Q. हिरोशिमा और नागासाकी के 80 वर्ष बाद भी, परमाणु हथियार वैश्विक सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा बने हुए हैं। परमाणु शस्त्रागारों द्वारा उत्पन्न समकालीन चुनौतियों पर चर्चा कीजिए, मौजूदा परमाणु शासन तंत्रों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन कीजिए, साथ ही भविष्य में किसी भी परमाणु दुष्परिणाम को रोकने के लिए रणनीतियों को प्रस्तावित कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • परमाणु शस्त्रागार द्वारा उत्पन्न समकालीन चुनौतियों पर चर्चा कीजिए।
  • मौजूदा परमाणु शासन तंत्र की प्रभावशीलता।
  • मौजूदा परमाणु शासन तंत्र की सीमाएँ।
  • भविष्य में किसी भी परमाणु दुर्घटना को रोकने के लिए रणनीतियां सुझाइये।

उत्तर

वर्ष 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए जाने के बाद, जिनमें प्रत्यक्ष रूप से और विकिरण जनित बीमारियों से 2 लाख से अधिक लोग मारे गए, परमाणु हथियारों का युद्ध में उपयोग नहीं हुआ है। नॉन-यूज की परंपरा के बावजूद, बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, परमाणु आधुनिकीकरण और कमज़ोर अंतरराष्ट्रीय शासन अब वैश्विक सुरक्षा के लिए ख़तरा बन गए हैं। भविष्य में परमाणु तबाही को रोकने के लिए निरस्त्रीकरण, प्रतिरोध और कूटनीति में तत्काल सुधार की आवश्यकता है।

परमाणु शस्त्रागार द्वारा उत्पन्न समकालीन चुनौतियाँ

  • परमाणु आधुनिकीकरण और सामरिक हथियार: परमाणु वितरण प्रणालियों में निरंतर नवाचार हथियारों को अधिक “प्रयोग योग्य” और सटीक रूप से लक्षित बना रहे हैं।
    • उदाहरण के लिए: रूस और अमेरिका हाइपरसोनिक, कम क्षमता वाले सामरिक परमाणु हथियारों के साथ अपने शस्त्रागार को उन्नत कर रहे हैं, जिससे युद्ध आरंभ की सीमाएँ धुंधली हो रही हैं।
  • वैश्विक मानदंडों का टूटना और खतरों की अतिशयोक्ति: क्षेत्रीय संघर्षों में परमाणु धमकियां, कूटनीतिक औज़ार बनते जा रहे हैं, जिससे प्रतिवारण स्थिरता क्षीण होती जा रही है। 
    • उदाहरण: रूस द्वारा यूक्रेन युद्ध में परमाणु धमकी;वर्ष  2019 के बालाकोट हमलों के दौरान पाकिस्तान के “परमाणु ब्लैकमेल” के ख़िलाफ़ भारत की चेतावनी।
  • उपयोग पर कानूनी प्रतिबन्ध का अभाव: कोई भी अंतरराष्ट्रीय संधि, स्पष्ट रूप से परमाणु हथियारों के उपयोग पर प्रतिबन्ध नहीं लगाती, यहां तक कि प्रथम प्रहार के लिए भी नहीं।
    • उदाहरण: NPT (वर्ष 1968) प्रसार को सीमित करता है, लेकिन उपयोग को नहीं; CTBT (वर्ष 1996) परीक्षणों पर प्रतिबंध लगाता है, हथियारों पर नहीं, वर्ष  2017 प्रतिबंध संधि में परमाणु धारक देशों के हस्ताक्षर नहीं है।
  • गलत आकलन और दुर्घटनाओं का बढ़ता जोखिम: परमाणु दुर्घटनाएँ गलतफहमी, प्रणालीगत विफलता या मानवीय त्रुटि के कारण हो सकती हैं। 
    • उदाहरण: कैसल ब्रावो परीक्षण (वर्ष 1954) में 86 मील दूर मौजूद कुछ जापानी मछुआरे विकिरण के संपर्क में आये थे; अनजाने विकिरण के प्रभाव का जोखिम अभी भी वास्तविक है।
  • राजनीतिक संकेतों का हथियारीकरण: परमाणु बयानबाजी का उपयोग, दबाव‌ वाली कूटनीति और शक्ति प्रदर्शन के लिए तेजी से हो रहा है। 
    • उदाहरण के लिए: उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण अक्सर भू-राजनीतिक रियायतें प्राप्त करने के लिए अमेरिका-दक्षिण कोरिया के युद्धाभ्यास के साथ मेल खाते हैं।

