Q. पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत कड़े कानूनी प्रावधानों और हालिया संशोधनों के बावजूद, सजा की दर बेहद कम बनी हुई है। भारत में बाल यौन शोषण के मामलों की कम रिपोर्टिंग में योगदान देने वाली प्रणालीगत, सामाजिक और ढाँचागत बाधाओं का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

June 15, 2026

GS Paper IIGovernance

प्रश्न की मुख्य माँग

  • बाल यौन शोषण की रिपोर्टिंग में प्रणालीगत बाधाएँ। 
  • बाल यौन शोषण की रिपोर्टिंग में सामाजिक बाधाएँ।
  • बाल यौन शोषण की रिपोर्टिंग में अवसंरचनात्मक बाधाएँ। 

उत्तर

परिचय

पॉक्सो (POCSO) अधिनियम, 2012 तथा इसके पश्चात् किए गए संशोधनों के कठोर प्रावधानों के बावजूद, बाल यौन शोषण (Child Sexual Abuse) के अधिकांश मामले अब भी रिपोर्ट नहीं किए जाते हैं। यह स्थिति भारत की बाल संरक्षण व्यवस्था तथा न्याय वितरण प्रणाली की प्रभावशीलता को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न करती है।

प्रणालीगत बाधाएँ

  • पुलिस के प्रति अविश्वास: परिवारों को कानून-प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा असंवेदनशील व्यवहार, अविश्वास या उत्पीड़न का भय रहता है, जिससे वे शिकायत दर्ज कराने से हतोत्साहित होते हैं।
  • न्याय में विलंब: लंबी जाँच प्रक्रिया और मुकदमों में देरी शिकायतों को आगे बढ़ाने के प्रति विश्वास को कम करती है।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की “क्राइम इन इंडिया 2024” रिपोर्ट के अनुसार, बड़ी संख्या में पॉक्सो मामले विचाराधीन रहे।
  • परिचित आरोपी पक्षपात: जब आरोपी बच्चे का परिचित होता है, तो प्राधिकरण अक्सर संकोच करते हैं, जिससे शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
    • उदाहरण: NCRB, 2024 के अनुसार, 95% से अधिक पॉक्सो मामलों में आरोपी पीड़ित का परिचित था।
  • कमजोर जांच प्रक्रिया: साक्ष्य संग्रह में कमी और कमजोर जाँच प्रक्रिया पीड़ितों को न्यायिक तंत्र से दूर कर सकती है।
    • उदाहरण: शिक्षा, महिला, बाल, युवा एवं खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति (2021) ने पॉक्सो मामलों की जाँच में कमियों को रेखांकित किया था।
  • संस्थागत विखंडन: पुलिस, बाल कल्याण समितियों (CWCs), अभियोजकों और सहायता सेवाओं के बीच कमजोर समन्वय प्रक्रियात्मक बाधाएँ उत्पन्न करता है।
    • उदाहरण: अलख आलोक श्रीवास्तव बनाम भारत संघ (2018)  मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्यों को विशेष न्यायालयों, CWCs और सहायता कर्मियों के बीच समन्वित तंत्र स्थापित करने का निर्देश दिया था।

सामाजिक बाधाएँ

  • पारिवारिक सम्मान:  सामाजिक बदनामी की आशंका मामलों के प्रकटीकरण में बाधा बनती है।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने अवलोकन किया है कि सामाजिक अपमान की चिंता रिपोर्टिंग को बाधित करती है।
  • पीड़ित कलंक: बच्चे साथियों और समुदाय द्वारा दोषारोपण, शर्मिंदगी या सामाजिक बहिष्कार के भय से शिकायत दर्ज कराने से बचते हैं।
    • उदाहरण: बाल संरक्षण पर यूनिसेफ इंडिया एवं महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MWCD) के संयुक्त अध्ययन ने कलंक (Stigma) को दुर्व्यवहार की रिपोर्टिंग में एक प्रमुख बाधा बताया है।
  • पितृसत्तात्मक मान्यताएँ: लैंगिक रूढ़िवादिता, विशेषकर लड़कियों को, अपनी बात रखने से हतोत्साहित करती है।
    • उदाहरण: NFHS-5 (2019–21) ने लैंगिक हिंसा के संबंध में मौन को सामान्य मानने वाली सामाजिक प्रवृत्तियों की निरंतरता को दर्शाया है।
  • निर्भरता का भय: अपराधी पर आर्थिक या भावनात्मक निर्भरता शिकायत दर्ज कराने में बाधा बनती है।
  • जागरूकता का अभाव: बच्चों और अभिभावकों में अक्सर दुर्व्यवहार तथा शिकायत तंत्रों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं होती।
    • उदाहरण: रिपोर्टिंग के उपलब्ध माध्यमों के प्रति सीमित जागरूकता को दूर करने के लिए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने “पॉक्सो ई-बॉक्स” (POCSO e-Box) पहल शुरू की थी।

ढाँचागत बाधाएँ

  • सहायता तंत्र की कमी: परामर्शदाताओं और सहायता कर्मियों तक अपर्याप्त पहुँच मामलों के प्रकटीकरण को हतोत्साहित करती है।
  • न्यायालयों की कमी: विशेष पॉक्सो न्यायालयों की सीमित उपलब्धता के कारण मामलों में देरी होती है और पीड़ितों की मानसिक थकान बढ़ती है।
    • उदाहरण: समर्पित न्यायालयों की कमी को दूर करने के लिए न्याय विभाग ने फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स (Fast Track Special Courts) योजना शुरू की।
  • फोरेंसिक कमियाँ: अपर्याप्त फोरेंसिक अवसंरचना साक्ष्यों के संरक्षण और रिपोर्टिंग के प्रति विश्वास को कमजोर करती है।
  • प्रशिक्षण की कमी: अनेक अग्रिम पंक्ति के कर्मियों में बाल-संवेदनशील मामलों को सँभालने का पर्याप्त कौशल नहीं होता है।
    • उदाहरण: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MWCD) के पॉक्सो कार्यान्वयन दिशा-निर्देश पुलिस, अभियोजकों और चिकित्सा अधिकारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण का प्रावधान करते हैं।
  • दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँच की समस्या: दूरस्थ क्षेत्रों में बाल संरक्षण सेवाओं और शिकायत दर्ज कराने की सुविधाओं की उपलब्धता सीमित है।
    • उदाहरण: मिशन वात्सल्य के अंतर्गत एकीकृत बाल संरक्षण योजना (Integrated Child Protection Scheme) जिला एवं ब्लॉक स्तर पर बाल संरक्षण अवसंरचना के विस्तार का प्रयास करती है।

निष्कर्ष

पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के उद्देश्यों की प्रभावी प्राप्ति हेतु संस्थागत विश्वास को सुदृढ़ करना, सामाजिक कलंक एवं मौन की संस्कृति को समाप्त करना तथा समन्वित प्रयासों के माध्यम से बाल-अनुकूल अवसंरचना और सहायता तंत्र का विकास करना आवश्यक है। इससे प्रत्येक बच्चे के लिए भयमुक्त वातावरण में दुर्व्यवहार की रिपोर्टिंग तथा त्वरित एवं न्यायसंगत न्याय तक पहुँच सुनिश्चित की जा सकेगी।

Despite stringent legal provisions under the POCSO Act and recent amendments, the conviction rates remain abysmally low. Analyze the systemic, social, and infrastructural bottlenecks contributing to the under-reporting of child sexual abuse cases in India. in hindi

Explore UPSC Foundation Course

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Aiming for UPSC?

Download Our App

      
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.