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Q. पुरुषों और महिलाओं के लिए कानूनी विवाह की उम्र में अंतर विवाह कानूनों में असमान कानूनी स्थिति उत्पन्न करता है। विश्लेषण कीजिए कि यह संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कैसे करता है और इस असमानता को दूर करने के लिए नीतिगत उपाय सुझाएँ। (15 अंक, 250 शब्द)

January 29, 2025

GS Paper II

प्रश्न की मुख्य माँग

  • चर्चा कीजिए कि किस प्रकार पुरुषों और महिलाओं के लिए विवाह की कानूनी आयु में अंतर, विवाह कानूनों में असमान कानूनी स्थिति उत्पन्न करता है।
  • विश्लेषण कीजिए कि यह संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का किस प्रकार उल्लंघन करता है।
  • इस असमानता को दूर करने के लिए नीतिगत उपाय सुझाइये।

उत्तर

भारत में पुरुषों (21 वर्ष) और महिलाओं (18 वर्ष) के लिए विवाह की कानूनी आयु में अंतर, वित्तीय जिम्मेदारी और परिपक्वता के संबंध में लैंगिक धारणाओं को दर्शाता है। यह असमानता विवाह कानूनों में समानता, स्वायत्तता और कानूनी स्थिति के संबंध में चिंताएँ उत्पन्न करती है। संजय चौधरी बनाम गुड्डन (2024) जैसे हालिया मामले मौलिक अधिकारों पर इसके प्रभाव का परीक्षण करने और नीतिगत सुधारों का प्रस्ताव करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हैं।

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विवाह कानूनों में असमान कानूनी स्थिति

  • लैंगिक भेदभाव: विवाह योग्य कानूनी रूप से मान्य आयु का अंतर (महिलाओं के लिए 18, पुरुषों के लिए 21) एक भेदभावपूर्ण ढाँचा बनाता है जहाँ महिलाओं को वैवाहिक निर्णय लेने में कम सक्षम माना जाता है। 
    • उदाहरण के लिए: PCMA, 2006 के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु में विवाहित लड़कियों को बाल वधू माना जाता है, जबकि 21 वर्ष से कम आयु के लड़कों को बाल वर माना जाता है, जिससे महिलाओं को आश्रित मानने की पितृसत्तात्मक रूढ़िवादिता को बल मिलता है।
  • कानूनी उपायों तक असमान पहुँच: महिलाओं के पास बाल विवाह को रद्द करने के लिए केवल 20 वर्ष की आयु तक का समय होता है, जबकि पुरुष 23 वर्ष की आयु तक न्यायालय जा सकते हैं, जिससे वैवाहिक अधिकारों में कानूनी विषमता उत्पन्न होती है।
    • उदाहरण के लिए: संजय चौधरी बनाम गुड्डन (2024) वाद में  इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सवाल किया कि पुरुषों को विवाह को रद्द करने के लिए तीन अतिरिक्त वर्ष क्यों दिए जाने चाहिए जबकि महिलाओं को नहीं।
  • कानून में विरोधाभास: वर्ष 1875 का बहुमत अधिनियम 18 वर्ष की आयु में पुरुषों और महिलाओं दोनों को कानूनी रूप से वयस्क मानता है फिर भी विवाह कानून, लिंग के आधार पर वयस्कता के अलग-अलग मानक लागू करते हैं
    • उदाहरण के लिए: एक महिला 18 वर्ष की आयु में वोट दे सकती है, अनुबंध कर सकती है या संपत्ति की मालकिन बन सकती है, परंतु अपनी पसंद के किसी पुरुष से शादी नहीं कर सकती है, अगर वह भी 18 वर्ष का है।
  • महिलाओं की स्वायत्तता पर प्रभाव: समाज में यह माना जाता है कि पुरुषों को विवाह देर से करना चाहिए अर्थात तब जब वह आर्थिक रूप से सशक्त हों परंतु महिलाओं का विवाह कम उम्र में ही कर देना चाहिए   जिससे उनकी स्वतंत्रता कम हो जाती है। 
    • उदाहरण के लिए: कई परिवार महिलाओं को 18 वर्ष की उम्र में ही जल्दी शादी करने के लिए मजबूर करते हैं, इस डर से कि 20 वर्ष से अधिक की उम्र में शादी करने पर बाधाओं का सामना करना पड़ेगा
  • बाल विवाह से सुरक्षा में असंगति: यदि पुरुष और महिला दोनों 18 वर्ष की आयु में वयस्कता प्राप्त करते हैं, तो पुरुषों के लिए विवाह की उच्च आयु अप्रत्यक्ष रूप से 18 वर्षीय महिलाओं और अधिक उम्र के पुरुषों के बीच विवाह को वैध बनाती है, जिससे शक्ति असंतुलन को बल मिलता है। 
    • उदाहरण के लिए: मद्रास उच्च न्यायालय ने टी. शिवकुमार बनाम पुलिस निरीक्षक वाद (2011) में कहा कि बाल विवाह कानूनों को 21 वर्ष से पहले विवाह करने वाले पुरुषों को अनुचित रूप से नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए।

