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Q. शहरी झीलों का विलुप्त होना केवल एक पारिस्थितिक संकट ही नहीं, बल्कि एंथ्रोपोसीन युग में पर्यावरणीय शासन की एक गहरी विफलता है। 'लोक न्यास सिद्धांत' (Public Trust Doctrine) पर सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय के आलोक में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

May 2, 2026

GS Paper IIIEnvironment & Ecology

प्रश्न की मुख्य माँग

  • पारिस्थितिकी संकट के रूप में शहरी झीलें 
  • एंथ्रोपोसीन (Anthropocene) युग में पर्यावरणीय शासन की विफलता के रूप में शहरी झीलों का विलुप्त होना। 
  • सर्वोच्च न्यायालय का सार्वजनिक न्यास सिद्धांत (Public Trust Doctrine) निर्णय और राज्य की जिम्मेदारी का पुनर्निर्धारण 

उत्तर

प्रस्तावना

संपूर्ण भारत में शहरी झीलें विलुप्त हो रही हैं, जिससे ये पारिस्थितिकी संपत्तियाँ, रियल एस्टेट क्षेत्रों में परिवर्तित हो रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय ने इस बात की पुष्टि की है कि झीलें, यहाँ तक कि कृत्रिम झीलें भी, ‘सार्वजनिक न्यास’ हैं।

पारिस्थितिकी संकट के रूप में शहरी झीलें

  • जैव विविधता की हानि: शहरी झीलें, आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र का आधार होती हैं; उनका विलुप्त होना स्थानीय जैव विविधता और पारिस्थितिकी संतुलन को नष्ट कर देता है।
    • उदाहरण: बंगलूरू में लगभग 79% जल निकाय लगभग विलुप्त हो चुके है, जिससे आर्द्रभूमियों में स्थित पक्षियों के आवास गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं (कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड)।
  • भूजल स्तर में गिरावट: झीलें भूजल का पुनर्भरण करती हैं और स्थानीय जल स्तर को बनाए रखती हैं; इनकी कमी से शहरी जल संकट और टैंकरों पर निर्भरता बढ़ जाती है।
    • उदाहरण: हैदराबाद में झीलों के सिमटने से भूजल संकट बढ़ा है, जिसका उल्लेख CGWB के शहरी जल आकलन में किया गया है।
  • तापमान नियंत्रक: जल निकाय शीतलन प्रभाव के माध्यम से शहर की गर्मी को कम करते हैं; झीलों के विलुप्त होने से ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव और स्थानीय तापमान में वृद्धि तीव्र हो जाती है।
    • उदाहरण: CPCB द्वारा शहरी जलवायु अध्ययनों में दिल्ली की आर्द्रभूमि की हानि को बढ़ते स्थानीय ‘हीट स्ट्रेस’ से जोड़ा गया है।
  • सार्वजनिक साझा संसाधनों (Public Commons) की हानि: झीलें एक सामूहिक सार्वजनिक संसाधन हैं, जो स्थानीय समुदायों की आजीविका और सांस्कृतिक गतिविधियों के आधार के रूप में कार्य करती हैं। इनका व्यावसायीकरण या निजीकरण आम नागरिकों को उनके नैसर्गिक अधिकारों से वंचित कर देता है।
    • उदाहरण: नागपुर की फुटाला झील, वाणिज्यिक शोषण को लेकर मुकदमेबाजी का विषय बनी, जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा।

एंथ्रोपोसीन (Anthropocene) में पर्यावरणीय शासन की विफलता के रूप में शहरी झीलों का विलुप्त होना

