Q. ऐतिहासिक अन्यायों को दूर करने के उद्देश्य से FRA 2006 के विधायी उद्देश्य के बावजूद, न्यायिक निर्णयों में विरोधाभास और नौकरशाही की अनिच्छा वनवासियों को अलग-थलग करती जा रही है। हालिया उदाहरणों के साथ आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

May 6, 2026

GS Paper IIGovernance

प्रश्न की मुख्य माँग

  • न्यायिक टकराव और नौकरशाही की अनिच्छा किस प्रकार अब भी वनवासियों को अलग-थलग कर रही है।
  • वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 किस प्रकार अब भी वनवासियों की सुरक्षा और सशक्तीकरण करता है।
  • वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 की वास्तविक भावना को साकार करने के उपाय सुझाइए।

उत्तर

औपनिवेशिक काल के बहिष्करण को सुधारने के उद्देश्य से लागू किया गया वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act – FRA), 2006 वनवासियों को भूमि, आजीविका और सम्मान वापस दिलाने का प्रयास था। फिर भी न्यायिक विरोधाभासों और प्रशासनिक प्रतिरोध के कारण इसकी परिवर्तनकारी क्षमता लगातार कमजोर होती रही है।

न्यायिक टकराव और नौकरशाही की अनिच्छा किस प्रकार वनवासियों को अलग-थलग करती है

  • न्यायिक टकराव: विभिन्न न्यायालयों के परस्पर विरोधी निर्णय अनिश्चितता उत्पन्न करते हैं, जिससे वनवासियों की कानूनी सुरक्षा कमजोर होती है।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय का वर्ष 2019 का बेदखली आदेश, जिसमें अस्वीकृत FRA दावों वाले लोगों को हटाने की बात कही गई थी, स्थगन से पहले पूरे देश में भय का कारण बना।
  • बेदखली का खतरा: FRA में अधिकारों की मान्यता के बिना विस्थापन या बेदखली पर रोक होने के बावजूद, वनवासियों को हटाने की घटनाएँ जारी रहती हैं।
    • उदाहरण: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पीलीभीत के वन गुज्जरों की बेदखली पर रोक लगाई, क्योंकि उनके FRA दावे अभी लंबित थे (2026)।
  • प्रमाण का बोझ: अधिकारी अक्सर पुराने दस्तावेजी प्रमाण माँगते हैं, जो कई जनजातीय समुदायों के पास पारंपरिक रूप से उपलब्ध नहीं होते।
    • उदाहरण: जनजातीय कार्य मंत्रालय ने बताया कि अनुचित साक्ष्य आवश्यकताओं के कारण बड़ी संख्या में दावे खारिज किए गए।
  • वन विभाग का प्रतिरोध: वन विभाग कई बार सामुदायिक अधिकारों की बजाय संरक्षण नियंत्रण को प्राथमिकता देता है, जिससे ग्राम सभा की शक्तियों का विरोध होता है।
    • उदाहरण: तमिलनाडु के संरक्षित वनों में चराई प्रतिबंधों के कारण पारंपरिक अधिकारों को लेकर कानूनी विवाद उत्पन्न हुए।
  • दावों की अस्वीकृति:FRA के अंतर्गत बड़ी संख्या में दावों को उचित सत्यापन और अपील तंत्र के बिना ही  खारिज कर दिया जाता है।

वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 किस प्रकार अब भी वनवासियों की सुरक्षा और सशक्तीकरण करता है।

  • कानूनी संरक्षण: FRA व्यक्तिगत तथा सामुदायिक वन अधिकारों को वैधानिक मान्यता प्रदान करता है, जिससे लंबे ऐतिहासिक बहिष्करण को सुधारने का प्रयास किया गया है।
    • उदाहरण: लघु वन उपज और सामुदायिक वन संसाधनों पर अधिकार FRA की धारा 3 और 5 के अंतर्गत कानूनी रूप से संरक्षित हैं।
  • न्यायिक समर्थन: कई न्यायालयों ने पुनः स्पष्ट किया है कि FRA की प्रक्रिया पूर्ण होने से पहले बेदखली नहीं की जा सकती है।
    • उदाहरण: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि अधिकार दावों के निर्णय से पहले वनवासियों को हटाया नहीं जा सकता।
  • ग्राम सभा की भूमिका: यह अधिनियम दावों के सत्यापन और वन शासन में ग्राम सभा को केंद्रीय भूमिका देकर स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करता है।
    • उदाहरण: FRA से जुड़े सुरक्षा प्रावधानों के अंतर्गत वन भूमि के विचलन के लिए ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है।
  • सामुदायिक वन संसाधन (CFR) की सफलता: सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों ने अनेक क्षेत्रों में आजीविका और संरक्षण दोनों के बेहतर परिणाम दिए हैं।
    • उदाहरण: महाराष्ट्र के गढ़चिरौली के गाँवों ने CFR मान्यता के माध्यम से बाँस संसाधनों का सफल प्रबंधन किया।
  • नीतिगत समर्थन: केंद्र सरकार और जनजातीय कार्य मंत्रालय FRA के बेहतर क्रियान्वयन हेतु लगातार दिशा-निर्देश जारी करते रहे हैं।

वन अधिकार अधिनियम, 2006 की वास्तविक भावना को साकार करने के उपाय

  • एकरूप दिशा-निर्देश: FRA की विरोधाभासी न्यायिक और प्रशासनिक व्याख्याओं को रोकने के लिए स्पष्ट राष्ट्रीय दिशा-निर्देश आवश्यक हैं।
    • उदाहरण: जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA) राज्यों में दावों के सत्यापन और बेदखली संबंधी सुरक्षा उपायों का मानकीकरण कर सकता है।
  • दावों का त्वरित निपटान: लंबित दावों का समाधान पारदर्शी और समयबद्ध तंत्र के माध्यम से शीघ्र किया जाना चाहिए।
    • उदाहरण: वन गुज्जरों जैसे लंबित मामलों के समाधान हेतु विशेष समीक्षा समितियाँ गठित की जा सकती हैं।
  • ग्राम सभा की शक्ति: ग्राम सभाओं की वास्तविक निर्णयकारी शक्ति को नौकरशाही हस्तक्षेप से सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
    • उदाहरण: अनुसूचित क्षेत्रों में मजबूत स्थानीय शासन के लिए PESA और FRA का समन्वित रूप से कार्य करना आवश्यक है।
  • साक्ष्य में लचीलापन: मौखिक इतिहास, सामुदायिक गवाही और पारंपरिक प्रमाणों को अधिक व्यापक रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए।
  • अधिकार-आधारित संरक्षण: वन शासन में जैव विविधता संरक्षण और आजीविका न्याय के बीच संतुलन स्थापित किया जाना चाहिए, न कि समुदायों को अतिक्रमणकारी मानकर देखा जाए।

निष्कर्ष

वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 एक ऐतिहासिक न्यायपरक कानून बना हुआ है, लेकिन इसकी सफलता कागजी मान्यता से आगे बढ़कर वास्तविक जमीनी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। वास्तविक पर्यावरणीय और सामाजिक न्याय के लिए बेदखली-आधारित संरक्षण नहीं, बल्कि अधिकार-आधारित शासन व्यवस्था आवश्यक है।

Despite the legislative intent of FRA 2006 to undo historical injustices, conflicting judicial pronouncements and bureaucratic reluctance continue to alienate forest dwellers. Critically analyze with recent examples. in hindi

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