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Q. मानव-वन्यजीव संघर्ष (HWC) अब केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक जटिल सामाजिक-पारिस्थितिक चुनौती बन गया है। भारत में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष (HWC) के कारणों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए और सतत् सह-अस्तित्व सुनिश्चित करने हेतु सफल वैश्विक मॉडलों पर आधारित एक बहु-आयामी दृष्टिकोण सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)

May 13, 2026

GS Paper IIIEnvironment & Ecology

प्रश्न की मुख्य माँग

  • एक जटिल सामाजिक–पारिस्थितिकी चुनौती के रूप में मानव–वन्यजीव संघर्ष की चर्चा कीजिए।
  • भारत में बढ़ते मानव–वन्यजीव संघर्ष के कारणों का उल्लेख कीजिए।
  • सतत् मानव–वन्यजीव सहअस्तित्व हेतु बहुआयामी दृष्टिकोण सुझाइए।

उत्तर

भारत में मानव–वन्यजीव संघर्ष  पारिस्थितिकी संरक्षण एवं मानव आजीविका के मध्य गहरे तनाव को दर्शाता है। हाथियों, तेंदुओं एवं अन्य शिकारी वन्यजीवों के साथ बढ़ता संघर्ष यह स्पष्ट करता है कि सहअस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए केवल मुआवजा एवं पुलिसिंग आधारित प्रतिक्रियाएँ पर्याप्त नहीं हैं।

एक सामाजिक-पारिस्थितिकी चुनौती के रूप में मानव–वन्यजीव संघर्ष

  • आवासीय क्षेत्र का क्षरण: वनों की कटाई, खनन एवं अवसंरचना परियोजनाएँ वन क्षेत्रों को सीमित कर रही हैं, जिससे वन्यजीव मानव बस्तियों की ओर स्थानातरित होने के लिए विवश हो रहे हैं।
    • उदाहरण: असम में हाथी गलियारे, रेलवे लाइनों एवं राजमार्गों से प्रभावित हुए हैं।
  • आजीविका पर निर्भरता: वन सीमावर्ती समुदाय कृषि, चराई एवं वन उत्पादों पर निर्भर रहते हैं, जिससे उनका वन्यजीवों के साथ प्रत्यक्ष संपर्क बढ़ जाता है।
    • उदाहरण: कर्नाटक एवं पश्चिम बंगाल में हाथियों द्वारा फसलों को नुकसान पहुँचाने की घटनाएँ किसानों को बार-बार प्रभावित करती हैं।
  • भूमि उपयोग में परिवर्तन: कृषि एवं बागान क्षेत्रों का वन सीमाओं तक विस्तार संघर्ष क्षेत्रों को और अधिक बढ़ा देता है।
    • उदाहरण: केरल में हाथी आवास क्षेत्रों के समीप स्थित चाय बागानों में हाथियों का बार-बार प्रवेश होता है।
  • सामाजिक असमानता: गरीब एवं आदिवासी समुदाय सबसे अधिक नुकसान उठाते हैं, जबकि संरक्षण के लाभ समान रूप से वितरित नहीं होते हैं।
    • उदाहरण: मध्य प्रदेश के बाघ अभयारण्यों के समीप स्थित आदिवासी गाँवों में पशुधन हानि होने पर समय पर मुआवजा नहीं मिल पाता।
  • जलवायु संबंधी दबाव: सूखा एवं वर्षा के बदलते पैटर्न वनों के भीतर भोजन एवं जल की उपलब्धता को कम करते हैं, जिससे वन्यजीव बाहरी क्षेत्रों की ओर बढ़ते हैं।

