Q. 'शांति बोर्ड' का प्रस्ताव सार्वभौमिक बहुपक्षवाद से विशिष्ट तदर्थ गठबंधनों की ओर बदलाव का संकेत देता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के लिए इस बदलाव के निहितार्थों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। संयुक्त राष्ट्र सुधारों की पारंपरिक माँग से परे भारत को अपनी विदेश नीति को किस प्रकार पुनर्परिभाषित करना चाहिए? (15 अंक, 250 शब्द)

January 19, 2026

GS Paper IIInternational Relations

प्रश्न की मुख्य माँग

  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद पर प्रभाव
  • मुद्दे और रणनीतिक चिंताएँ
  • भारत का पुनर्समायोजन: पारंपरिक सुधारों से परे।

उत्तर

‘बोर्ड ऑफ पीस’ (BoP) एक अमेरिकी नेतृत्व वाला, केवल आमंत्रण पर आधारित अंतर-सरकारी निकाय है, जिसका प्रस्ताव अमेरिकी राष्ट्रपति ने दिया था और जिसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के संकल्प 2803 (नवंबर 2025) द्वारा अनिवार्य किया गया है। गाजा के संक्रमणकालीन शासन और पुनर्निर्माण की निगरानी के लिए गठित यह निकाय सार्वभौमिक बहुपक्षवाद से हटकर कार्यकारी-संचालित, तदर्थ गठबंधनों की ओर एक कदम है, जो प्रभावी रूप से वैश्विक संकट प्रबंधन के लिए एक ‘पे-टू-इंटर’ क्लब का निर्माण करता है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के लिए निहितार्थ

  • अधिकार का ह्रास: ‘अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यक्तित्व’ वाली एक स्वायत्त संस्था बनाकर, ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (BoP) प्रभावी रूप से संयुक्त राष्ट्र सचिवालय और विशेष एजेंसियों को दरकिनार कर देता है और शक्ति को अमेरिका के नेतृत्व वाली कार्यकारी समिति में केंद्रित कर देता है।
    • उदाहरण: आलोचकों का तर्क है कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ संयुक्त राष्ट्र चार्टर के संप्रभु समानता, सार्वभौमिक भागीदारी और सामूहिक निर्णय लेने के सिद्धांतों को कमजोर करता है।
  • संप्रभु समानता का क्षरण: संयुक्त राष्ट्र के समान सदस्यता के सिद्धांत के विपरीत, ‘बोर्ड ऑफ पीस’ एक पदानुक्रमित मंच है, जहाँ स्थायी सीटें कथित तौर पर गाजा पुनर्निर्माण के लिए 1 अरब डॉलर के योगदान से जुड़ी हैं।
    • उदाहरण: यह ‘लेन-देन’ मॉडल छोटे देशों और वैश्विक दक्षिण को हाशिए पर धकेल देता है, और आम सहमति की जगह वित्तीय लाभ को प्राथमिकता देता है।
  • संस्थागत गतिरोध: यह परिवर्तन गतिरोधग्रस्त संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से दूर जाने का संकेत देता है, जिससे इसके एक बहस मंच तक सिमट जाने का खतरा है, जबकि वास्तविक सुरक्षा निर्णय विशेष “बोर्डों” के हाथों में चले जाएँगे।
  • शांति निर्माण का विखंडन: BoP एक समानांतर ढाँचा तैयार करता है, जो शांति निर्माण आयोग (PBC) जैसे स्थापित संयुक्त राष्ट्र ढाँचों से धन और वैधता को दूर कर देता है।

