानी प्रणाली को सुदृढ़ किया जाए तथा सीमा-पार समन्वय एवं खुफिया सहयोग को बढ़ावा दिया जाए।
- उदाहरण: भारत, भूटान एवं म्याँमार के मध्य संयुक्त खुफिया सूचना साझाकरण द्वारा पूर्वोत्तर की संवेदनशील सीमाओं की सुरक्षा।
- विकास-आधारित सुरक्षा हस्तक्षेप: स्थानीय पुलिसिंग के साथ अवसंरचना, स्वास्थ्य एवं शिक्षा संबंधी पहलों को एकीकृत किया जाए।
- उदाहरण: संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों में जल जीवन मिशन तथा कौशल विकास परियोजनाओं के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक असंतोष को कम करना।
- साइबर एवं डिजिटल खुफिया तंत्र: ऑनलाइन कट्टरपंथ एवं लोन वुल्फ खतरों की निगरानी के लिए विशेष इकाइयों की स्थापना की जाए।
- उदाहरण: NATGRID–NPR डेटाबेस एकीकरण के अंतर्गत ‘गांडीव (Gandiva)’ पूर्वानुमानात्मक विश्लेषण इंजन का उपयोग कर वास्तविक समय में इकाई पहचान एवं परिवार-स्तरीय जनसांख्यिकीय मानचित्रण।
- समुदाय-आधारित प्रति-कट्टरपंथीकरण: नागरिक समाज, धार्मिक नेताओं एवं जनजातीय नेतृत्व को कट्टरपंथ की प्रारंभिक पहचान तथा डी-रेडिकलाइजेशन कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से शामिल किया जाए।
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निष्कर्ष
भारत की आतंकवाद-रोधी रणनीति को केवल प्रतिक्रियात्मक सुरक्षा अभियानों तक सीमित न रहकर आतंकवाद के संरचनात्मक, सामाजिक-आर्थिक एवं डिजिटल कारणों का भी समाधान करना चाहिए। सुशासन, समावेशी विकास, सुदृढ़ सीमा सुरक्षा तथा प्रभावी डिजिटल विनियमन पर आधारित निवारक एवं बहु-स्तरीय दृष्टिकोण ही ऐसा सशक्त राष्ट्रीय सुरक्षा ढाँचा विकसित कर सकता है, जो आधुनिक आतंकवाद की विकेंद्रीकृत एवं निरंतर बदलती प्रकृति का प्रभावी ढंग से सामना करने में सक्षम हो।