मानव–वन्यजीव संघर्ष के कारण

  • खंडित आवासीय क्षेत्र: सड़क, रेलवे एवं नहर जैसी रैखिक अवसंरचनाएँ वन्यजीव गलियारों एवं प्रवास मार्गों को बाधित करती हैं।
  • जनसंख्या का दबाव: संरक्षित क्षेत्रों के आस-पास जनसंख्या वृद्धि से वन सीमावर्ती क्षेत्रों में बस्तियों का घनत्व बढ़ रहा है।
  • कमजोर नियोजन: विकास परियोजनाएँ अक्सर पारिस्थितिकी वहन क्षमता एवं वन्यजीव गलियारा मानचित्रण की उपेक्षा करती हैं।
    • उदाहरण: जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान के आस-पास अनियंत्रित रिसॉर्ट विकास से तेंदुओं के साथ संघर्ष की घटनाएँ बढ़ी हैं।
  • मुआवजा वितरण में देरी: धीमी मुआवजा प्रक्रिया एवं कमजोर बीमा व्यवस्था वन्यजीव संरक्षण के प्रति असंतोष उत्पन्न करती है।
    • उदाहरण: अनेक राज्यों में फसल एवं पशुधन हानि के मुआवजे में वन विभागीय योजनाओं के अंतर्गत देरी की शिकायतें सामने आती हैं।
  • प्रतिक्रियात्मक शासन व्यवस्था: नीतियाँ अक्सर रोकथाम के बजाय केवल पकड़ने, स्थानांतरण अथवा मुआवजा देने तक सीमित रहती हैं।

बहुआयामी दृष्टिकोण

  • वन्यजीव गलियारों का संरक्षण: वैज्ञानिक भूमि उपयोग योजना एवं कानूनी संरक्षण के माध्यम से वन्यजीव गलियारों को सुरक्षित एवं पुनर्स्थापित किया जाना चाहिए।
    • उदाहरण: वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया द्वारा भारत में हाथी गलियारों के मानचित्रण से उनकी आवाजाही की बेहतर योजना संभव हुई।
  • सामुदायिक प्रोत्साहन: स्थानीय समुदायों को संरक्षण से प्राप्त लाभों में प्रत्यक्ष आर्थिक भागीदारी दी जानी चाहिए।
    • उदाहरण: नामीबिया का सामुदायिक संरक्षित क्षेत्र मॉडल वन्यजीव संरक्षण को स्थानीय पर्यटन आय से जोड़ता है।
  • पूर्व चेतावनी प्रणाली: वन्यजीवों की गतिविधियों की अग्रिम सूचना हेतु SMS अलर्ट, GPS कॉलर एवं ड्रोन जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाना चाहिए।
    • उदाहरण: तमिलनाडु में SMS आधारित हाथी चेतावनी प्रणाली अचानक होने वाली मुठभेड़ों को कम करती है।
  • त्वरित मुआवजा: फसल, मानव एवं पशुधन हानि के लिए पारदर्शी एवं समयबद्ध डिजिटल मुआवजा प्रणाली सुनिश्चित की जानी चाहिए।
    • उदाहरण: कर्नाटक के ऑनलाइन मुआवजा पोर्टल ने वन प्रशासन के प्रति किसानों का विश्वास बढ़ाया।
  • साझा शासन व्यवस्था: वन विभाग, पंचायतों एवं स्थानीय समुदायों को संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों का संयुक्त प्रबंधन करना चाहिए।
    • उदाहरण: केन्या का सहभागी वन्यजीव प्रबंधन मॉडल स्थानीय संरक्षण भागीदारी के माध्यम से संघर्ष को कम करता है।

निष्कर्ष

सतत् सहअस्तित्व तभी संभव है जब संरक्षण की नीति केवल संघर्ष नियंत्रण तक सीमित न रहकर साझा संरक्षण उत्तरदायित्व की दिशा में आगे बढ़े। भारत को पारिस्थितिकी विज्ञान, स्थानीय सहभागिता एवं समयबद्ध न्याय को एकीकृत करना होगा, ताकि वन्यजीव संरक्षण ग्रामीण आजीविका के लिए खतरा बनने के बजाय उसे सुदृढ़ करे।

Human-Wildlife Conflict (HWC) is no longer merely a law-and-order issue but a complex socio-ecological challenge. Critically analyze the reasons behind rising HWC in India and suggest a multi-pronged approach based on successful global models to ensure sustainable coexistence. in hindi

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