प्रश्न की मुख्य माँग
- संरचनात्मक अवरोधों का उल्लेख कीजिए।
- व्यवहारगत अवरोधों की चर्चा कीजिए।
- ‘देखभाल अर्थव्यवस्था’ की संभावनाओं का वर्णन कीजिए।
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उत्तर
भारत का मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961, मातृत्व लाभ के रूप में 26 सप्ताह के सवेतन अवकाश का प्रावधान करता है। यह एक प्रगतिशील दृष्टिकोण को दर्शाता है। फिर भी, प्रसवोत्तर महिलाओं के करियर में ठहराव के रूप में ‘मातृत्व का दंड’ अब भी विद्यमान है, क्योंकि महिलाओं को प्रसव के बाद अपने करियर में रुकावटों का सामना करना पड़ता है। यह अंतर केवल कानूनी संरचना में ही नहीं, बल्कि कार्यस्थलों और समाज में अंतर्निहित संरचनात्मक कठोरताओं और व्यवहारिक पूर्वाग्रहों में निहित है।
संरचनात्मक अवरोध
- नियोक्ता पर केंद्रित व्यय भार : वेतन का पूरा दायित्व नियोक्ताओं पर होता है, जो प्रजनन आयु की महिलाओं को काम पर रखने के प्रति उन्हें हतोत्साहित करता है।
उदा: निजी कंपनियाँ अवकाश की लागत से बचने के लिए अनौपचारिक रूप से पुरुष उम्मीदवारों को प्राथमिकता देती हैं।
- असमान क्षेत्रीय संरक्षण: असंगठित एवं स्व-नियोजित महिलाएँ प्रभावी संरक्षण से वंचित रह जाती हैं।
उदा: घरेलू कामगारों को प्रायः सवेतन मातृत्व लाभ प्राप्त नहीं होता है।
- किफायती बाल-देखभाल का अभाव: क्रेच (शिशु गृह) संबंधी अनिवार्य नियमों का खराब कार्यान्वयन कार्य पर लौटने के लिए महिलाओं को मिलने वाले समर्थन को सीमित कर देता है।
उदा: छोटे संस्थान कागजों पर तो नियमों का पालन करते हैं, किंतु उनमें कार्यात्मक बाल देखभाल सुविधाओं का अभाव होता है।
- पदोन्नति में दंडात्मक प्रभाव: पदोन्नति और मूल्यांकन प्रणालियाँ निर्बाध सेवा को पुरस्कृत करती हैं।
उदा: महिलाएँ जब मातृत्व अवकाश के पश्चात् वापस लौटती हैं तो उन्हें नेतृत्व भूमिकाओं में विलंब या पुनर्नियोजन का सामना करना पड़ता है।
- अवकाश नीति में विषमता : सीमित पितृत्व अवकाश इस धारणा को पुष्ट करता है कि बाल-देखभाल का दायित्व केवल महिलाओं पर केंद्रित है।
उदा: निजी क्षेत्र में पितृत्व अवकाश के प्रावधान बहुत ही कम हैं।
व्यवहारगत अवरोध
- प्रतिबद्धता में कमी की धारणा: माताओं को कम विश्वसनीय कर्मचारी के रूप में देखा जाता है।
उदा: अवकाश से लौटने के पश्चात् उन्हें कम महत्त्वपूर्ण या कम जोखिम वाली परियोजनाएँ सौंपी जाती हैं।
- कार्यस्थल पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता: यह माना जाता है कि बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं की महत्वाकांक्षाएँ कम हो जाती है।
उदा: महिलाओं को मुख्य भूमिकाओं से हटाकर सहायक भूमिकाओं में स्थानांतरित कर दिया जाता है।
- प्राथमिक देखभाल की सांस्कृतिक अपेक्षाएँ: मातृत्व को महिलाओं का प्राथमिक एवं एकमात्र दायित्व माना जा है।
उदा: परिवार द्वारा महिलाओं को शीघ्र कार्य पर लौटने के लिए हतोत्साहित करना।
- सहज सामंजस्य का दबाव: काम और बच्चों की देखभाल के बीच बिना किसी चूक के संतुलन बनाने की अपेक्षा।
उदा: इसके कारण महिलाओं में मानसिक थकान और नौकरी छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ती है।
- भय-प्रेरित करियर विकल्प: करियर में ठहराव के डर से महिलाएँ मातृत्व में देरी करती हैं या मातृत्व को टालती हैं।
उदा: शहरी पेशेवर दंपतियों में माता-पिता न बनने के विकल्प को चुनने की प्रवृत्ति का बढ़ना ।
‘देखभाल अर्थव्यव्सथा’ की संभावनाएँ
- औपचारिक बाल-देखभाल कार्यबल का विकास: अर्द्धकुशल महिलाओं को प्रमाणित देखभालकर्ता के रूप में प्रशिक्षित कर संगठित क्षेत्र में सम्मिलित किया जा सकता है।
उदा: डे-केयर सेवाओं हेतु संरचित कौशल-विकास कार्यक्रम।
- महिलाओं के लिए रोजगार सृजन: देखभाल क्षेत्र रोजगार की तलाश कर रही लाखों महिलाओं को समाहित करने की क्षमता रखता है।
उदा: सामुदायिक आधारित बाल-देखभाल सहकारी समितियाँ।
- सुलभ एवं विश्वसनीय सहयोग तंत्र: गुणवत्तापूर्ण देखभाल सुविधाएँ माताओं के करियर अवरोध और मानसिक चिंता को कम करती हैं।
उदा: कार्यस्थल-समर्थित डे-केयर केंद्र।
- साझी सामाजिक उत्तरदायित्व मॉडल: देखभाल को केवल पारिवारिक दायित्व न मानकर संस्थागत रूप प्रदान करना।
उदा: सार्वजनिक–निजी भागीदारी के माध्यम से बाल-देखभाल व्यवस्थाएँ।
- गरिमापूर्ण एवं विनियमित देखभाल कार्य: देखभाल करने वालों को सशक्त बनाते हुए उनके शोषण को रोकना।
उदा: प्रमाणन, न्यूनतम मजदूरी और श्रम सुरक्षा।
निष्कर्ष
‘मातृत्व दंड’ की जड़ें संस्थागत संरचना और सामाजिक मानसिकता दोनों में निहित हैं। विधिक प्रावधान अधिकार सुनिश्चित करते हैं, परंतु संवेदनशील दृष्टिकोण, साझा देखभाल की संस्कृति तथा सुदृढ़ ‘देखभाल अर्थव्यवस्था’ में निवेश अनिवार्य है। जब कार्यस्थल और परिवार यह आत्मसात कर लेंगे कि महत्वाकांक्षा और मातृत्व परस्पर विरोधी नहीं हैं, यह एक साथ सह-अस्तित्व में रह सकते हैं, तभी वास्तविक और सार्थक लैंगिक समानता संभव हो सकेगी।
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