प्रश्न की मुख्य माँग
- रुपये के अवमूल्यन (मूल्यह्रास) के पीछे उत्तरदायी व्यापक आर्थिक मूलभूत कारक
- रुपये को कमजोर करने में अव्यवहार्य विदेशी पूँजी के बहिर्प्रवाह की भूमिका
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उत्तर
परिचय
भारतीय रुपये की विनिमय दर में प्रति डॉलर ₹97 के स्तर की ओर आई तीव्र गिरावट न केवल अंतर्निहित व्यापक आर्थिक दबावों को दर्शाती है, बल्कि अस्थिर वैश्विक पूँजी प्रवाह (Volatile Global Capital Movements) को भी प्रतिबिंबित करती है। यद्यपि कमजोर आर्थिक मूलभूत कारक विनिमय दरों को प्रभावित करते हैं, तथापि सट्टा-आधारित विदेशी बहिर्प्रवाह (Speculative Foreign Outflows) और बाहरी अनिश्चितताएँ भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रा के अवमूल्यन को और अधिक तीव्र कर देती हैं।
रुपये के मूल्यह्रास/अवमूल्यन के पीछे उत्तरदायी व्यापक आर्थिक मूलभूत कारक
- तेल आयात : कच्चे तेल के आयात पर भारत की अत्यधिक निर्भरता के कारण वैश्विक स्तर पर तेल के मूल्यों में वृद्धि के दौरान डॉलर की माँग बढ़ जाती है, जो रुपये को कमजोर करती है।
- व्यापार घाटा : निर्यात की तुलना में अधिक आयात होने से निरंतर चालू खाता घाटा (Current Account Deficit ) बना रहता है, जिससे बाहरी भुगतान का भार बढ़ जाता है।
- उदाहरण: आरबीआई (RBI) के आँकड़े दर्शाते हैं कि वर्ष 2024-25 में भारत का वस्तुगत व्यापार घाटा $240 बिलियन को पार कर गया था।
- आयातित मुद्रास्फीति: वैश्विक मुद्रास्फीति (महँगाई) और महँगे आयात के कारण घरेलू क्रय शक्ति कम हो जाती है, जिससे मुद्रा के प्रति विश्वास कमजोर होता है।
- डॉलर की मजबूती : अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा आक्रामक मौद्रिक नीति को सख्त किए जाने (ब्याज दरों में वृद्धि) से वैश्विक स्तर पर डॉलर मजबूत होता है, जिससे भारत जैसी उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं का अवमूल्यन होता है।
- उदाहरण: यू.एस. फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में की गई वृद्धि के कारण रुपये सहित उभरते बाजारों की मुद्राओं में व्यापक कमजोरी देखी गई।
- बाहरी ऋण: डॉलर के रूप में उच्च पुनर्भुगतान दायित्वों (Repayment Obligations) के कारण वैश्विक अनिश्चितता के दौर में विदेशी मुद्रा की माँग अत्यधिक बढ़ जाती है।
- उदाहरण: आरबीआई की बाह्य ऋण रिपोर्ट (External Debt Report) के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत का बाह्य ऋण $700 बिलियन से अधिक हो गया था।
अव्यवहार्य (सट्टा-आधारित) विदेशी पूँजी के बहिर्प्रवाह की भूमिका
- विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) द्वारा निकासी: वैश्विक अनिश्चितता के दौर में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक, उभरते बाजारों से बहुत तेजी से बाहर निकलते हैं, जिससे रुपये के मूल्य में तीव्र गिरावट (मूल्यह्रास) होती है।
- बाजार की धारणा : विदेशी मुद्रा बाजार, अक्सर केवल घरेलू आर्थिक मूलभूत कारकों के बजाय निवेशकों की धारणा और उनके दृष्टिकोण के आधार पर प्रतिक्रिया करते हैं।
- सुरक्षित-निवेश की ओर झुकाव : किसी भी वैश्विक संकट के दौरान, अंतरराष्ट्रीय निवेशक अपने फंड को भारत जैसे देशों से निकालकर सुरक्षित माने जाने वाली अमेरिकी संपत्तियों (U.S. Assets) में स्थानांतरित कर देते हैं, जिससे भारत में आने वाला पूँजी प्रवाह कम हो जाता है।
- उदाहरण: अमेरिकी बाजार में बॉण्ड प्रतिफल (Bond Yields) बढ़ने के कारण उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पूँजी का पलायन अमेरिकी डॉलर संपत्तियों की ओर होने लगा।
- सट्टा-आधारित व्यापार (Speculative Trading): विदेशी मुद्रा बाजारों (Forex Markets) में अल्पकालिक सट्टा-आधारित दाँव, वास्तविक आर्थिक संकेतकों की तुलना में विनिमय दर की अस्थिरता (Exchange-rate Volatility) को कहीं अधिक बढ़ा देते हैं।
- संक्रामक प्रभाव (Contagion Effect): वैश्विक वित्तीय अस्थिरता घरेलू मूलभूत कारकों की स्थिति पर विचार किए बिना, सामूहिक रूप से सभी उभरते बाजारों की मुद्राओं को एक साथ प्रभावित करती है।
- उदाहरण: वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के परिणामस्वरूप, अधिकांश एशियाई मुद्राओं के साथ-साथ भारतीय रुपये में भी समकालिक अवमूल्यन (Synchronized Depreciation) दर्ज किया गया।
निष्कर्ष
रुपये की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के संतुलित हस्तक्षेप, सुदृढ़ विदेशी मुद्रा भंडार, निर्यात विविवधीकरण, कच्चे तेल पर निर्भरता में कमी और स्थिर पूँजी प्रवाह की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त, घरेलू विनिर्माण को सुदृढ़ करने तथा व्यापक आर्थिक सुभेद्यता में सुधार करने से अव्यवहार्य बाह्य आघातों और अस्थिर विदेशी पूँजी के प्रवाह के प्रति संवेदनशीलता को कम किया जा सकता है।