प्रश्न की मुख्य माँग
- मीठे जल संसाधनों की घटती उपलब्धता के कारणों की व्याख्या कीजिए।
- उन कारकों का विश्लेषण कीजिए, जो जल उपलब्ध होने पर भी उसकी पहुँच को सीमित करते हैं।
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उत्तर
पृथ्वी के कुल जल का लगभग 3% ही मीठा जल है, और उसमें से केवल लगभग 1% ही मानव उपयोग के लिए सुलभ है। फिर भी प्रतिवर्ष लगभग 2–3 अरब लोग जल-संकट का सामना करते हैं (स्रोत: यूएन विश्व जल विकास प्रतिवेदन, 2023)। अतः वैश्विक मीठे जल संकट के कारणों को समझना अत्यंत आवश्यक है।
मीठे जल संसाधनों की घटती उपलब्धता के कारण
- भूजल का अत्यधिक दोहन: कृषि, उद्योग और घरेलू उपयोग के लिए भूजल एवं सतही जल का अत्यधिक दोहन, पुनर्भरण की गति से अधिक है जिससे जलभृत (Aquifers) शीघ्र खाली हो रहे हैं।
उदा: भारत विश्व के कुल भूजल दोहन का 25% से अधिक करता है, जिससे वह विश्व का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है (यूनेस्को)।
- मीठे जल पारितंत्रों का प्रदूषण:अशोधित सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और रासायनिक अपवाह उपलब्ध जल को उपयोग के अयोग्य बना देते हैं।
उदा: भारत की 60% से अधिक नदियाँ प्रदूषित हैं (CPCB, 2022)।
- जलवायु परिवर्तन और परिवर्तित जलचक्र: तापमान वृद्धि के कारण हिमनदों का तीव्र ह्रास और अनियमित वर्षा, कुल मीठे जल भंडार को कम कर रही है।
उदा: एंडीज़ के हिमनद वैश्विक औसत से 35% अधिक तेज़ी से पिघल रहे हैं (यूनेस्को, विश्व हिमनद दिवस सम्मेलन)।
- आर्द्रभूमियों और प्राकृतिक पुनर्भरण क्षेत्रों का क्षय: शहरीकरण और भूमि उपयोग में परिवर्तन से पारितंत्रों की जल संचयन एवं पुनर्भरण क्षमता घट रही है।
उदा: बेंगलुरु ने अपनी 80% आर्द्रभूमियाँ खो दी हैं, जिससे जल स्थिरता प्रभावित हुई है।
- जनसंख्या वृद्धि: तीव्र जनसंख्या वृद्धि से मीठे पानी की मांग बढ़ जाती है, जो अक्सर उपलब्ध संसाधनों की प्राकृतिक पुनर्भरण क्षमता से अधिक हो जाती है।
जल उपलब्ध होने पर भी उसकी पहुँच को सीमित करने वाले कारक
- अपर्याप्त आधारभूत संरचना:खराब पाइपलाइन, भंडारण की कमी और उच्च रिसाव दर अंतिम उपभोक्ताओं तक जल आपूर्ति में बाधा बनते हैं।
उदा: विकासशील देशों में शहरी जल का 40% तक परिवहन के दौरान नष्ट हो जाता है (विश्व बैंक)।
- प्रदूषण और स्रोत संदूषण: अशोधित सीवेज, औद्योगिक विषाक्त अपशिष्ट और कृषि रसायनों का अपवाह जल की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
उदा: CPCB के अनुसार, भारत का 70% से अधिक सतही जल प्रदूषित है।
- राजनीतिक और विधिक अवरोध: जल बँटवारे के विवाद और अधिकारक्षेत्रों के अतिव्यापी होने से जल-समृद्ध क्षेत्रों में भी जल तक पहुंच सीमित हो जाती है।
- सामाजिक वंचना: हाशिए पर रहने वाले समूहों को अक्सर आर्थिक तंगी या सामाजिक बहिष्कार के कारण जल तक पहुँच नहीं मिल पाती है।
उदा: कुछ गाँवों में दलित परिवारों को जाति-आधारित भेदभाव के कारण सार्वजनिक जलस्रोतों से वंचित किया जाता है।
- खराब जल शासन: खंडित प्रशासनिक ढाँचा और समन्वय की कमी से संसाधनों का प्रभावी प्रबंधन बाधित होता है।
उदाहरण: भारत में जल प्रशासन अनेक मंत्रालयों में विभाजित है, जिससे समन्वय कमजोर होता है।
- मौसमी एवं कालिक असंगति: मानसूनी बारिश से थोड़े समय के लिए अतिरिक्त पानी मिलता है, लेकिन जल संग्रहण और प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए बुनियादी ढांचे की कमी के कारण मौसमी कमी हो जाती है।
उदाहरण: चेन्नई में मानसून के दौरान पर्याप्त वर्षा होती है, फिर भी शहर नियमित रूप से ग्रीष्मकालीन सूखे का सामना करता है।
निष्कर्ष
सतत जल प्रबंधन, समावेशी आधारभूत संरचना और अंतर-क्षेत्रीय सहयोग में समयबद्ध निवेश के माध्यम से वैश्विक मीठे जल संकट को लचीलापन और समानता के अवसर में परिवर्तित किया जा सकता है। डेटा-आधारित नीतियाँ और सामुदायिक सहभागिता भविष्य की जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होंगी।
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