प्रश्न की मुख्य माँग
- दिव्यांगजनों के समक्ष आने वाली चुनौतियाँ, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का संदर्भ।
- प्रभावी समावेशन और समान भागीदारी के उपाय।
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उत्तर
भूमिका
भारत में दिव्यांगजन (PWDs) लंबे समय से कलंक और वंचितता का शिकार रहे हैं, जिसके कारण शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में उनकी पहुँच सीमित रही है। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act), 2016 ने दिव्यांगजनों को समान नागरिक के रूप में मान्यता दी और सुलभता, भेदभाव-निषेध उपायों तथा सकारात्मक भेदभाव को अनिवार्य किया।
मुख्य भाग
दिव्यांगजनों के समक्ष चुनौतियाँ (सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के संदर्भ सहित)
- सामाजिक कलंक और नकारात्मक पूर्वधारणाएँ: दिव्यांगजनों को प्रायः दया के पात्र या हीन दृष्टि से देखा जाता है और मीडिया उन्हें उपहास अथवा हास्य के रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे उनकी गरिमा को ठेस पहुँचती है।
- उदाहरण: निपुण मल्होत्रा बनाम सोनी पिक्चर्स फिल्म्स (वर्ष 2024) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मीडिया चित्रण को संवैधानिक मूल्यों और RPwD अधिनियम, 2016 का पालन करना चाहिए।
- समान भागीदारी में बाधा: शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक स्थानों पर सुलभता की कमी तथा प्रचलित सामाजिक धारणाओं के कारण दिव्यांगजनों की भागीदारी सीमित होती है।
- उदाहरण: सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ (वर्ष 2016) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद-21 के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, व्यक्तिगत गरिमा (जिसमें दिव्यांगजन भी शामिल हैं) को आहत नहीं कर सकती।
- कानूनी मान्यता बनाम क्रियान्वयन का अंतर: यद्यपि अनुच्छेद-15 और RPwD अधिनियम समानता और गरिमा की गारंटी देते हैं, लेकिन अपर्याप्त क्रियान्वयन के कारण दिव्यांगजन अब भी वंचितता से ग्रस्त हैं।
- सांस्कृतिक और ऐतिहासिक वर्जनाएँ: दिव्यांगता को अक्सर नैतिक दंड या व्यक्तिगत दुर्भाग्य माना जाता है, जिससे सामाजिक बहिष्कार मजबूत होता है।
- उदाहरण: भारतीय फिल्मों जैसे जीवन नैया (वर्ष 1936) और हास्य फिल्म प्यारे मोहन (वर्ष 2006) ने ऐसे पूर्वाग्रहों को और बढ़ावा दिया।
- भेदभाव और शोषण की संवेदनशीलता: दिव्यांगजन अनुपातहीन रूप से भेदभावपूर्ण प्रथाओं, उत्पीड़न और दैनिक जीवन एवं नागरिक भागीदारी से बहिष्कार के शिकार होते हैं।
- उदाहरण: इंडिब्ली क्रिएटिव बनाम पश्चिम बंगाल सरकार (वर्ष 2019) में न्यायालय ने कहा कि वंचित समूहों को निशाना बनाने वाला व्यंग्य अनुच्छेद-19(2) के तहत संवैधानिक सुरक्षा से ऊपर नहीं हो सकता।
प्रभावी समावेशन और समान भागीदारी के लिए उपाय
- गरिमापूर्ण और समावेशी प्रतिनिधित्व: मीडिया में सकारात्मक चित्रण को बढ़ावा देना, रूढ़िवादिता हटाना और दिव्यांगजनों की क्षमता, उपलब्धियों एवं स्वायत्तता को उजागर करना।
- कानूनी एवं नीतिगत ढाँचों को मजबूत करना: RPwD अधिनियम का सख्त क्रियान्वयन सुनिश्चित करना, सुलभ अवसंरचना बनाना और शिक्षा, रोजगार एवं सार्वजनिक स्थलों में समानता की निगरानी व्यवस्था लागू करना।
- सुलभ शिक्षा और कौशल विकास: समावेशी पाठ्यक्रम, सहायक तकनीकों और व्यावसायिक प्रशिक्षण के माध्यम से दिव्यांगजनों को आर्थिक आत्मनिर्भरता हेतु सक्षम बनाना।
- जागरूकता और संवेदनशीलता कार्यक्रम: सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने के लिए सार्वजनिक अभियान चलाना, जिनका फोकस गरिमा, अधिकारों और दिव्यांगजनों के संभावित योगदान पर हो।
- शासन और निर्णय-निर्माण में सक्रिय भागीदारी: नीति निर्माण, परामर्श बोर्डों और समितियों में दिव्यांगजनों को शामिल करना ताकि नीतियाँ उनकी आवश्यकताओं तथा प्राथमिकताओं को परिलक्षित कर सकें।
- सामाजिक और तकनीकी सहयोग: सहायक उपकरणों को बढ़ावा देना, बाधारहित सार्वजनिक स्थल और डिजिटल सुलभता सुनिश्चित करना ताकि गतिशीलता, संवाद और सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी बढ़ सके।
निष्कर्ष
प्रभावी समावेशन के लिए आवश्यक है कि समाज के दृष्टिकोण में परिवर्तन आए, अवसंरचना सुलभ हो और समावेशी नीतियों का सही क्रियान्वयन हो। समान अवसर और जागरूकता को बढ़ावा देकर दिव्यांगजन पूर्ण रूप से समाज में भाग ले सकेंगे, जिससे एक सच्चे अर्थों में समावेशी समाज का निर्माण होगा।