Q. साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और गहरे ऐतिहासिक संबंधों के बावजूद, भारत और दक्षिण कोरिया के बीच वास्तविक आर्थिक और रणनीतिक क्षमता अभी भी पूरी तरह से साकार नहीं हो पाई है। इस द्विपक्षीय संबंध में बाधा डालने वाली चुनौतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए और हालिया भू-राजनीतिक अस्थिरता के संदर्भ में, इन चुनौतियों से निपटने के उपाय सुझाएँ। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत-दक्षिण कोरिया संबंधों में संरचनात्मक और भू-राजनीतिक बाधाओं की चर्चा  कीजिए। 
  • द्विपक्षीय आर्थिक और रणनीतिक जुड़ाव पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए। 
  • उभरते भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच संबंधों को मजबूत करने के उपाय सुझाइए।

उत्तर

साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और ऐतिहासिक संबंधों के बावजूद, भारत-दक्षिण कोरिया संबंध आर्थिक और रणनीतिक क्षेत्रों में अभी तक पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाए हैं। संरचनात्मक कठोरताएँ और भू-राजनीतिक भिन्नताएँ क्षमता को एक मजबूत साझेदारी में बदलने में बाधा डालती रहती हैं, जबकि बदलती वैश्विक अनिश्चितताएं रणनीतिक अभिसरण के नए अवसर पैदा करती हैं।

संरचनात्मक एवं भू-राजनीतिक बाधाएँ

  • व्यापार असंतुलन: लगातार बना व्यापार घाटा पारस्परिक आर्थिक विश्वास को कमजोर करता है और संतुलित विकास को सीमित करता है।
    • उदाहरण: भारत को दक्षिण कोरिया के साथ लगभग 27 अरब डॉलर के व्यापार में 15.19 अरब डॉलर का घाटा होता है।
  • क्षेत्रीय सीमितता: कुछ सीमित क्षेत्रों में अधिक निर्भरता से विविधीकरण और लचीलापन बाधित होता है।
    • उदाहरण: व्यापार मुख्यतः इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, और पेट्रो-रसायन क्षेत्रों तक सीमित है।
  • नियामकीय बाधाएँ: जटिल प्रक्रियाएँ और नीतिगत अनिश्चितता निवेश को हतोत्साहित करती हैं और पारस्परिक व्यापार वृद्धि को सीमित करती हैं।
    • उदाहरण: वित्त वर्ष 2025 में भारत का कोरिया को निर्यात लगभग 5.82 अरब डॉलर रहा, जो कुछ ही क्षेत्रों में केंद्रित है।
  • चीन पर निर्भरता: चीन के प्रति भिन्न आर्थिक निर्भरता भारत के साथ रणनीतिक सामंजस्य को सीमित करती है।
    • उदाहरण: दक्षिण कोरिया की उच्च व्यापार निर्भरता बनाम भारत की रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा।
  • हिंद-प्रशांत अंतराल: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भिन्न रणनीतिक प्राथमिकताएँ समन्वित सहयोग को सीमित करती हैं।
    • उदाहरण: भारत की सक्रिय क्वाड (QUAD) भागीदारी के मुकाबले कोरिया का अपेक्षाकृत सतर्क दृष्टिकोण।

द्विपक्षीय सहभागिता पर प्रभाव

  • व्यापार में सीमित वृद्धि: संरचनात्मक समस्याएँ द्विपक्षीय व्यापार के विस्तार को बाधित करती हैं।
    • उदाहरण: व्यापार लगभग 27 अरब डॉलर पर स्थिर है, जो संभावित 50 अरब डॉलर के लक्ष्य से काफी कम है।
  • निवेश में ठहराव: निवेश कुछ बड़ी कंपनियों तक सीमित है, व्यापक भागीदारी का अभाव है।
    • उदाहरण: भारत में कोरियाई निवेश में सैमसंग का वर्चस्व।
  • आपूर्ति एकीकरण का कमजोर होना: मूल्य शृंखला में कमजोर जुड़ाव से विनिर्माण क्षेत्र में आर्थिक पूरकता कम होती है।
    • उदाहरण: भारत अभी भी पूर्वी एशियाई उत्पादन नेटवर्क के मुख्य ढाँचे से बाहर है।
  • रणनीतिक प्रदर्शन में कमी: रक्षा और उच्च प्रौद्योगिकी सहयोग सीमित होने से रणनीतिक गहराई कम होती है।
    • उदाहरण: “विशेष रणनीतिक साझेदारी” के बावजूद संयुक्त रक्षा उत्पादन बहुत कम है (विदेश मंत्रालय)।
  • अवसरों का चूकना: भू-राजनीतिक परिवर्तनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता।
    • उदाहरण: पश्चिम एशिया में तनाव से उत्पन्न आपूर्ति शृंखला व्यवधानों पर साझा चिंताओं के बावजूद सीमित समन्वय।

संबंधों को सुदृढ़ करने के उपाय

  • CEPA सुधार: व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) को उन्नत करने से असंतुलन दूर किया जा सकता है और बाज़ार तक पहुँच बढ़ाई जा सकती है।
    • उदाहरण: भारत और कोरिया ने 2026 में CEPA को उन्नत करने के लिए वार्ताएँ पुनः शुरू की हैं।
  • आपूर्ति शृंखला सुदृढ़ीकरण: मजबूत और लचीली आपूर्ति शृंखलाएँ आर्थिक सहयोग को बढ़ा सकती हैं।
    • उदाहरण: अर्द्धचालक और विद्युत वाहन घटकों में सहयोग।
  • रणनीतिक समन्वय: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बेहतर समन्वय से सुरक्षा सहयोग को गहराई मिल सकती है।
    • उदाहरण: समुद्री सहयोग और क्षेत्रीय संवादों को सुदृढ़ करना।
  • प्रौद्योगिकी साझेदारी: उभरते क्षेत्रों में संयुक्त पहल से संबंध मजबूत हो सकते हैं।
    • उदाहरण: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जहाज निर्माण, स्वच्छ ऊर्जा और नाभिकीय सहयोग पर ध्यान।
  • संस्थागत तंत्र: मजबूत संस्थागत ढाँचे से समन्वय बेहतर हो सकता है।
    • उदाहरण: भारत–कोरिया औद्योगिक सहयोग समिति और डिजिटल ब्रिज पहल की स्थापना। 

निष्कर्ष

भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच भारत और दक्षिण कोरिया को सीमित सहयोग से आगे बढ़कर समग्र साझेदारी की ओर अग्रसर होना चाहिए। गहन आर्थिक एकीकरण और रणनीतिक समन्वय के माध्यम से दोनों देश अप्रयुक्त संभावनाओं को साकार कर सकते हैं तथा अनिश्चित वैश्विक व्यवस्था में लचीले एवं विश्वसनीय साझेदार के रूप में उभर सकते हैं।

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