प्रश्न की मुख्य माँग
- गहरे समुद्र में मत्स्यपालन की ओर भारत का प्रयास।
- तटीय समुद्री क्षेत्रों की उपेक्षा के परिणाम।
- आगे की राह – सतत् मत्स्यपालन प्रबंधन ।
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उत्तर
परिचय
भारत का समुद्री मत्स्य क्षेत्र लाखों लोगों की आजीविका का समर्थन करता है और खाद्य सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। यद्यपि सरकार तटीय संसाधनों पर दबाव कम करने के लिए गहरे समुद्र में मत्स्यपालन को बढ़ावा देती है, परंतु तटीय नितलस्थ पारिस्थितिकी (Inshore Benthic Ecology) की उपेक्षा दीर्घकालिक स्थिरता को कमजोर करती है।
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नीतिगत प्रतिक्रिया के रूप में गहरे समुद्र में मत्स्यपालन
- अपतटीय संसाधनों का विस्तार: यह पहल यंत्रीकृत मछुआरों को महाद्वीपीय शेल्फ से आगे अपतटीय क्षेत्रों में मत्स्य संसाधनों के दोहन के लिए प्रोत्साहित करती है। भारतीय मत्स्य बेड़े को विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) की ओर अग्रसर करने का उद्देश्य तटीय मत्स्य संसाधनों पर बढ़ते दबाव एवं उनके अत्यधिक दोहन को कम करना है।
- उदाहरण: ‘अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) नियमों में मत्स्य पालन का सतत उपयोग, 2025’ के तहत अपतटीय विस्तार को विनियमित करना।
- प्रौद्योगिकी का समावेश: दूरस्थ समुद्री क्षेत्रों में मत्स्य दोहन की क्षमता बढ़ाने के लिए बड़े ट्रॉलरों, गहरे समुद्र में संचालित होने वाले जहाजों तथा आधुनिक तकनीक से युक्त नौकाओं का उपयोग।
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- उदाहरण: यंत्रीकृत नौकाएँ, उच्च क्षमता वाले इंजन तथा उन्नत नौवहन उपकरण।
- संभावित उत्पादन: खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुमान बताते हैं कि गहरे समुद्र के संसाधनों से केवल आंशिक अतिरिक्त मछलियाँ ही प्राप्त हो सकती है, जो इसकी सीमाओं को रेखांकित करती है।
तटवर्ती समुद्री पारिस्थितिकी की उपेक्षा
- अत्यधिक मत्स्यन और आवास का क्षरण: तटवर्ती नितलस्थ क्षेत्र (Inshore benthic zones) बार-बार ट्रॉलिंग और यंत्रीकृत मछली पकड़ने से प्रभावित होते हैं।
- उदाहरण: पाक खाड़ी (Palk Bay) में बार-बार ट्रॉलर गतिविधियों के कारण झींगा और स्थानीय मछलियों की कमी देखी जा रही है।
- प्रदूषण और पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव: औद्योगिक अपशिष्ट, मैंग्रोव का नुकसान और बांधों का बहाव तटीय उत्पादकता को कम करते हैं।
- छोटे पैमाने के मछुआरों के साथ संघर्ष: यंत्रीकृत बेड़े पारंपरिक मछुआरों को पीछे छोड़ देते हैं, जिससे उनकी आजीविका कम हो जाती है।
- उदाहरण: तमिलनाडु के छोटे पैमाने के मछुआरे पकड़ में आ रही मछलियों की घटती संख्या और गहरे समुद्र की ओर मजबूरन पलायन की बात कहते हैं।
- कमजोर प्रवर्तन: 5 समुद्री मील (NM) के तटवर्ती क्षेत्रों जैसे निषेधों में जनशक्ति और निगरानी की कमी है, जिससे निरंतर पारिस्थितिक नुकसान हो रहा है।
आगे की राह
- तटवर्ती शासन को मजबूत करना: गश्त बढ़ाना, स्थानीय मछुआरा सहकारी समितियों को सशक्त बनाना और स्थानिक सीमाओं को लागू करना।
- वैज्ञानिक स्टॉक मूल्यांकन: केवल लैंडिंग डेटा (पकड़ी गई मछलियों के आँकड़ों) पर निर्भर रहने के बजाय नियमित रूप से यथास्थान स्टॉक सर्वेक्षण करना।
- मछली पकड़ने की सतत प्रथाएँ: गियर (उपकरणों) पर प्रतिबंध, मौसमी बंदी और मैंग्रोव तथा कोरल रीफ के पुनर्स्थापन को प्रोत्साहित करना।
- उदाहरण: समुद्री मात्स्यिकी फ्रेमवर्क, 2025 (Marine Fisheries Framework, 2025) के तहत वैधानिक प्रतिबंधों को लागू करना, जो संवेदनशील नितलस्थ पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के लिए पेयर ट्रॉलिंग, बुल ट्रॉलिंग और एलईडी-लाइट आकर्षित करने वाले उपकरणों जैसे विनाशकारी तरीकों को स्पष्ट रूप से गैर-कानूनी घोषित करता है।
- एकीकृत मात्स्यिकी नीति: गहरे समुद्र के विस्तार को तटवर्ती संरक्षण और छोटे पैमाने के मछुआरों की आजीविका के साथ जोड़ना।
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निष्कर्ष
भारत की गहरे समुद्र में मछली पकड़ने की आकांक्षाएं तभी सफल होंगी जब तटवर्ती पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा की जाएगी। पारिस्थितिकी स्थिरता, खाद्य सुरक्षा और मछुआरों की आजीविका के लिए तटीय संरक्षण के साथ अपतटीय विस्तार को संतुलित करना आवश्यक है।