  • अतिक्रमण रोकने में विफलता: आर्द्रभूमि और जल निकायों के लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा के बावजूद, अधिकारियों ने झील क्षेत्रों पर अवैध निर्माण और भूमि परिवर्तन की अनुमति दी।
    • उदाहरण: एनजीटी (NGT) के बार-बार हस्तक्षेप के बावजूद, बंगलूरू की बेल्लंदूर झील में बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हुआ।
  • खंडित नियंत्रण : कई एजेंसियाँ बिना किसी समन्वय के झीलों का प्रबंधन करती हैं, जिससे जवाबदेही कमजोर होती है और संरक्षण प्रयासों की प्रभावशीलता समाप्त हो जाती है।
  • कॉस्मेटिक अर्बनिज्म (Cosmetic Urbanism): सरकारें पारिस्थितिकी बहाली के बजाय सौंदर्यीकरण परियोजनाओं को प्राथमिकता देती हैं, जिससे झीलों को पारिस्थितिकी तंत्र के बजाय केवल पर्यटन संपत्ति के रूप में देखा जाता है।
  • कमजोर प्रवर्तन: आर्द्रभूमि नियमों और पर्यावरणीय मानदंडों का प्रभावी ढंग से पालन नहीं हो पाता है, जिसका मुख्य कारण कमजोर निगरानी और स्थानीय प्रशासनिक लापरवाही है।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय आर्द्रभूमि सूची (National Wetland Inventory) दर्शाती है कि ‘आर्द्रभूमि नियम, 2017’ के बावजूद कई शहरी आर्द्रभूमियाँ अभी भी प्रभावी संरक्षण से बाहर हैं।

सर्वोच्च न्यायालय का “सार्वजनिक न्यास सिद्धांत (Public Trust Doctrine)” निर्णय और राज्य की जिम्मेदारी का पुनर्निर्धारण

  • न्यासी की भूमिका (Trustee Role): न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य, झीलों का एक न्यासी (Trustee) है और उसे सार्वजनिक लाभ के लिए इनकी सुरक्षा करनी चाहिए।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय ने फुटाला झील मामले में व्यावसायीकरण के विरुद्ध सार्वजनिक न्यास सिद्धांत (Public Trust Doctrine) को लागू किया।
  • कृत्रिम झीलों का शामिल होना: सार्वजनिक न्यास सिद्धांत (PTD) अब मानव निर्मित झीलों को भी शामिल करता है, जिससे केवल प्राकृतिक संसाधनों से आगे बढ़कर संरक्षण का दायरा विस्तृत और सुदृढ़ हुआ है।
  • निजीकरण पर रोक: सार्वजनिक जल निकायों को निजी लाभ के लिए तब तक स्थानांतरित नहीं किया जा सकता, जब तक कि वह पर्यावरण के लिए हानिकारक हो या समुदाय की उस तक पहुँच को बाधित करता हो।
  • संवैधानिक कर्तव्य: इस न्यायिक निर्णय ने झीलों के संरक्षण को अनुच्छेद-21, अनुच्छेद-48A और अनुच्छेद-51A(g) से जोड़कर इसे एक संवैधानिक दायित्व बना दिया है।
    • उदाहरण: न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की है कि पर्यावरण संरक्षण ‘जीवन के अधिकार’ (Right to Life) के विधिशास्त्र (jurisprudence) का ही एक हिस्सा है।
  • पारिस्थितिकी प्राथमिकता: इस निर्णय ने ध्यान ‘स्वामित्व और सौंदर्यीकरण’ से हटाकर झीलों के पारिस्थितिकी संरक्षण और उनके सतत् सार्वजनिक उपयोग पर केंद्रित कर दिया है।
    • उदाहरण: इस निर्णय में शहरी झीलों के व्यावसायिक पुनर्विकास के बजाय उनके पुनरुद्धार पर अधिक बल दिया गया है।

निष्कर्ष

शहरी झीलों का विलुप्त होना न केवल पारिस्थितिकी हानि को दर्शाता है, बल्कि यह सार्वजनिक न्यास के उत्तरदायित्वों के प्रति प्रशासनिक उपेक्षा का भी परिचायक है। शहरी झीलों के संरक्षण के लिए न्यायिक हस्तक्षेप से आगे बढ़कर एकीकृत जलग्रहण योजना (Integrated Watershed Planning), सुदृढ़ स्थानीय जवाबदेही और नागरिक-आधारित निगरानी की आवश्यकता है। यह सतत् विकास लक्ष्य 6 (स्वच्छ जल), लक्ष्य 11 (सतत् शहर) और लक्ष्य 13 (जलवायु कार्रवाई) को आगे बढ़ाते हुए पारिस्थितिकी सुरक्षा और अंतर-पीढ़ीगत न्याय सुनिश्चित करता है।

The disappearance of urban lakes is not merely an ecological crisis, but a profound failure of environmental governance in the Anthropocene epoch. Critically analyse this statement in light of the Supreme Court’s recent judgment on the Public Trust Doctrine. in hindi

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