प्रश्न की मुख्य माँग
- अनुबंध प्रवर्तन (Contract Enforcement) और भूमि अधिग्रहण (Land Acquisition) से संबंधित संरचनात्मक बाधाओं का विश्लेषण कीजिए।
- इन बाधाओं का भारत के निवेश परिवेश पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा कीजिए।
- आगे की राह सुझाइए।
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उत्तर
परिचय
भारत ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (Ease of Doing Business) को बढ़ावा देने के लिए डिजिटलीकरण एवं नियामकीय सरलीकरण जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार किए हैं। तथापि, विवाद निपटान और भूमि प्रबंधन से जुड़ी संरचनात्मक अक्षमताएँ अभी भी एक वास्तविक निवेश-अनुकूल पारितंत्र के निर्माण में प्रमुख बाधा बनी हुई हैं।
अनुबंध प्रवर्तन एवं भूमि अधिग्रहण में संरचनात्मक बाधाएँ
- न्यायिक विलंब: लंबी न्यायिक प्रक्रियाएँ अनिश्चितता बढ़ाती हैं तथा व्यवसायों को औपचारिक अनुबंधों पर निर्भर रहने से हतोत्साहित करती हैं।
- उदाहरण: इंडिया जस्टिस रिपोर्ट, 2025 के अनुसार, भारतीय न्यायालयों में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं।
- वाणिज्यिक न्यायालयों की सीमित क्षमता: वाणिज्यिक न्यायालयों में अवसंरचना की कमी तथा न्यायाधीशों के रिक्त पद व्यावसायिक विवादों के शीघ्र निपटान में बाधा उत्पन्न करते हैं।
- उदाहरण: वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 के तहत स्थापित वाणिज्यिक न्यायालय अभी भी रिक्तियों एवं राज्यों के बीच क्षमता असमानताओं से जूझ रहे हैं।
- विखंडित भूमि अभिलेख: भूमि अभिलेखों का अधूरा डिजिटलीकरण तथा अस्पष्ट स्वामित्व अधिकार भूमि विवादों और अधिग्रहण संबंधी जोखिमों को बढ़ाते हैं।
- उदाहरण: नीति आयोग की मॉडल निर्णायक भूमि स्वामित्व (Conclusive Land Titling) रिपोर्ट, 2023 के अनुसार भारत अभी भी मुख्यतः अनुमानित स्वामित्व प्रणाली (Presumptive Titling System) का अनुसरण करता है, जिससे भूमि स्वामित्व विवाद बार-बार उत्पन्न होते हैं।
- भूमि अधिग्रहण में विलंब: बहुस्तरीय अनुमोदन, मुआवजा विवाद तथा जटिल प्रक्रियाएँ अवसंरचना एवं औद्योगिक परियोजनाओं की गति को धीमा कर देती हैं।
- संघीय विविधताएँ: राज्यों के बीच नियमों एवं प्रशासनिक क्षमता में अंतर एक असमान व्यावसायिक वातावरण उत्पन्न करता है, जिससे निवेशकों को अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
भारत के निवेश परिवेश पर प्रभाव
- निवेशकों के लिए अनिश्चितता: अनुबंधों के प्रवर्तन एवं भूमि उपलब्धता में विलंब निवेशकों के लिए पूर्वानुमेयता को कम करता है।
- उदाहरण: विश्व बैंक की डूइंग बिजनेस रिपोर्ट (Doing Business Report) 2020 के अनुसार, भारत में किसी अनुबंध को लागू कराने में औसतन लगभग 1,445 दिन लगते थे।
- लागत में वृद्धि: लंबे समय तक चलने वाले विवाद और परियोजनाओं में देरी परिचालन एवं अनुपालन लागत को बढ़ा देते हैं।
- प्रतिस्पर्धात्मकता में कमी: संरचनात्मक बाधाएँ भारत को अन्य निवेश गंतव्यों की तुलना में कम आकर्षक बनाती हैं।
- उदाहरण: वियतनाम ने त्वरित प्रशासनिक स्वीकृतियों एवं प्रभावी विवाद निपटान तंत्र के माध्यम से विनिर्माण निवेश को आकर्षित किया है।
- परियोजनाओं का ठहराव: भूमि संबंधी विवाद महत्त्वपूर्ण अवसंरचना एवं औद्योगिक परियोजनाओं के क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न करते हैं।
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में कमी: नियामकीय अनिश्चितता की धारणा दीर्घकालिक विदेशी निवेश प्रतिबद्धताओं को हतोत्साहित कर सकती है।
आगे की राह
- न्यायिक आधुनिकीकरण: वाणिज्यिक न्यायालयों की क्षमता बढ़ाने, डिजिटलीकरण को प्रोत्साहित करने तथा समयबद्ध नियुक्तियाँ सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
- वैकल्पिक विवाद निपटान का विस्तार: मुकदमेबाजी के बोझ को कम करने हेतु मध्यस्थता (Mediation) एवं आर्बिट्रेशन (Arbitration) को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- उदाहरण: मध्यस्थता अधिनियम, 2023 संस्थागत मध्यस्थता के लिए एक वैधानिक ढाँचा प्रदान करता है।
- निर्णायक भूमि स्वामित्व प्रणाली: भूमि स्वामित्व विवादों को कम करने के लिए गारंटीकृत भूमि स्वामित्व प्रणाली की ओर संक्रमण किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: स्वामित्व योजना के अंतर्गत ड्रोन सर्वेक्षण के माध्यम से संपत्ति कार्ड जारी किए गए हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि अभिलेखों की सटीकता में सुधार हुआ है।
- भूमि अधिग्रहण सुधार: उचित मुआवजा एवं पुनर्वास सुनिश्चित करते हुए भूमि अधिग्रहण प्रक्रियाओं को सरल और त्वरित बनाया जाना चाहिए।
- सहकारी संघवाद को बढ़ावा: प्रोत्साहनों एवं सुधार-आधारित रैंकिंग के माध्यम से राज्यों को सर्वोत्तम प्रथाएँ अपनाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: डीपीआईआईटी (DPIIT) का बिजनेस रिफॉर्म्स एक्शन प्लान (BRAP) निवेश परिवेश में सुधार हेतु प्रतिस्पर्द्धी संघवाद (Competitive Federalism) को बढ़ावा देता है।
निष्कर्ष
भारत के ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (Ease of Doing Business) संबंधी सुधारों ने महत्त्वपूर्ण प्रगति सुनिश्चित की है, किंतु दीर्घकालिक एवं सतत् सुधारों के लिए अनुबंध प्रवर्तन तथा भूमि शासन (Land Governance) से जुड़ी मूलभूत संरचनात्मक बाधाओं का समाधान आवश्यक है। संस्थागत क्षमता को सुदृढ़ बनाते हुए तथा पूर्वानुमेय, पारदर्शी और कुशल प्रक्रियाओं को सुनिश्चित करके ही भारत स्वयं को एक वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी निवेश गंतव्य के रूप में स्थापित करने की अपनी महत्त्वाकांक्षा को साकार कर सकता है।