प्रश्न की मुख्य माँग
- संवैधानिक प्रावधान एवं सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की चर्चा कीजिए।
- पक्षपात एवं संवैधानिक चिंताओं से संबंधित मुद्दे को समझाइए।
- विवेकाधिकार के निष्पक्ष प्रयोग हेतु सुरक्षा उपाय सुझाइए।
|
उत्तर
त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में राज्यपाल की भूमिका संवैधानिक रूप से केवल स्थिर सरकार के गठन सुनिश्चित करने तक सीमित होती है, न कि राजनीतिक चयन करने तक। न्यायालयों ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि विवेकाधिकार का प्रयोग संवैधानिक नैतिकता, निष्पक्षता एवं फ्लोर टेस्ट आधारित वैधता के अनुरूप होना चाहिए।
संवैधानिक आधार एवं सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय
- सहायता एवं सलाह का सिद्धांत: अनुच्छेद-163 के अंतर्गत राज्यपाल सीमित विवेकाधीन क्षेत्रों को छोड़कर मंत्रिपरिषद की सहायता एवं सलाह पर कार्य करता है; उसका विवेकाधिकार पूर्ण या व्यक्तिगत नहीं है।
- उदाहरण: शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल केवल एक संवैधानिक प्रमुख है।
- मुख्यमंत्री की नियुक्ति: अनुच्छेद-164 राज्यपाल को मुख्यमंत्री नियुक्त करने का अधिकार देता है, परंतु संवैधानिक परंपरा के अनुसार, उसी व्यक्ति को आमंत्रित किया जाना चाहिए, जिसके पास बहुमत समर्थन प्राप्त करने की सर्वाधिक संभावना हो।
- उदाहरण: सरकारिया आयोग ने पूर्व-निर्वाचन गठबंधन अथवा समर्थन प्राप्त सबसे बड़े दल को आमंत्रित करने की सिफारिश की थी।
- फ्लोर टेस्ट का सिद्धांत: बहुमत की परीक्षा केवल विधानसभा के पटल पर ही होनी चाहिए, न कि राजभवन की संतुष्टि या निजी सत्यापन के आधार पर।
- उदाहरण: एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फ्लोर टेस्ट को संवैधानिक मानक घोषित किया।
- तत्काल बहुमत परीक्षण: राज्यपाल शीघ्र फ्लोर टेस्ट कराने की अपेक्षा कर सकता है, लेकिन शपथ ग्रहण में अनिश्चितकालीन देरी या पूर्व में मनमानी शर्तें नहीं लगा सकता है।
- उदाहरण: जगदंबिका पाल वाद में न्यायालय ने 48 घंटे के भीतर फ्लोर टेस्ट कराने का निर्देश दिया था।
- न्यायिक समीक्षा की सीमा: संवैधानिक मानदंडों एवं लोकतांत्रिक जनादेश का उल्लंघन करने वाले दुर्भावनापूर्ण या मनमाने राज्यपालीय कार्यों की न्यायालय समीक्षा कर सकता है।
- उदाहरण: रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ मामले में बिहार विधानसभा के विघटन को निरस्त कर दिया गया था।
पक्षपात संबंधी चिंताएँ
- चयनात्मक आमंत्रण: कई बार राज्यपाल सबसे बड़े दल को आमंत्रित करने के बजाय राजनीतिक रूप से अनुकूल दलों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे पक्षपात की आशंका उत्पन्न होती है।
- मनमानी शर्तें: संवैधानिक परंपराओं से परे समर्थन-पत्रों की माँग सरकार के गठन में अनियमितताओं एवं अनावश्यक विलंब की संभावना बढ़ाती है।
- उदाहरण: तमिलनाडु चुनाव 2026 में राज्यपाल ने शपथ ग्रहण से पूर्व सबसे अधिक मत प्राप्त दल से 118 विधायकों के हस्ताक्षरयुक्त समर्थन-पत्र माँगे।
- विलंब की रणनीति: शपथ ग्रहण में अनावश्यक देरी से दल-बदल, खरीद-फरोख्त एवं राजनीतिक सौदेबाजी के लिए अवसर उत्पन्न होते हैं।
- उदाहरण: महाराष्ट्र सरकार के गठन मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे विलंब की आलोचना की थी।
- केंद्र का प्रभाव: चूँकि राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र द्वारा की जाती है, इसलिए विपक्ष-शासित राज्य अक्सर पक्षपातपूर्ण हस्तक्षेप एवं संघीय असंतुलन का आरोप लगाते हैं।
- उदाहरण: पुंछी आयोग ने राज्यपाल पद के दुरुपयोग के कारण केंद्र–राज्य तनाव की बार-बार उत्पन्न होने वाली स्थितियों का उल्लेख किया था।
- संघवाद का क्षरण: पक्षपातपूर्ण आचरण सहकारी संघवाद को कमजोर करता है, क्योंकि इससे राजभवन एक संवैधानिक संस्था के बजाय राजनीतिक संस्था के रूप में परिवर्तित होता दिखाई देता है।
निष्पक्षता सुनिश्चित करने हेतु सुरक्षा उपाय
- निश्चित वरीयता क्रम: त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में मनमानी से बचने के लिए सरकार के गठन हेतु आमंत्रण का स्पष्ट वरीयता क्रम निर्धारित किया जाना चाहिए।
- अनिवार्य फ्लोर टेस्ट: विधानमंडल के बाहर होने वाली हेर-फेर की संभावनाओं को रोकने के लिए निश्चित समय सीमा के भीतर फ्लोर टेस्ट अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
- उदाहरण: शिवसेना–एनसीपी–कांग्रेस महाराष्ट्र मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 24 घंटे के भीतर फ्लोर टेस्ट कराने का निर्देश दिया था।
- लिखित कारणों का उल्लेख: राज्यपाल को सरकार के गठन हेतु आमंत्रण संबंधी निर्णयों के संवैधानिक कारण लिखित रूप में दर्ज करने चाहिए, ताकि पारदर्शिता एवं न्यायिक समीक्षा सुनिश्चित हो सके।
- उदाहरण: पुंछी आयोग ने राज्यपालीय विवेकाधिकार में कारणयुक्त निर्णय प्रक्रिया की सिफारिश की थी।
- नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार: मुख्यमंत्री से परामर्श अथवा किसी स्वतंत्र तंत्र के माध्यम से राज्यपाल की नियुक्ति किए जाने से राजनीतिक नियुक्तियों की धारणा कम हो सकती है।
- उदाहरण: प्रशासनिक सुधार आयोग ने राज्यपाल नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार का समर्थन किया था।
- संवैधानिक आचार संहिता: चुनाव पश्चात् राज्यपाल के आचरण को परिभाषित करने तथा विवेकाधिकार के दुरुपयोग को सीमित करने के लिए एक बाध्यकारी आचार संहिता बनाई जानी चाहिए।
- उदाहरण: सरकारिया एवं पुंछी आयोग दोनों ने राजभवन की कार्यप्रणाली हेतु संहिताबद्ध परंपराओं की आवश्यकता पर बल दिया था।
निष्कर्ष
भारतीय संघवाद का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि राज्यपाल निष्पक्ष संवैधानिक संरक्षक के रूप में कार्य करें, न कि राजनीतिक अभिकर्ता के रूप में। पारदर्शी परंपराएँ, त्वरित फ्लोर टेस्ट तथा जवाबदेह विवेकाधिकार लोकतांत्रिक वैधता को सुदृढ़ करेंगे और संसदीय शासन व्यवस्था में जनता के विश्वास को मजबूत बनाएँगे।