Q. डी.के. बसु मामले में निर्धारित व्यापक दिशानिर्देशों के बावजूद, भारत में हिरासत में हिंसा (Custodial Violence) एक कठोर वास्तविकता बनी हुई है। इसके लिए जिम्मेदार संरचनात्मक और संस्थागत विफलताओं का विश्लेषण कीजिए और पुलिस सुधारों के उपाय सुझाएँ। (15 अंक, 250 शब्द)

April 9, 2026

GS Paper IIGovernance

प्रश्न की मुख्य माँग

  • संरचनात्मक कारणों की चर्चा कीजिए। 
  • संस्थागत विफलताओं को रेखांकित कीजिए।
  • आगे की राह सुझाइए।

उत्तर

हिरासत में हिंसा का तात्पर्य पुलिस द्वारा हिरासत में दुर्व्यवहार/यातना से है, जो डी.के. बसु मामले (1997) में दिए गए सुरक्षा उपायों के बावजूद अनुच्छेद-21 का उल्लंघन है। एनसीआरबी की रिपोर्ट में प्रतिवर्ष हिरासत में होने वाली मौतों की लगातार संख्या दर्ज की गई है, जो कमजोर अनुपालन को दर्शाती है। स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद, सथानकुलम (जयराज-बेनिक्स) मामले ने क्रूर यातना, झूठे आरोपों और प्रणालीगत मिलीभगत को उजागर किया।

संरचनात्मक कारण

  • औपनिवेशिक विरासत: पुलिसिंग अब भी पुलिस अधिनियम, 1861 के तहत नियंत्रण-उन्मुख बनी हुई है, जिसमें नागरिक सेवा की अपेक्षा अधिकार को प्राथमिकता दी जाती है।
    • उदाहरण: सथानकुलम हिरासत हिंसा मामले में बल-प्रधान व्यवहार स्पष्ट रूप से देखा गया।
  • दंडमुक्ति की संस्कृति: कमजोर जवाबदेही तंत्र अधिकारियों द्वारा शक्ति के दुरुपयोग को बढ़ावा देते हैं।
    • उदाहरण: सथानकुलम मामले में साक्ष्य नष्ट करने के प्रयास दंड के भय की कमी को दर्शाते हैं।
  • हिंसा का सामान्यीकरण: हिरासत में यातना को जाँच के एक सामान्य उपकरण के रूप में देखा जाता है।
    • उदाहरण: पीड़ितों से स्वीकारोक्ति प्राप्त करने के लिए अत्यधिक यातनाओं का उपयोग।
  • शक्ति असमानता: सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों में दुरुपयोग का विरोध करने की क्षमता कम होती है।
    • उदाहरण: लॉकडाउन के दौरान छोटे व्यापारियों पर बिना तत्काल कानूनी उपाय के झूठे आरोप लगाए गए।

संस्थागत विफलताएँ

  • चिकित्सीय अनियमितताएँ: डॉक्टर हिरासत में लगी चोटों का स्वतंत्र और निष्पक्ष दस्तावेजीकरण करने में विफल रहते हैं।
    • उदाहरण: स्पष्ट यातना के निशानों के बावजूद “फिट फॉर रिमांड”  का प्रमाणन देना।
  • न्यायिक उदासीनता: मजिस्ट्रेट अक्सर बिना समुचित जाँच के यांत्रिक रूप से रिमांड को स्वीकृति दे देते हैं।
    • उदाहरण: स्पष्ट शारीरिक उत्पीड़न के संकेतों के बावजूद पीड़ितों को रिमांड पर भेजना।
  • स्व-जाँच: पुलिस अपने ही कदाचार की जाँच करती है, जिससे निष्पक्षता प्रभावित होती है।
    • उदाहरण: सीबीआई हस्तक्षेप से पहले साक्ष्यों को दबाने के प्रारंभिक प्रयास।
  • कमजोर फॉरेंसिक तंत्र: साक्ष्यों के संरक्षण में कमी से छेड़छाड़ और देरी की संभावना बढ़ जाती है।
    • उदाहरण: महत्त्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित करने के लिए उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी।
  • गवाहों की असुरक्षा: पर्याप्त सुरक्षा के अभाव में गवाह सत्य बयान देने से हिचकिचाते हैं।

आगे की राह

  • कठोर प्रवर्तन: डी. के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए और उल्लंघन पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
    • उदाहरण: अनिवार्य गिरफ्तारी मेमो, चिकित्सीय जाँच और परिवार को सूचना देना।
  • स्वतंत्र निगरानी: बाहरी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए पुलिस शिकायत प्राधिकरण की स्थापना की जाए।
    • उदाहरण: प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में दिए गए निर्देश।
  • सीसीटीवी निगरानी: सभी हिरासत क्षेत्रों में रियल-टाइम निगरानी सुनिश्चित की जाए।
    • उदाहरण: पुलिस थानों में सीसीटीवी स्थापना के लिए सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश।

निष्कर्ष

“हिरासत में यातना आतंकवाद से भी बदतर है” – वी.आर. कृष्ण अय्यर। हिरासत में हिंसा का बने रहना कानूनों की कमी के कारण नहीं, बल्कि उनके प्रवर्तन और जवाबदेही की विफलता के कारण है। अनुच्छेद-21 के संरक्षण हेतु संस्थागत परिवर्तन आवश्यक है, जिसमें स्वतंत्र निगरानी, डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के निर्देशों का कड़ाई से पालन तथा नागरिक-केंद्रित पुलिस व्यवस्था शामिल हैं, ताकि न्याय, गरिमा और कानून के शासन में विश्वास सुनिश्चित किया जा सके।

Despite comprehensive guidelines laid down in D.K. Basu case, custodial violence remains a grim reality in India. Analyze the structural and institutional failures responsible, and suggest measures for police reforms. in hindi

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