प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत के श्रम बाजार में संरचनात्मक बाधाओं की चर्चा कीजिए।
- इनके लिए उत्तरदायी कारकों का उल्लेख कीजिए।
- उत्पादकता-आधारित विकास हेतु नीतिगत उपाय सुझाइए।
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उत्तर
भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश केवल रोजगार सृजन पर नहीं, बल्कि उत्पादक, समावेशी और गुणवत्तापूर्ण रोजगार सुनिश्चित करने पर निर्भर करता है। यद्यपि PLFS 2025 श्रम संकेतकों में सुधार दर्शाता है, फिर भी NEET युवाओं तथा लैंगिक बहिष्करण जैसी संरचनात्मक चुनौतियाँ विकास को सीमित करती रहती हैं।
भारत के श्रम बाजार में संरचनात्मक बाधाएँ
- नीट युवा: युवाओं का एक बड़ा वर्ग रोजगार, शिक्षा या प्रशिक्षण किसी भी क्षेत्र से जुड़ा नहीं है, जिससे भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश की क्षमता कमजोर पड़ती है।
- लैंगिक अंतर: रोजगार संकेतकों में धीरे-धीरे सुधार के बावजूद महिला श्रमबल भागीदारी अब भी सीमित बनी हुई है।
- असंगठित रोजगार: बड़ी संख्या में श्रमिक कम उत्पादकता वाले असंगठित रोजगार में फँसे हुए हैं, जहाँ सामाजिक सुरक्षा और स्थिर आय का अभाव है।
- उदाहरण: शहरीकरण के बावजूद कृषि और असंगठित सेवा क्षेत्र अब भी बड़ी संख्या में श्रमिकों को रोजगार प्रदान कर रहे हैं।
- कौशल असंगति: शिक्षा स्तर में सुधार हुआ है, किंतु रोजगार-उन्मुख कौशलों की कमी के कारण शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी बनी हुई है।
- उदाहरण: राष्ट्रीय स्तर पर औसत स्कूली शिक्षा लगभग 10 वर्ष तक पहुँच चुकी है, फिर भी रोजगार-योग्यता सीमित बनी हुई है।
- कम गुणवत्ता वाला रोजगार: रोजगार वृद्धि का बड़ा हिस्सा नियमित वेतनभोगी नौकरियों के बजाय स्व-रोजगार अथवा असुरक्षित कार्यों में दिखाई देता है।
- उदाहरण: नियमित वेतनभोगी रोजगार लगभग 24% ही है, जबकि असंगठित कार्य अब भी प्रमुख बना हुआ है।
उत्तरदायी कारक
- कमजोर विनिर्माण क्षेत्र: श्रम-प्रधान विनिर्माण क्षेत्र का पर्याप्त विस्तार नहीं हो पाया है, जिससे प्रतिवर्ष श्रम बाजार में प्रवेश करने वाले लाखों युवाओं को समुचित रोजगार नहीं मिल पाता।
- उदाहरण: प्रतिवर्ष लगभग 70 लाख से 1 करोड़ युवा श्रम बाजार में प्रवेश करते हैं, किंतु औपचारिक क्षेत्र में रोजगार की गति धीमी बनी हुई है।
- सामाजिक मान्यताएँ: पितृसत्तात्मक प्रतिबंध, अवैतनिक देखभाल कार्य तथा सुरक्षा संबंधी चिंताएँ महिलाओं की श्रमबल भागीदारी को सीमित करती हैं।
- कमजोर कौशल विकास: प्रशिक्षण व्यवस्था उद्योगों की वास्तविक माँग से जुड़ी नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप शिक्षित किंतु रोजगार-अयोग्य युवा तैयार हो रहे हैं।
- ग्रामीण निर्भरता: कृषि पर अत्यधिक निर्भरता अर्द्ध-बेरोजगारी को छिपाती है और श्रम उत्पादकता को कम करती है।
- उदाहरण: कृषि के GDP में घटते योगदान के बावजूद बड़ी संख्या में श्रमिक कम आय वाली कृषि नौकरियों में लगे हुए हैं।
- सीमित औपचारिकीकरण: लघु और मध्यम उद्यमों को विस्तार में कठिनाइयाँ आती हैं, जिससे नियमित वेतनभोगी रोजगार और सामाजिक सुरक्षा का दायरा सीमित रहता है।
- उदाहरण: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम लाखों लोगों को रोजगार देते हैं, किंतु वे प्रायः औपचारिक श्रम सुरक्षा व्यवस्था से बाहर रहते हैं।
उत्पादकता-आधारित विकास हेतु नीतिगत उपाय
- विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन: वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों का विस्तार कर बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- उदाहरण: उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ विनिर्माण प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं।
- लैंगिक समावेशन: महिलाओं की श्रमबल भागीदारी बढ़ाने हेतु बाल-देखभाल सुविधाएँ, सुरक्षित परिवहन, लचीली कार्य व्यवस्था तथा कार्यस्थल समानता को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: मातृत्व लाभ अधिनियम तथा क्रेच संबंधी प्रावधान महिला श्रमिकों के रोजगार में बने रहने को समर्थन देते हैं।
- कौशल समन्वय: कौशल विकास कार्यक्रमों को स्थानीय उद्योगों की माँग और प्रशिक्षुता व्यवस्था से जोड़ा जाना चाहिए, ताकि शिक्षा से रोजगार तक संक्रमण सुगम हो सके।
- उदाहरण: प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) तथा राष्ट्रीय प्रशिक्षुता प्रोत्साहन योजना उद्योग-संबद्ध प्रशिक्षण को बढ़ावा देती हैं।
- औपचारीकरण को बढ़ावा: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को सुदृढ़ करने तथा अनुपालन प्रक्रियाओं को सरल बनाने से अधिक नियमित वेतनभोगी रोजगार सृजित किए जा सकते हैं।
- उदाहरण: उद्यम पंजीकरण और ई-श्रम पोर्टल औपचारीकरण तथा श्रमिक पहचान को समर्थन प्रदान करते हैं।
- शहरी रोजगार नीति: सेवा क्षेत्र, हरित रोजगार और डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के माध्यम से युवाओं के लिए शहरी रोजगार रणनीतियाँ विकसित की जानी चाहिए।
- उदाहरण: उचित सुरक्षा उपायों के साथ गिग अर्थव्यवस्था और डिजिटल सेवाएँ शिक्षित शहरी युवाओं को रोजगार प्रदान कर सकती हैं।
निष्कर्ष
भारत के श्रम बाजार की चुनौती केवल बेरोजगारी नहीं, बल्कि मानवीय क्षमता के अपर्याप्त उपयोग की भी है। जनसांख्यिकीय लाभांश को उत्पादकता-आधारित विकास में परिवर्तित करने के लिए गुणवत्तापूर्ण रोजगार, लैंगिक समावेशन तथा कौशल-आधारित औपचारिक रोजगार आवश्यक हैं, जो श्रमिकों को विकास के वास्तविक प्रेरक में बदल सकें।