प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में संस्थागत चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।
- भारत में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में शासन संबंधी चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।
- आगे की राह सुझाइए।
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उत्तर
हाल ही में खाद्य पदार्थों में मिलावट की घटनाओं ने भारत की खाद्य सुरक्षा प्रणाली की कमियों को उजागर किया है। राजामहेंद्रवरम् में विषाक्तता की घटना ने नियामक निगरानी और प्रवर्तन में खामियों को उजागर किया। सुरक्षित खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए मजबूत संस्थागत क्षमता और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण जैसे नियामकों के नेतृत्व में प्रभावी शासन तंत्र की आवश्यकता है।
भारत में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में संस्थागत चुनौतियाँ
- कमजोर नियामक निगरानी क्षमता: खाद्य सुरक्षा नियामक संस्थाओं के पास अक्सर निरीक्षकों, प्रयोगशालाओं और निगरानी अवसंरचना की कमी होती है, जिससे प्रभावी पर्यवेक्षण सीमित हो जाता है।
- उदाहरण: राजामहेंद्रवरम् में एक डेयरी 11 वर्षों तक बिना सुरक्षा लाइसेंस के संचालित होती रही।
- अपर्याप्त निरीक्षण और परीक्षण अवसंरचना: सीमित खाद्य परीक्षण सुविधाओं के कारण दूषण और मिलावट की पहचान में देरी होती है।
- उदाहरण: नियमित परीक्षण की कमी के कारण एथिलीन ग्लाइकॉल से दूषित दूध राजामहेंद्रवरम् में उपभोक्ताओं तक पहुँच गया।
- खंडित संस्थागत जिम्मेदारियाँ: केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच विभिन्न एजेंसियों की जिम्मेदारियाँ बँटी होने से समन्वय में अंतराल उत्पन्न होता है।
- अनौपचारिक आपूर्ति शृंखलाओं का सीमित नियमन: खाद्य वितरण का बड़ा हिस्सा छोटे विक्रेताओं और अनौपचारिक बाजारों के माध्यम से होता है, जो प्रभावी नियमन के दायरे से बाहर रह जाते हैं।
- कमजोर प्रारंभिक पहचान प्रणाली: खाद्य सुरक्षा संस्थाएँ अक्सर संकट उत्पन्न होने के बाद प्रतिक्रिया देती हैं, बजाय इसके कि वे उल्लंघनों का समय रहते पता लगा सकें।
- उदाहरण: राजामहेंद्रवरम् में विषाक्तता की घटना से पहले दूध के कड़वे स्वाद की शिकायतों को कथित रूप से अनदेखा किया गया।
भारत में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में शासन संबंधी चुनौतियाँ
- मौजूदा कानूनों का कमजोर क्रियान्वयन: मजबूत कानूनी ढाँचा होने के बावजूद यदि उसका क्रियान्वयन असंगत या विलंबित हो, तो प्रभावी परिणाम नहीं प्राप्त होते हैं।
- उदाहरण: खाद्य एवं सुरक्षा मानक अधिनियम के बावजूद संबंधित डेयरी कई वर्षों तक बिना हस्तक्षेप के अवैध रूप से संचालित होती रही।
- घटनाओं के बाद दंडात्मक कार्रवाई पर अत्यधिक निर्भरता: अक्सर प्राधिकरण संकट के बाद कठोर दंड लागू करते हैं, जबकि नियमित निगरानी के माध्यम से पहले ही उल्लंघनों को रोका जा सकता है।
- उदाहरण: मृत्यु होने के बाद ही पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराएँ, जैसे धारा 103 और 105 लागू कीं।
- स्थानीय शासन और जवाबदेही की कमजोरी: स्थानीय नियामक संस्थाओं में नियमित निरीक्षण और लाइसेंसिंग सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेही तंत्र अक्सर कमजोर होता है।
- अनौपचारिकता और बाजार से बाहर होने का जोखिम: कठोर आपराधिक दंड छोटे संचालकों को औपचारिक व्यवस्था से बाहर धकेल सकते हैं, जिससे नियामक निगरानी और कमजोर हो सकती है।
- स्वैच्छिक अनुपालन के लिए कम प्रोत्साहन: व्यवसाय अक्सर विषाक्त या समस्या की जानकारी देने से बचते हैं, क्योंकि उन्हें दंड और प्रतिष्ठा हानि का डर होता है।
आगे की राह
- निरीक्षण और निगरानी प्रणालियों को सुदृढ़ करना: खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं की नियमित मैदानी जाँच और डिजिटल निगरानी को मजबूत किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के अंतर्गत परीक्षण और निगरानी तंत्र के विस्तार की पहल।
- खाद्य परीक्षण अवसंरचना का विस्तार: जिलों में मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं और त्वरित परीक्षण सुविधाओं की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए।
- उदाहरण: खाद्य सुरक्षा तंत्र के अंतर्गत FSSAI-अधिसूचित खाद्य प्रयोगशालाओं के विस्तार हेतु सरकारी पहल।
- अनुपालन अवसंरचना का विकास: दूषण के जोखिम को कम करने के लिए सस्ती कोल्ड-चेन सुविधाएँ, स्वच्छता प्रशिक्षण और परीक्षण किट उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
- उदाहरण: छोटे डेयरी उद्यमों के लिए सब्सिडी वाले परीक्षण किट और सहकारी शीतकरण सुविधाएँ।
- प्रारंभिक सूचना और व्हिसल-ब्लोइंग तंत्र: दूषण की जानकारी देने वाले संचालकों के लिए सुरक्षित-हार्बर प्रावधान लागू किए जाने चाहिए।
उदाहरण: खाद्य सुरक्षा उल्लंघनों की स्वैच्छिक रिपोर्टिंग पर कम दंड का प्रावधान।
- उपभोक्ता जागरूकता और ट्रेसेबिलिटी प्रणाली: सुरक्षित खाद्य स्रोतों की पहचान के लिए निगरानी तकनीक और सार्वजनिक जागरूकता को बढ़ावा देना आवश्यक है।
- उदाहरण: अमूल और विजय मिल्क जैसी सहकारी आपूर्ति शृंखलाएँ नियंत्रित और ट्रेस करने योग्य दूध वितरण प्रणाली प्रदान करती हैं।
निष्कर्ष
भारत में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केवल संकट के बाद कठोर दंडात्मक कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। इसके लिए नियामक संस्थाओं को सुदृढ़ करना, निरीक्षण क्षमता में सुधार करना, नियमों का पालन करने वाली आपूर्ति शृंखलाओं को समर्थन देना तथा प्रारंभिक पहचान तंत्र को प्रोत्साहित करना आवश्यक है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के नेतृत्व में निवारक और प्रौद्योगिकी-समर्थित शासन ढाँचा विकसित किया जाए, तो देश में अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय खाद्य प्रणाली सुनिश्चित की जा सकती है।