प्रश्न की मुख्य माँग
- यह स्पष्ट कीजिए कि किसी आपदा/दुर्घटना के पीछे केवल तकनीकी कारण ही नहीं, बल्कि संगठनात्मक कमियाँ तथा सामाजिक-आर्थिक संवेदनशीलताएँ भी किस प्रकार उत्तरदायी होती हैं।
- विश्लेषण कीजिए कि तकनीकी विफलताओं की उपेक्षा क्यों नहीं की जा सकती तथा वे जोखिम एवं दुर्घटनाओं को कैसे बढ़ाती हैं।
- भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने हेतु संस्थागत, तकनीकी एवं नीतिगत सुधारों के आवश्यक उपाय सुझाइए।
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उत्तर
परिचय
सूरत और विशाखापत्तनम में हाल की औद्योगिक दुर्घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि ऐसे हादसे केवल आकस्मिक तकनीकी विफलताओं का परिणाम नहीं होते, बल्कि ये प्रायः दीर्घकालिक संगठनात्मक कमियों, कमजोर सुरक्षा संस्कृति तथा भारत के औद्योगिक तंत्र में निहित सामाजिक-आर्थिक असमानताओं का परिणाम होते हैं।
प्रणालीगत संगठनात्मक कमियाँ एवं सामाजिक-आर्थिक संवेदनशीलताएँ
- सुरक्षा की उपेक्षा: स्थापित सुरक्षा प्रोटोकॉल होने के बावजूद कई बार उनका पालन नहीं किया जाता, जिससे जोखिम बढ़ जाता है।
- उदाहरण: सूरत के सेप्टिक टैंक हादसे (2026) में श्रमिक साँस लेने हेतु अनुकूल उपकरण पहने बिना, बंद स्थान में प्रवेश कर गए।
- संविदा श्रम: संविदा श्रमिकों को अपर्याप्त प्रशिक्षण एवं खंडित जवाबदेही के कारण अधिक जोखिम का सामना करना पड़ता है।
- जनशक्ति की कमी: कर्मचारियों की कमी से कार्यभार बढ़ता है, थकान बढ़ती है तथा त्रुटियों की संभावना अधिक हो जाती है।
- उदाहरण: विशाखापत्तनम इस्पात संयंत्र में श्रमिक संघों ने स्टाफ कटौती एवं अत्यधिक कार्यभार के आरोप लगाए।
- अनियमित प्रबंधन : आर्थिक दबावों के कारण उद्योग आवश्यक रखरखाव को टाल देते हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता है।
- उदाहरण: विशाखापत्तनम विस्फोट में पुराने उपकरणों एवं रखरखाव की कमी को एक प्रमुख कारण बताया गया।
- सामाजिक संवेदनशीलता: जोखिमपूर्ण कार्यों का बोझ अक्सर आर्थिक एवं सामाजिक रूप से हाशिए पर मौजूद वर्गों पर अधिक पड़ता है।
- उदाहरण: मैनुअल स्कैवेंजिंग तथा अन्य खतरनाक श्रम में जाति एवं वर्ग आधारित असमान जोखिम की निरंतरता देखी जाती है।
तकनीकी विफलताओं की उपेक्षा क्यों नहीं की जा सकती
- उच्च-जोखिम प्रक्रियाएँ: कुछ उद्योग स्वभावतः अत्यंत जोखिमपूर्ण तकनीकों से जुड़े होते हैं, जिनमें निरंतर सतर्कता आवश्यक होती है।
- उदाहरण: इस्पात निर्माण में अत्यधिक तापमान, दाबयुक्त गैसें और पिघला हुआ धातु शामिल होते हैं, जिससे दुर्घटना की संभावना गंभीर रूप ले सकती है।
- उपकरणों की पुरानी अवस्था: पुरानी एवं अप्रचलित मशीनें समय के साथ परिचालन जोखिम को बढ़ाती हैं, यदि उनका आधुनिकीकरण न किया जाए।
- प्रक्रियागत विफलताएँ: छोटी तकनीकी त्रुटियाँ भी शृंखलाबद्ध प्रभाव से बड़े औद्योगिक हादसों में बदल सकती हैं।
- इंजीनियरिंग सुरक्षा उपाय: श्रमिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी सुरक्षा प्रणालियाँ अनिवार्य हैं।
- उदाहरण: बंद स्थान (Confined Spaces) जैसे सेप्टिक टैंक में प्रवेश से पूर्व यांत्रिक वेंटिलेशन प्रणाली का उपयोग आवश्यक है।
- निगरानी प्रणालियाँ: उन्नत तकनीकी निगरानी प्रणालियाँ दुर्घटनाओं को प्रारंभिक चरण में ही रोकने में सहायक होती हैं।
- उदाहरण: व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता (OSH Code), 2020 बेहतर सुरक्षा मानकों एवं अनुपालन तंत्र को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल है।
आगे की राह
- सुरक्षा संस्कृति का संस्थानीकरण: सुरक्षा को केवल अनुपालन का विषय न मानकर प्रबंधन की प्राथमिक प्राथमिकता बनाया जाए।
- उदाहरण: खतरनाक उद्योगों में अनिवार्य बोर्ड-स्तरीय सुरक्षा ऑडिट लागू किए जाएँ।
- संविदा श्रम सुधार: संविदा श्रमिकों के लिए समान प्रशिक्षण, पर्यवेक्षण एवं जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
- उदाहरण: व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता, 2020 के अंतर्गत समान सुरक्षा मानकों का पालन अनिवार्य किया जाए।
- निवारक ऑडिट: नियमित तृतीय-पक्ष सुरक्षा निरीक्षण एवं रखरखाव जाँच अनिवार्य की जाए।
- प्रौद्योगिकी उन्नयन: आधुनिक सुरक्षा उपकरणों एवं निगरानी प्रणालियों में निवेश को प्रोत्साहित किया जाए।
- उदाहरण: गैस डिटेक्टर एवं स्वचालित शटडाउन प्रणालियों की स्थापना।
- श्रमिक सशक्तीकरण: खतरों की पहचान एवं रिपोर्टिंग में श्रमिकों की भागीदारी को मजबूत किया जाए।
- उदाहरण: श्रम कानूनों के तहत अनिवार्य कार्यस्थल सुरक्षा समितियों को प्रभावी बनाया जाए।
निष्कर्ष
औद्योगिक दुर्घटनाएँ प्रायः अलग-थलग घटनाएँ नहीं होतीं हैं, बल्कि ये तकनीकी जोखिमों, कमजोर संस्थागत ढाँचों तथा सामाजिक-आर्थिक संवेदनशीलताओं के परस्पर प्रभाव का परिणाम होती हैं। अतः सतत् औद्योगिक विकास के लिए सुरक्षा को सुदृढ़ करना, जवाबदेही सुनिश्चित करना तथा श्रमिक संरक्षण को मजबूत बनाना अनिवार्य है।