प्रश्न की मुख्य माँग
- धर्मांतरित जनजातियों को ‘सूची से हटाने के पक्ष में तर्क।
- धर्मांतरित जनजातियों को ‘सूची से हटाने के विपक्ष में तर्क।
- जनजातीय पहचान और आरक्षण लाभों के संबंध आगे की राह मार्ग।
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उत्तर
परिचय
भारत के जनजातीय समुदायों को उनके विशिष्ट सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहचान के आधार पर संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। हालाँकि, धार्मिक परिवर्तन (धर्मांतरण) का अनुसूचित जनजाति (ST) दर्जे पर क्या प्रभाव होगा—इस संबंध में स्पष्ट प्रावधानों के अभाव ने धर्मांतरित जनजातियों की डी-लिस्टिंग (सूची से हटाने) को लेकर एक दीर्घकालिक बहस को जन्म दिया है।
डी-लिस्टिंग (सूची से हटाने) के पक्ष में तर्क
- सांस्कृतिक क्षति: धर्मांतरण से जनजातीय परंपराएँ, रीति-रिवाज और आस्था संबंधी प्रथाएँ कमजोर हो सकती हैं, जो अनुसूचित जनजाति (ST) की पहचान का आधार हैं।
- उदाहरण: कार्तिक उराँव समिति ने तर्क दिया कि धर्मांतरित लोग अक्सर पारंपरिक जनजातीय धार्मिक प्रथाओं और रीति-रिवाजों का पालन छोड़ देते हैं।
- लाभों का विचलन: अपेक्षाकृत अधिक विकसित वर्ग आरक्षण लाभों का बड़ा हिस्सा प्राप्त कर सकता है, जिससे सबसे वंचित जनजातीय समुदाय वंचित रह जाते हैं।
- उदाहरण: कार्तिक उराँव समिति के अनुसार, लगभग 10% धर्मांतरित जनजातियाँ लगभग 70% आरक्षण लाभों का उपयोग करती हैं।
- संवैधानिक स्पष्टता: अनुसूचित जातियों के विपरीत, अनुसूचित जनजातियों के प्रावधानों में धर्मांतरण के प्रभाव को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं।
- उदाहरण: संवैधानिक (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 धर्म के आधार पर अनुसूचित जाति दर्जे को सीमित करता है, जबकि संवैधानिक (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 इस विषय पर मौन है।
- जनजातीय संरक्षण: डी-लिस्टिंग (सूची से हटाने) को स्वदेशी संस्कृति, परंपराओं और पारंपरिक संस्थाओं की रक्षा के उपाय के रूप में देखा जाता है।
- उदाहरण: लोकुर समिति ने विशिष्ट संस्कृति और पारंपरिक जीवन शैली को जनजातीय पहचान का प्रमुख आधार माना।
- विधायी अधिकारिता: किसी भी परिवर्तन को संविधान के अनुच्छेद-342 के तहत संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से ही किया जा सकता है, न कि कार्यपालिका के विवेक से।
सूची से हटाने (डी-लिस्टिंग) के विरुद्ध तर्क
- मूल-आधारित पहचान: जनजातीय दर्जा जन्म, वंश और सामुदायिक सदस्यता पर आधारित होता है, न कि केवल धार्मिक संबद्धता पर।
- धार्मिक स्वतंत्रता: धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जनजाति दर्जा समाप्त करना व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता को परोक्ष रूप से दंडित करने जैसा हो सकता है।
- उदाहरण: अनुच्छेद-25 के तहत अंतःकरण की स्वतंत्रता, धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार दिया गया है।
- समानता से संबंधित चिंताएँ: धर्म के आधार पर बहिष्करण, संविधान के समानता और गैर-भेदभाव के सिद्धांतों के विरुद्ध हो सकता है।
- उदाहरण: अनुच्छेद-14, 15 और 16 समानता और आरक्षण (सकारात्मक कार्रवाई) के सिद्धांतों की रक्षा करते हैं।
- न्यायिक दृष्टिकोण: न्यायालयों ने केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर जनजातीय पहचान समाप्त करने को स्वीकार नहीं किया है।
- उदाहरण: “केरल राज्य बनाम चंद्रमोहनन (2004)” वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा गया कि केवल धर्म परिवर्तन से अनुसूचित जनजाति दर्जा स्वतः समाप्त नहीं होता।
- लगातार पिछड़ापन: धर्म परिवर्तन के बाद भी सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन अक्सर बना रहता है।
- उदाहरण: “सूसाई बनाम भारत संघ” (SCs संदर्भ) में यह संकेत दिया गया कि केवल धर्म परिवर्तन से ऐतिहासिक सामाजिक वंचना समाप्त नहीं होती है।
आगे की राह
- स्पष्ट मानदंड: धर्मांतरण के बाद अनुसूचित जनजाति संबंधी लाभ जारी रखने या समाप्त करने के लिए वस्तुनिष्ठ और स्पष्ट मानदंड निर्धारित किए जाने चाहिए।
- उदाहरण: अनुच्छेद-342 के तहत संसद द्वारा समीक्षा के माध्यम से मापनीय संकेतकों को परिभाषित किया जा सकता है।
- साक्ष्य-आधारित अध्ययन: धर्मांतरित और गैर-धर्मांतरित जनजातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक अध्ययन किया जाना चाहिए।
- लाभों का लक्षित वितरण: आरक्षण लाभों की सबसे अधिक वंचित जनजातीय समूहों तक पहुँच सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- उदाहरण: अनुसूचित जनजाति आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण (Sub-categorisation) से आंतरिक असमानताओं को कम किया जा सकता है।
- न्यायिक मार्गदर्शन: जनजातीय पहचान और धर्मांतरण के संबंध पर संवैधानिक स्पष्टता हेतु न्यायालय से प्रामाणिक व्याख्या प्राप्त की जानी चाहिए।
- सांस्कृतिक संरक्षण: धर्म से परे जाकर जनजातीय भाषाओं, परंपराओं और संस्थाओं का संरक्षण तथा संवर्द्धन किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: पाँचवीं अनुसूची, पेसा (PESA) अधिनियम 1996 और जनजातीय कल्याण योजनाओं के माध्यम से समर्थन।
निष्कर्ष
धर्मांतरित जनजातियों को डी-लिस्टिंग (सूची से हटाने) का प्रश्न जनजातीय पहचान, धार्मिक स्वतंत्रता और सकारात्मक भेदभाव (आरक्षण) के जटिल अंतर्संबंध से जुड़ा हुआ है। इस विषय पर किसी भी सुधारात्मक कदम में सांस्कृतिक संरक्षण और संवैधानिक समानता के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है, ताकि अनुसूचित जनजाति लाभों का निर्धारण धर्म के बजाय वास्तविक जनजातीय वंचना तथा पिछड़ेपन को केंद्र में रखकर किया जा सके।