Q. क्या भारतीय संविधान विकलांगता को अधिकारों के बजाय दान के नजरिए से देखता है? अनुच्छेद 41 और हालिया न्यायिक रुझानों के आलोक में आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।” 15 अंक, 250 शब्द)

November 25, 2025

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • संविधान दिव्यांगता को परोपकार के नजरिए से देखता है।
  • संविधान दिव्यांगता को पूरी तरह परोपकार के नजरिए से नहीं देखता है।
  • आगे की राह।

उत्तर

भारत में दिव्यांगता लंबे समय से संवैधानिक निष्क्रियता और कल्याण-केंद्रित व्याख्याओं से प्रभावित रही है। इस संदर्भ में, यह आकलन करना कि क्या संविधान दिव्यांगता को अधिकार के दावे के बजाय दान के रूप में देखता है, विशेष रूप से अनुच्छेद-41 और हालिया न्यायिक रुझानों के माध्यम से, गहरे संरचनात्मक पूर्वाग्रहों और उभरते सुधारों को उजागर करता है।

संविधान दिव्यांगता को परोपकार के नजरिए से देखता है

  • अनुच्छेद-41 का कल्याणकारी ढाँचा: अनुच्छेद-41 दिव्यांगता को बीमारी और वृद्धावस्था के साथ समूहीकृत करता है और दिव्यांगता को एक ऐसी स्थिति के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसके लिए अधिकारों की नहीं, बल्कि सहायता की आवश्यकता होती है।
  • राज्य सूची प्रविष्टि 9 में स्थान: दिव्यांगता को ‘बेरोजगार’ के साथ जोड़ दिया गया है, जिससे दिव्यांग व्यक्तियों की अनुत्पादक लाभार्थियों वाली रूढ़िवादिता को बल मिलता है।
  • ‘वैध भेदभाव’ की अनुमति: संवैधानिक प्रावधान ‘मानसिक या शारीरिक दुर्बलता’ के कारण पद से हटाने की अनुमति देते हैं, जिससे भेदभाव सामान्य हो जाता है।
    • उदाहरण: दिव्यांगता संवैधानिक रूप से स्वीकृत बहिष्कार का आधार बनी हुई है।
  • चिकित्सा मॉडल शासन: वर्ष 1995 के दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम जैसे पहले के कानून चिकित्सा प्रमाणन पर बहुत अधिक निर्भर थे, जिससे दिव्यांगता डॉक्टर द्वारा निर्धारित कमी तक सीमित हो गई थी।
    • उदाहरण: दिव्यांगता प्रतिशत के मानदंडों का अभाव डॉक्टरों के पास व्यापक विवेकाधिकार छोड़ देता है।
  • चयनात्मक न्यायिक सहानुभूति: न्यायालय केवल ‘आदर्श’, राष्ट्रवादी विचारधारा वाले दिव्यांग नागरिकों को ही महत्त्व देती हैं, जो एक संरक्षणवादी परोपकारशील मानसिकता को दर्शाता है।

संविधान दिव्यांगता को पूरी तरह से परोपकार के नजरिए से नहीं देखता है

  • न्यायालयों द्वारा अधिकार-आधारित व्याख्याओं का विस्तार: दिव्यांगजन अधिकार संरक्षण अधिनियम के बाद, न्यायपालिका ने दिव्यांगता-समर्थक निर्णय तेजी से दिए हैं।
  • निम्न-वर्गीय संवैधानिक सहभागिता में वृद्धि: दिव्यांग समूह आज अधिकार-आधारित दावे करते हैं, जिससे व्याख्या का स्वरूप दान से आगे बढ़ जाता है।
    • उदाहरण: बधिर और मूक समाज ने संविधान सभा में सकारात्मक कार्रवाई की माँग करते हुए याचिका दायर की, जिसमें अधिकारों पर प्रारंभिक चर्चा दिखाई देती है।
  • आधुनिक संविधानवाद आलोचना को सक्षम बनाता है: संविधान हाशिए पर पड़े समूहों को धन अर्जित करने में भाग लेने का अधिकार देता है, जिससे अधिकारों की पुनर्व्याख्या संभव होती है।
    • उदाहरण: पुस्तक ‘असेंबलिंग इंडियाज कॉन्स्टिट्यूशन’ में दिव्यांग लोगों को अधिकारों की वकालत में संलग्न संवैधानिक कर्ता के रूप में दिखाया गया है।
  • दिव्यांगजन अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2016 सामाजिक मॉडल में बदलाव को दर्शाता है: वर्ष 2016 का अधिनियम समानता, सम्मान और गैर-भेदभाव की दिशा में एक संवैधानिक आधुनिकीकरण को दर्शाता है।
  • सार्वजनिक विमर्श अब सक्षमतावाद को चुनौती दे रहा है: संवैधानिक सक्षमतावाद पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं, जो दान-आधारित चुप्पी के बजाय अधिकारों से प्रेरित विमर्श की ओर बदलाव का संकेत देता है।

आगे की राह

  • दिव्यांगता का संवैधानिक पुनर्निर्धारण: दिव्यांगता को कल्याणकारी प्रावधानों से हटाकर प्रवर्तनीय अधिकार गारंटी में शामिल करना।
    • उदाहरण: अनुच्छेद-41 के कल्याणकारी समूहों को समानता-आधारित सुरक्षा से प्रतिस्थापित करना।
  • सक्षमतावादी धाराओं को हटाना: “मानसिक या शारीरिक दुर्बलता” के आधार पर बहिष्करण की अनुमति देने वाले प्रावधानों की समीक्षा करना।
  • एकसमान सामाजिक-आदर्श शासन: सुनिश्चित करना कि कानून/योजनाएँ बाधाओं को समस्या के रूप में पहचानें, न कि दिव्यांगताओं को।
  • गैर-चयनात्मक न्यायिक संवेदनशीलता: न्यायालय सभी दिव्यांग व्यक्तियों की रक्षा करना, न कि केवल प्रतिष्ठित उपलब्धि प्राप्त व्यक्तियों की।
  • दिव्यांगजनों के संस्थागत मुद्दे: कानूनों और नीतियों के प्रारूपण में दिव्यांग समूहों को शामिल करना।
    • उदाहरण: बधिर और मूक समाज की माँगों की संविधान सभा द्वारा की गई उपेक्षा की पुनरावृत्ति से बचना।

निष्कर्ष

समावेशी शासन के लिए कल्याणकारी पितृसत्तावाद से आगे बढ़कर अधिकार-केंद्रित संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। दिव्यांगता को दान का नहीं, बल्कि न्याय का प्रश्न मानना, समानता को मजबूत करता है, लोकतांत्रिक भागीदारी का विस्तार करता है और यह सुनिश्चित करता है कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था, दिव्यांग व्यक्तियों के लिए वास्तविक सम्मान, स्वायत्तता और ठोस नागरिकता की दिशा में विकसित हो।

Does the Indian Constitution view disability through a lens of charity rather than rights? Critically analyse in the light of Article 41 and recent judicial trends.” in hindi

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