प्रश्न की मुख्य माँग
- सुशासन पर बल देने के बावजूद भारत के प्रशासन का प्रक्रिया संचालित होने के बजाय व्यक्ति संचालित बने रहने का प्रभाव।
- भारत में प्रक्रिया-उन्मुख शासन में बाधा डालने वाली चुनौतियों की पहचान करना।
- सुशासन प्राप्त करने के लिए प्रक्रिया-उन्मुख शासन को संस्थागत बनाने हेतु आवश्यक प्रशासनिक सुधार।
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उत्तर
स्वतंत्रता के 75 वर्षों से भी अधिक समय बाद भारत का प्रशासन व्यक्तिगत अधिकार और अपारदर्शी विवेक की औपनिवेशिक विरासत को बरकरार रखे हुए है। राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (NeGP), केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली (CPGRAMS) व मिशन कर्मयोगी जैसे प्रयासों के बावजूद, गंभीर समस्याएँ जैसे नौकरशाही जड़ता और अधिकारी-केंद्रित निर्णय लेने की प्रक्रिया बनी हुई हैं।
व्यक्ति-संचालित प्रशासन का प्रभाव
- नागरिक सेवाओं की आसमान आपूर्ति: सेवाएँ समान नियमों के बजाय अधिकारियों की कार्यक्षमता पर निर्भर करती हैं, जिससे पक्षपात और असमानता उत्पन्न होती है।
- परियोजना कार्यान्वयन में विलंब: अधिकारियों के स्थानांतरण के दौरान परियोजनाएँ रुक जाती हैं, जो संस्थागत निरंतरता की कमी को दर्शाता है।
- भ्रष्टाचार और रेंट सीकिंग प्रवृत्ति: अस्पष्ट नियम अधिकारियों को विवेकाधिकार से कार्य करने का मौका दे देते हैं, जिसका दुरुपयोग किया जा सकता है।
- संस्थागत ज्ञान का अभाव: परियोजनाओं के दस्तावेजीकरण या संस्थागत स्मृति की कमी के कारण नए अधिकारियों को पहले किए गए कार्यों को दोबारा प्रारंभ से करना पड़ता है।
- ईमानदार अधिकारियों का मनोबल गिरना: जब आलसी और मेहनती अधिकारियों को समान दर्जा दिया जाता है, तो योग्यता का महत्त्व कम हो जाता है।
भारत में प्रक्रिया-उन्मुख शासन को बाधित करने वाली चुनौतियाँ
- औपनिवेशिक नौकरशाही विरासत: सेवा के लिए नहीं, बल्कि नियंत्रण के लिए बनाई गई व्यवस्था आज भी मानसिकता और प्रक्रियाओं को नियंत्रित करती है।
- उदाहरण: अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियमावली, 1968 आज भी नागरिकों के बजाय राज्य के प्रति औपनिवेशिक युग की निष्ठा को दर्शाते हैं।
- लालफीताशाही: सामान्य अनुमोदन भी अक्सर 8-10 पदानुक्रमिक डेस्कों के माध्यम से गुजरते हैं, जिससे लालफीताशाही को बढ़ावा मिलता है तथा भ्रष्टाचार के अवसर उत्पन्न होते हैं।
- अस्पष्ट एवं संदिग्ध नियम: अस्पष्ट नियम अधिकारियों को नीतियों की व्याख्या करने में व्यापक विवेकाधिकार प्रदान करते हैं।
- प्रौद्योगिकी अंगीकरण में कमी: डिजिटल प्रणालियों को अपनाने में देरी के कारण पारदर्शी, ट्रैक करने योग्य सेवा वितरण में बाधा आती है।
- त्रुटिपूर्ण वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन (A.P.R.): इसमें अधिकांश अधिकारियों को प्रायः ‘उत्कृष्ट’ बताया जाता है, जिससे असली योग्यता को मान्यता देने की प्रक्रिया प्रभावहीन हो जाती है।
इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए लक्षित सुधारों की आवश्यकता है, जो प्रशासनिक कार्यप्रणाली के मूल में पारदर्शिता और जवाबदेही को समाहित कर सकें।
प्रक्रिया-उन्मुख शासन को संस्थागत बनाने के लिए प्रशासनिक सुधार
- नियमों का सरलीकरण और संहिताकरण: सीमित विवेकाधिकार वाले सरलीकृत नियम विलंब और मनमाने निर्णयों की संभावना को कम करते हैं।
- उदाहरण: कर्नाटक का सकला सेवा अधिनियम (2011) नागरिकों को सेवाओं की गारंटी प्रदान करने के लिए अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOB) की समयबद्ध डिलीवरी को अनिवार्य बनाता है।
- व्यापक डिजिटलीकरण और ई-गवर्नेंस: एंड-टू-एंड डिजिटल वर्क फ्लो पारदर्शिता, तेज वितरण और कम मानवीय हस्तक्षेप सुनिश्चित करता है।
- सामान्यीकरण की बजाय विशेषज्ञता: अधिकारियों को असंबंधित विभागों में रोटेट करने के बजाय,
क्षेत्र विशेषज्ञता को प्रोत्साहित करना चाहिए।
- उदाहरण: मिशन कर्मयोगी का उद्देश्य दक्षता रूपरेखाओं के माध्यम से अधिकारियों के कौशल का विभागीय आवश्यकताओं के साथ मेल कराना है।
- संस्थागत स्मृति और रिकॉर्ड डिजिटलीकरण: सभी फाइलों और निर्णयों को संगृहीत करने से संस्थागत निरंतरता सुनिश्चित होती है।
- स्वतंत्र प्रदर्शन मूल्यांकन: निष्पक्षता सुनिश्चित करने और हित संघर्षों से बचने के लिए समीक्षा और मूल्यांकन हमेशा स्वतंत्र तृतीय पक्ष द्वारा ही किया जाना चाहिए।
भारत में सुशासन प्राप्त करने के लिए व्यक्तिगत निर्भरता से हटकर सशक्त संस्थागत ढाँचों की ओर एक बुनियादी बदलाव की आवश्यकता है। एक कुशल, पारदर्शी और भविष्य के लिए तैयार प्रशासन के निर्माण हेतु स्पष्ट नियम, डिजिटल प्रक्रियाएँ और प्रदर्शन-संचालित संस्कृति अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।