मुद्दे और रणनीतिक चिंताएँ

  • जवाबदेही का अभाव: एकल विश्व नेता की अध्यक्षता में गठित तदर्थ निकाय होने के नाते, BoP में संयुक्त राष्ट्र द्वारा अनिवार्य अभियानों में निहित निष्पक्षता और निगरानी का अभाव है, जिससे “औपनिवेशिक न्यास” जैसी धारणाओं का खतरा है।
    • उदाहरण: नीतिगत रिपोर्टों में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि BoP मानवीय सहायता के लिए एक “आंशिक नियंत्रणकर्ता” के रूप में कार्य करता है, जो राजनीतिक गठबंधन के आधार पर राहत कार्यों का निर्धारण करता है।
  • क्षेत्रीय खतरे: भारत जैसे देशों के लिए, BoP में शामिल होने का अर्थ है ट्रंप की शर्तों पर पाकिस्तान जैसे प्रतिद्वंद्वियों के साथ एक मंच साझा करना, जिससे द्विपक्षीय संवेदनशीलताएँ जटिल हो जाती हैं।
  • दबाव का सामान्यीकरण: स्थानीय सहमति के बिना संघर्ष क्षेत्रों में शासन को नया रूप देने के लिए तदर्थ गठबंधनों का उपयोग संयुक्त राष्ट्र चार्टर के आत्मनिर्णय के सिद्धांत को कमजोर करता है।

भारत का पुनर्मूल्यांकन: पारंपरिक सुधारों से परे

  • व्यावहारिक बहुध्रुवीयता: भारत को संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीयता को कमजोर किए बिना, ‘सुधारित बहुपक्षवाद’ से हटकर व्यावहारिक बहुध्रुवीय सहभागिता की ओर बढ़ना चाहिए।
    • उदाहरण: जर्मन चांसलर के साथ भारत की हालिया बातचीत और “भारत-यूरोपीय” विचार, वैकल्पिक शक्ति केंद्रों के माध्यम से अमेरिका तथा चीन के प्रभाव को संतुलित करने की रणनीति को दर्शाते हैं।
  • कार्यात्मक तकनीकी-कूटनीति: केवल स्थायी सीट की माँग करने के बजाय, भारत को एआई गवर्नेंस, डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) और ग्रीन टेक जैसे नए क्षेत्रों के लिए वैश्विक एजेंडा निर्धारण में नेतृत्व करना चाहिए।
  • पड़ोसी प्राथमिकता 2.0: “प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता” की भूमिका निभाकर क्षेत्रीय लचीलेपन को मजबूत करना यह सुनिश्चित करता है कि वैश्विक “बोर्डों” की परवाह किए बिना, भारत अपने आस-पास के क्षेत्र में प्राथमिक सुरक्षा प्रदाता बना रहे।
    • उदाहरण: श्रीलंका को भारत द्वारा दिया गया 450 मिलियन डॉलर का सहायता पैकेज (2025) एक विश्वसनीय क्षेत्रीय आधार के रूप में इसकी स्थिति को मजबूत करता है।
  • तैनाती में सामरिक स्वायत्तता: भारत को संयुक्त राष्ट्र द्वारा अनिवार्य अभियानों में ही सैन्य बल भेजने के अपने सैद्धांतिक रुख को बनाए रखना चाहिए।

निष्कर्ष

बोर्ड ऑफ पीस’ उस वैश्विक व्यवस्था का प्रतीक है, जिसमें आदर्शों के स्थान पर परिस्थितियों के अनुसार व्यावहारिक समाधान अपनाए गए हैं। भारत अब 20वीं सदी के मानदंडों पर निर्भर नहीं रह सकता; उसे लेन-देन के युग में टिके रहने के लिए घरेलू तकनीकी-आर्थिक लचीलापन विकसित करना होगा। भारत का कार्य है कि वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता या समावेशी, नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अपने दीर्घकालिक दृष्टिकोण से समझौता किए बिना इन “भुगतान-आधारित” गठबंधनों में सही ढंग से आगे बढ़े।

The proposal of the ‘Board of Peace’ signals a shift from universal multilateralism to exclusive ad-hoc coalitions. Critically analyse the implications of this shift for the UNSC. How should India recalibrate its foreign policy beyond the traditional demand for UN reforms? in hindi

Explore UPSC Foundation Course

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Aiming for UPSC?

Download Our App

      
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.