मौजूदा परमाणु शासन तंत्र की प्रभावशीलता

  • क्षैतिज प्रसार पर नियंत्रण: NPT जैसी संधियों ने नए राष्ट्रों के परमाणु हथियारों के प्रसार को सीमित कर दिया है।
  • शांतिपूर्ण उपयोग और निगरानी में IAEA की संस्थागत भूमिका: अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी, निरीक्षणों के माध्यम से अनुपालन सुनिश्चित करते हुए असैन्य परमाणु ऊर्जा को सुगम बनाती है। 
    • उदाहरण के लिए: IAEA के सुरक्षा उपायों ने 2018 में अमेरिका के हटने तक ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) को सत्यापित करने में मदद की।
  • CTBT के माध्यम से परमाणु परीक्षण के विरुद्ध मानदंडों को बढ़ावा देना: औपचारिक प्रवर्तन के बिना भी, CTBT ने परमाणु परीक्षण के विरुद्ध एक मज़बूत वैश्विक मानदंड को बढ़ावा दिया है। 
    • उदाहरण के लिए: 180 से अधिक देशों ने CTBT पर हस्ताक्षर किए हैं।
  • निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाएँ सामग्री की जवाबदेही बढ़ाती हैं: NSG, MTCR और वासेनार व्यवस्था जैसे बहुपक्षीय समूह संवेदनशील टेक ट्रांसफर को विनियमित करने में मदद करते हैं। 
    • उदाहरण: MTCR में भारत के शामिल होने से पारदर्शिता सुनिश्चित करते हुए मिसाइल प्रौद्योगिकियों तक उसकी पहुँच में सुधार हुआ है।
  • अवैध प्रसार पर रोक लगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के बाध्यकारी प्रस्ताव अवैध कार्यक्रमों पर कानूनी और राजनीतिक नियंत्रण के रूप में कार्य करते हैं। 
    • उदाहरण: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1718 ने उत्तर कोरिया पर उसके परमाणु परीक्षणों के बाद प्रतिबंध लगाए।
  • हिबाकुशा के बचे लोगों द्वारा नैतिक रोकथाम: परमाणु बम विस्फोट में बचे लोगों की गवाही मानवीय स्मृति को जीवित रखती है। 
    • उदाहरण: निहोन हिदानक्यो को विश्व स्तर पर परमाणु-विरोधी जागरूकता फैलाने के लिए 2024 का नोबेल शांति पुरस्कार मिला ।

मौजूदा परमाणु शासन तंत्र की सीमाएँ

  • NPT व्यवस्था का भेदभावपूर्ण स्वरूप: परमाणु अप्रसार संधि (NPT) परमाणु हथियार संपन्न देशों के विशेषाधिकारों को स्थायी बनाकर एक द्वि-स्तरीय वैश्विक व्यवस्था का निर्माण करती है। 
    • उदाहरण: भारत, NPT पर हस्ताक्षरकर्ता नहीं है क्योंकि यह केवल पाँच परमाणु शक्तियों (P5) को ही वैधता देती है और भारत तथा इज़राइल जैसे अन्य देशों को इससे बाहर रखती है।
  • सार्वभौमिकता और प्रवर्तन तंत्र का अभाव: भारत, पाकिस्तान, इजरायल और उत्तर कोरिया सहित प्रमुख राष्ट्र प्रमुख संधियों से बाहर हैं, जिससे उनकी वैश्विक प्रवर्तनीयता कमजोर हो रही है।
  • नई चुनौतियों का समाधान करने में विफलता: वर्तमान संधियाँ कम क्षमता वाले वारहेड, AI-आधारित प्रक्षेपण प्रणालियाँ या हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों को शामिल नहीं करती हैं।
  • पुराने हो चुके सत्यापन और निगरानी उपकरण: IAEA सुरक्षा उपायों जैसे तंत्र घोषित सामग्रियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं और गुप्त या दोहरे उपयोग वाले प्रौद्योगिकी विकासों को नजरअंदाज़ कर देते हैं। 
    • उदाहरण के लिए: IAEA के निरीक्षण के बावजूद ईरान का गुप्त परमाणु कार्यक्रम वर्षों तक जारी रहा।
  • CTBT और FMCT की अप्रभावीता: व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) लागू नहीं हुई है; विखंडनीय पदार्थ नियंत्रण संधि (FMCT) पर वार्ता अभी भी रुकी हुई है। 
    • उदाहरण: चीन और अमेरिका ने CTBT की पुष्टि नहीं की है, और निरस्त्रीकरण सम्मेलन में FMCT अभी भी अवरुद्ध है।
  • वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में सीमित प्रतिनिधित्व: NSG और MTCR जैसी निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं पर पश्चिमी शक्तियों का वर्चस्व है, जिससे ग्लोबल साउथ के हित दरकिनार हो जाते हैं, भारत को चीन के विरोध के कारण NSG से बाहर रखा गया।