संविधान में मौलिक अधिकारों का उल्लंघन

  • अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन: पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग विवाह योग्य कानूनी आयु, एक अनुचित वर्गीकरण बनाती है, जो अनुच्छेद 14 के तहत लैंगिक समानता का उल्लंघन करती है। 
    • उदाहरण के लिए: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पाया कि PCMA का भेदभाव पितृसत्तात्मक मानदंडों पर आधारित है।
  • अनुच्छेद 15 (लैंगिक भेदभाव न करना) का उल्लंघन: विवाह रद्द करने की समयसीमा और विवाह की आयु में पुरुषों का पक्ष लेने वाले कानून राज्य द्वारा स्वीकृत लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देते हैं, जो अनुच्छेद 15 (1) का उल्लंघन करते हैं। 
    • उदाहरण के लिए: इंडिपेंडेंट थॉट बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2017) में उच्चतम न्यायलय ने माना कि कानूनी सुरक्षा में लैंगिक अंतर महिलाओं के अधिकारों को नुकसान पहुंचा सकता है
  • अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन: विवाह रद्द करने पर कानूनी बाधाओं के कारण महिलाओं को पहले विवाह करने के लिए मजबूर करना व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करता है, जो अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। 
    • उदाहरण के लिए: महिलाओं के लिए PCMA की 20 वर्ष से पहले विवाह रद्द करने की समय सीमा, उन्हें अवांछित वैवाहिक बंधन में रहने के लिए मजबूर करती है जिससे उनकी स्वायत्तता सीमित हो जाती है।
  • निजता के अधिकार का उल्लंघन (पुट्टास्वामी निर्णय, 2017): सुप्रीम कोर्ट ने विवाह को एक व्यक्तिगत निर्णय माना है, और यह भी माना है कि पुरुषों व महिलाओं के लिए अलग-अलग आयु निर्धारित करने में राज्य का हस्तक्षेप निजता के अधिकार का उल्लंघन है। 
    • उदाहरण के लिए: शफीन जहान बनाम अशोकन केएम (2018) वाद में, न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि विवाह एक व्यक्तिगत निर्णय होता है और इसे राज्य द्वारा आयु अंतराल संबंधी नियम लगाने से नहीं तय किया जा सकता है ।
  • गरिमा और निर्णयात्मक स्वायत्तता के अधिकार का उल्लंघन: लैंगिक विवाह कानून, महिलाओं को पुरुषों की तुलना में पहले परिपक्व मानते हैं, जिससे उन्हें समान निर्णयात्मक स्वायत्तता से वंचित किया जाता है और अनुच्छेद 21 के तहत उनकी गरिमा का उल्लंघन होता है । 
    • उदाहरण के लिए: एनफोल्ड प्रोएक्टिव हेल्थ ट्रस्ट द्वारा वर्ष 2024 में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 49.4% बाल विवाह स्व-प्रेरित थे फिर भी कानून अक्सर स्वायत्तता की रक्षा करने के बजाय ऐसे विकल्पों को अपराधी बना देते हैं

इस असमानता को दूर करने के लिए नीतिगत उपाय

  • सभी लिंगों के लिए समान विवाह आयु: विवाह योग्य आयु में समानता लाने से लैंगिक  भेदभाव दूर होगा। 
    • उदाहरण के लिए: जया जेटली टास्क फोर्स ने महिलाओं के लिए न्यूनतम विवाह आयु बढ़ाकर 21 वर्ष करने की सिफारिश की, जिसमें शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार पर बल दिया गया, ताकि विवाह में देरी के लिए बेहतर समाधान हो सकें।
  • विवाह रद्द करने के लिए समान समय सीमा: बाल विवाह को रद्द करने के लिए पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान समय सीमा (आयु-सीमा) होनी चाहिए, ताकि कानूनी उपायों तक उचित पहुंच सुनिश्चित हो सके।
  • लैंगिक-तटस्थ विवाह कानून: PCMA, 2006 में संशोधन करके यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बाल विवाह निरस्तीकरण और दंड के मामले में पुरुषों और महिलाओं दोनों के साथ समान व्यवहार किया जाए, और अनावश्यक भेदभाव को हटाया जाए। 
    • उदाहरण के लिए: इंडिपेंडेंट थॉट बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2017) वाद में दिखाया गया कि कैसे लिंग आधारित विवाह, कानून अक्सर महिलाओं के अधिकारों की पर्याप्त रूप से रक्षा करने में विफल रहते हैं।
  • जागरूकता पर ध्यान देना: विवाह की आयु बढ़ाने के बजाय, नीतियों को युवा महिलाओं के लिए बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और वित्तीय स्वतंत्रता सुनिश्चित करनी चाहिए।
    • उदाहरण के लिए: जया जेटली टास्क फोर्स ने कानूनी प्रतिबंध लगाने के बजाय महिलाओं के लिए स्वाभाविक रूप से विवाह में देरी करने के लिए शिक्षा और रोजगार के अवसरों में सुधार का प्रस्ताव दिया।
  • न्यायिक समीक्षा और कानून सुधार: उच्चतम न्यायालय को यह स्पष्ट करना चाहिए कि लिंग आधारित विवाह कानून, संविधान का उल्लंघन करते हैं, और संसद को PCMA, 2006 में  भेदभावपूर्ण प्रावधानों में सुधार करना चाहिए।
    • उदाहरण के लिए: न्यायमूर्ति वर्मा समिति (2013) ने सिफारिश की थी कि विवाह कानूनों को पारंपरिक लिंग भूमिकाओं को मजबूत करने के बजाय समान अधिकार सुनिश्चित करना चाहिए।

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कानूनी विवाह आयु असमानता को संबोधित करने के लिए लैंगिक समानता स्थापित करने हेतु कानूनों में संशोधन की आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि विवाह में पुरुषों और महिलाओं दोनों को समान अधिकार प्राप्त हों। नीति सुधारों में विवाह के लिए एक समान कानूनी आयु,बाल विवाह के खिलाफ सुरक्षा सुनिश्चित करने और शिक्षा व जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से सशक्तिकरण को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।

The difference in legal marriage age for men and women creates an unequal legal standing in marriage laws. Analyze how this violates the fundamental rights provided in the Constitution and suggest policy measures to address this disparity. in hindi

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