प्रश्न की मुख्य माँग
- संरचनात्मक कारणों की चर्चा कीजिए।
- संस्थागत विफलताओं को रेखांकित कीजिए।
- आगे की राह सुझाइए।
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उत्तर
हिरासत में हिंसा का तात्पर्य पुलिस द्वारा हिरासत में दुर्व्यवहार/यातना से है, जो डी.के. बसु मामले (1997) में दिए गए सुरक्षा उपायों के बावजूद अनुच्छेद-21 का उल्लंघन है। एनसीआरबी की रिपोर्ट में प्रतिवर्ष हिरासत में होने वाली मौतों की लगातार संख्या दर्ज की गई है, जो कमजोर अनुपालन को दर्शाती है। स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद, सथानकुलम (जयराज-बेनिक्स) मामले ने क्रूर यातना, झूठे आरोपों और प्रणालीगत मिलीभगत को उजागर किया।
संरचनात्मक कारण
- औपनिवेशिक विरासत: पुलिसिंग अब भी पुलिस अधिनियम, 1861 के तहत नियंत्रण-उन्मुख बनी हुई है, जिसमें नागरिक सेवा की अपेक्षा अधिकार को प्राथमिकता दी जाती है।
- उदाहरण: सथानकुलम हिरासत हिंसा मामले में बल-प्रधान व्यवहार स्पष्ट रूप से देखा गया।
- दंडमुक्ति की संस्कृति: कमजोर जवाबदेही तंत्र अधिकारियों द्वारा शक्ति के दुरुपयोग को बढ़ावा देते हैं।
- उदाहरण: सथानकुलम मामले में साक्ष्य नष्ट करने के प्रयास दंड के भय की कमी को दर्शाते हैं।
- हिंसा का सामान्यीकरण: हिरासत में यातना को जाँच के एक सामान्य उपकरण के रूप में देखा जाता है।
- उदाहरण: पीड़ितों से स्वीकारोक्ति प्राप्त करने के लिए अत्यधिक यातनाओं का उपयोग।
- शक्ति असमानता: सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों में दुरुपयोग का विरोध करने की क्षमता कम होती है।
- उदाहरण: लॉकडाउन के दौरान छोटे व्यापारियों पर बिना तत्काल कानूनी उपाय के झूठे आरोप लगाए गए।
संस्थागत विफलताएँ
- चिकित्सीय अनियमितताएँ: डॉक्टर हिरासत में लगी चोटों का स्वतंत्र और निष्पक्ष दस्तावेजीकरण करने में विफल रहते हैं।
- उदाहरण: स्पष्ट यातना के निशानों के बावजूद “फिट फॉर रिमांड” का प्रमाणन देना।
- न्यायिक उदासीनता: मजिस्ट्रेट अक्सर बिना समुचित जाँच के यांत्रिक रूप से रिमांड को स्वीकृति दे देते हैं।
- उदाहरण: स्पष्ट शारीरिक उत्पीड़न के संकेतों के बावजूद पीड़ितों को रिमांड पर भेजना।
- स्व-जाँच: पुलिस अपने ही कदाचार की जाँच करती है, जिससे निष्पक्षता प्रभावित होती है।
- उदाहरण: सीबीआई हस्तक्षेप से पहले साक्ष्यों को दबाने के प्रारंभिक प्रयास।
- कमजोर फॉरेंसिक तंत्र: साक्ष्यों के संरक्षण में कमी से छेड़छाड़ और देरी की संभावना बढ़ जाती है।
- उदाहरण: महत्त्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित करने के लिए उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी।
- गवाहों की असुरक्षा: पर्याप्त सुरक्षा के अभाव में गवाह सत्य बयान देने से हिचकिचाते हैं।
आगे की राह
- कठोर प्रवर्तन: डी. के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए और उल्लंघन पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
- उदाहरण: अनिवार्य गिरफ्तारी मेमो, चिकित्सीय जाँच और परिवार को सूचना देना।
- स्वतंत्र निगरानी: बाहरी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए पुलिस शिकायत प्राधिकरण की स्थापना की जाए।
- उदाहरण: प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में दिए गए निर्देश।
- सीसीटीवी निगरानी: सभी हिरासत क्षेत्रों में रियल-टाइम निगरानी सुनिश्चित की जाए।
- उदाहरण: पुलिस थानों में सीसीटीवी स्थापना के लिए सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश।
निष्कर्ष
“हिरासत में यातना आतंकवाद से भी बदतर है” – वी.आर. कृष्ण अय्यर। हिरासत में हिंसा का बने रहना कानूनों की कमी के कारण नहीं, बल्कि उनके प्रवर्तन और जवाबदेही की विफलता के कारण है। अनुच्छेद-21 के संरक्षण हेतु संस्थागत परिवर्तन आवश्यक है, जिसमें स्वतंत्र निगरानी, डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के निर्देशों का कड़ाई से पालन तथा नागरिक-केंद्रित पुलिस व्यवस्था शामिल हैं, ताकि न्याय, गरिमा और कानून के शासन में विश्वास सुनिश्चित किया जा सके।