भविष्य में परमाणु दुर्घटना को रोकने की रणनीतियाँ

  • कानूनी और मानक ढाँचे को सुदृढ़ करना: मौजूदा संधियों को मजबूत करना और परमाणु-सशस्त्र राज्यों को बाध्यकारी व्यवस्थाओं में एकीकृत करना चाहिए।
  • विश्व स्तर पर नो-फर्स्ट यूज़ (NFU) सिद्धांत को बढ़ावा देना: NFU, पहले होने वाले हमले की प्रवृत्ति को रोकने के लिए एक विश्वास-निर्माण उपाय के रूप में काम कर सकता है। 
    • उदाहरण के लिए: भारत की NFU नीति, चीन की अस्पष्टता और पाकिस्तान की पहले उपयोग की धमकी के विपरीत एक कूटनीतिक मॉडल के रूप में कार्य कर सकती है।
  • निरस्त्रीकरण कूटनीति को पुनर्जीवित करना: विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय मंचों पर निरस्त्रीकरण वार्ता को फिर से सक्रिय किया जाना चाहिए। 
    • उदाहरण: संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण सम्मेलन और परमाणु अप्रसार संधि पुनरावलोकन सम्मेलनों को कार्यान्वयन योग्य, समयबद्ध निरस्त्रीकरण लक्ष्य अपनाने चाहिए।
  • संकटकालीन संवाद माध्यमों को संस्थागत बनाना: संकटकालीन क्षणों में संवाद से विनाशकारी घटनाओं को टाला जा सकता है। 
    • उदाहरण के लिए: अमेरिका-रूस “परमाणु हॉटलाइन” मॉडल को भारत-चीन और अमेरिका-चीन जैसे अन्य देशों तक भी विस्तारित करना चाहिए‌।
  • विकिरण प्रभाव पर ज्ञान की कमी को दूर करना: परमाणु प्रभाव की जागरूकता को मुख्यधारा में लाना आवश्यक है ताकि इसके दीर्घकालिक परिणामों को उजागर करके इसके उपयोग को रोका जा सके।
    • उदाहरण के लिए: कैसल ब्रावो और हिरोशिमा के बाद हुई विकिरण मृत्यु घटनाओं से मिले सबक को फिर से जन चेतना में लाना होगा।
  • अंतरराष्ट्रीय कानूनी जवाबदेही को सुदृढ़ करना: अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की परामर्शी राय को बाध्यकारी कानूनी सिद्धांत में बदलने के लिए आम सहमति बनानी चाहिए।
    • उदाहरण के लिए: संयुक्त राष्ट्र महासभा, मानवतावादी कानून पर आधारित एक प्रस्ताव पारित कर सकती है, जिससे प्रथागत कानून के तहत परमाणु उपयोग अवैध हो जाएगा।

निष्कर्ष

विश्व 80 वर्षों से परमाणु युद्ध से बचता रहा है, लेकिन यह स्थिति संवेदनशील शांति अनिश्चित प्रतिवारण पर टिकी है, न कि मज़बूत निरस्त्रीकरण पर। हिरोशिमा, नागासाकी और परमाणु परीक्षणों के अदृश्य पीड़ितों की स्मृतियाँ एक ऐसे वैश्विक आंदोलन की माँग करती हैं जो क़ानूनी, नैतिक और कूटनीतिक आधारों पर खड़ा हो। एक परमाणु-मुक्त विश्व कोई आदर्श कल्पना नहीं है बल्कि यह मानवता के शांतिपूर्ण और सुरक्षित सह-अस्तित्व के लिए एक आवश्यकता है।

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