प्रश्न की मुख्य माँग
- स्थिरता और विकास के लिए राजकोषीय प्रबंधन का महत्त्व
- संबंधित चुनौतियाँ
- चुनौतियों से निपटने के लिए आगे की राह।
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उत्तर
केंद्रीय बजट 2026-27 ने वित्त वर्ष 2027 के लिए राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को घटाकर GDP का 4.3% कर दिया है, जो वित्त वर्ष 2026 के 4.4% के संशोधित अनुमान से कम है। यह कदम वित्त वर्ष 2026 तक घाटे को 4.5% से नीचे लाने की वर्ष 2021 की प्रतिबद्धता को सफलतापूर्वक पूरा करता है। साथ ही, यह एक नए राजकोषीय आधार अर्थात् ‘ऋण-जीडीपी अनुपात’ की ओर बदलाव का संकेत देता है, जिसे वर्ष 2031 तक 50% ± 1% पर रखने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
स्थिरता और विकास के लिए राजकोषीय प्रबंधन का महत्त्व
- निवेशकों का भरोसा और क्रेडिट रेटिंग: वैश्विक अस्थिरता के बावजूद ‘ग्लाइड पाथ’ (लक्ष्य पथ) का पालन करना, दीर्घकालिक पूँजी के लिए भारत की छवि को एक “स्थिर अधिकार क्षेत्र” के रूप में मजबूत करता है।
- उदाहरण: वर्ष 2026 की शुरुआत में, S&P ग्लोबल रेटिंग्स ने भारत के 4.3% लक्ष्य पर भरोसा जताया और इसे विकास तथा उत्तरदायी व्यय के बीच का संतुलन बताया।
- मुद्रास्फीति के दबाव को नियंत्रित करना: सरकार द्वारा अनुशासित ऋण अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति को सीमित करती है, जिससे RBI को मुद्रास्फीति को 4% (± 2%) की सुविधाजनक सीमा में रखने में मदद मिलती है।
- निजी निवेश को बढ़ावा : सरकार द्वारा कम ऋण (निवल बाजार ऋण को ₹11.7 लाख करोड़ पर रखा गया है) बैंकिंग प्रणाली में निजी क्षेत्र के लिए अधिक ऋण उपलब्ध कराती है।
- उदाहरण: इस बजट का उद्देश्य स्टार्ट-अप और MSME पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बॉण्ड बाजार की स्थितियों में सुधार करने हेतु संप्रभु ऋण के दबाव को कम करना है।
- पूँजीगत व्यय (Capex) के लिए राजकोषीय स्थान: घाटे का प्रबंधन बुनियादी ढाँचे पर “गुणवत्तापूर्ण व्यय” की अनुमति देता है, जिसका अर्थव्यवस्था पर उच्च गुणक प्रभाव पड़ता है।
- उदाहरण: दीर्घकालिक विकास को गति देने के लिए वर्ष 2026 के बजट में पूँजीगत व्यय को रिकॉर्ड ₹12.2 लाख करोड़ (GDP का 4.4%) तक बढ़ा दिया गया है।
संबंधित चुनौतियाँ
- राजस्व उछाल संबंधी चिंताएँ : व्यक्तिगत आय में धीमी वृद्धि और GST दरों के युक्तिकरण का प्रभाव कर संग्रह पर दबाव डाल सकता है।
- उदाहरण: सकल कर राजस्व (GDP के प्रतिशत के रूप में) के वित्त वर्ष 2026 (संशोधित अनुमान – RE) में 11.4% से गिरकर वित्त वर्ष 2027 (बजट अनुमान – BE) में थोड़ा कम होकर 11.2% होने का अनुमान है।
- वैश्विक बाधाएँ : उच्च अमेरिकी टैरिफ और यूरोप में भू-राजनीतिक तनाव निर्यात-आधारित राजस्व को कम कर सकते हैं, जिससे राजकोषीय गणना जटिल हो सकती है।
- प्रतिबद्ध व्यय : भारी ब्याज भुगतान (जो कुल व्यय का 26% है) और 8वें वेतन आयोग जैसी आगामी देनदारियाँ, विवेकाधीन खर्च के लिए सीमित लचीलापन प्रदान करती हैं।
- राज्य-स्तरीय राजकोषीय तनाव: जबकि केंद्र अपने घाटे को कम (Consolidates) कर रहा है, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बढ़ती उधारी और सब्सिडी का बोझ कुल “सामान्य सरकारी ऋण” के लिए खतरा उत्पन्न करता है।
चुनौतियों से निपटने के लिए आगे की राह
- ऋण आधार की ओर संक्रमण: वार्षिक घाटे के प्रवाह के बजाय कुल ऋण पर ध्यान केंद्रित करना (वित्त वर्ष 2027 के लिए लक्ष्य 55.6%)। यह संकट के दौरान प्रति-चक्रीय लचीलेपन की अनुमति देता है।
- कर आधार को व्यापक बनाना: अनुपालन को सरल बनाने और तकनीक के माध्यम से राजस्व वृद्धि में सुधार करने के लिए नया आयकर अधिनियम, 2025 (अप्रैल 2026 से प्रभावी) लागू करना।
- संपत्ति मुद्रीकरण और लाभांश: कर की कमी की भरपाई के लिए गैर-कर राजस्व, जैसे RBI लाभांश और विनिवेश पर निरंतर निर्भरता।
- सहकारी राजकोषीय संघवाद : 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के माध्यम से राज्यों को मध्यम अवधि की ऋण कटौती रणनीतियों की ओर प्रेरित करना।
निष्कर्ष
2026 का बजट उसे दर्शाता है जिसे विश्लेषक “रणनीतिक संयम” कहते हैं। 10-आधार अंकों की मध्यम कटौती का विकल्प चुनकर, सरकार ने “अचानक कटौती” के बजाय “ग्लाइड” को प्राथमिकता दी है, यह सुनिश्चित करते हुए कि राजकोषीय अनुशासन, आवश्यक सार्वजनिक निवेश को बाधित न करे। ऐसे युग में जहाँ वैश्विक प्रणालियाँ अब वृहद्-सफलता को स्वचालित स्थिरता के साथ पुरस्कृत नहीं करती हैं, 4.3% घाटे के प्रति भारत की प्रतिबद्धता इसके सबसे शक्तिशाली आर्थिक कवच के रूप में कार्य करती है।