प्रश्न की मुख्य माँग
- ऑरेंज इकोनॉमी के आर्थिक महत्त्व का वर्णन कीजिए।
- इस क्षेत्र को पेश आने वाली चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।
- क्षमता के दोहन के उपाय सुझाइए।
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उत्तर
केंद्रीय बजट 2026-27 में विचारों, संस्कृति और बौद्धिक संपदा से संचालित रचनात्मक क्षेत्र ‘ऑरेंज इकोनॉमी’ को विकास के एक महत्त्वपूर्ण इंजन के रूप में औपचारिक रूप से मान्यता दी गई। सरकार ने AVGC क्षेत्र (एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और कॉमिक्स) जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करते हुए भारत की सांस्कृतिक पूँजी का लाभ उठाकर उच्च गुणक रोजगार और वैश्विक सॉफ्ट पॉवर को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखा है।
ऑरेंज इकोनॉमी का आर्थिक महत्त्व
- रोजगार सृजन का इंजन: रचनात्मक क्षेत्र भारत के युवाओं के लिए एक विशाल अवसर प्रदान करता है, जहाँ पारंपरिक विनिर्माण क्षेत्र उतनी संख्या में प्रतिभाओं को समाहित नहीं कर पाता।
- उदाहरण: केवल AVGC (एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और कॉमिक्स) क्षेत्र को ही वर्ष 2030 तक लगभग 20 लाख पेशेवरों की आवश्यकता होगी।
- उच्च गुणक प्रभाव: कॉन्सर्ट इकोनॉमी जैसे बड़े पैमाने पर रचनात्मक उद्यम पर्यटन, परिवहन और आतिथ्य क्षेत्र में द्वितीयक विकास को बढ़ावा देते हैं।
- उदाहरण: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने लाइव मनोरंजन को एक उच्च गुणक गतिविधि बताया है, जो शहरी सेवा क्षेत्र के विकास को समर्थन देती है।
- सॉफ्ट पॉवर का निर्यात: भारतीय फिल्में, संगीत और डिजिटल कंटेंट वैश्विक मंच पर भारत की सांस्कृतिक उपस्थिति को लगातार बढ़ा रहे हैं, जिससे रचनात्मकता एक स्थायी निर्यात में परिवर्तित हो रही है।
- उदाहरण: मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र का मूल्य वर्ष 2024 में अनुमानित ₹2.5 ट्रिलियन आँका गया, जो इसे सेवा अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ दर्शाता है।
- नवाचार और बौद्धिक संपदा निर्माण: सेवा आउटसोर्सिंग से आगे बढ़ते हुए मूल बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) के निर्माण की दिशा में परिवर्तन, दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती की नींव रखता है।
- उदाहरण: इस क्षेत्र की औपचारिक मान्यता का उद्देश्य भारत को VFX के वैश्विक बैक-ऑफिस से आगे बढ़ाकर मूल सामग्री और गेमिंग बौद्धिक संपदा केंद्र में परिवर्तित करना है।
इस क्षेत्र में आने वाली चुनौतियाँ
- गंभीर प्रतिभा की कमी: माँग होने के बावजूद ऐसे बहु-विषयक पेशेवरों की भारी कमी है, जो तकनीकी AI कौशल को रचनात्मक सोच के साथ जोड़ सकें।
- अपर्याप्त आयोजन स्थल अवसंरचना: “कॉन्सर्ट इकोनॉमी” को बड़े स्तर पर विस्तार देने में बाधा आती है, क्योंकि विश्व स्तरीय स्थलों की कमी और जटिल मल्टी-विंडो नियामक प्रक्रियाएँ विकास को सीमित कर देती हैं।
- बौद्धिक संपदा की चोरी: बौद्धिक संपदा अधिकारों के प्रवर्तन की कमजोर प्रणाली और डिजिटल पायरेसी की व्यापकता, रचनात्मक कार्यों की आर्थिक उपयोगिता को कम कर देती है।
- सीमित प्रारंभिक अवसर: लंबे समय तक रचनात्मक क्षेत्रों को केवल एक “जोखिमभरा शौक” माना जाता था, जिससे प्रशिक्षण पाठ्यक्रम पुराने और अप्रासंगिक बने रहे।
- लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए वित्तपोषण की कमी: रचनात्मक स्टार्ट-अप के पास अक्सर संपार्श्विक के रूप में उपयोग करने के लिए “स्थायी संपत्ति” की कमी होती है, जिससे पारंपरिक बैंक वित्तपोषण प्राप्त करना कठिन हो जाता है।
क्षमता-दोहन के उपाय
- रचनात्मक कौशल को मुख्यधारा में लाना: स्कूली शिक्षा के बुनियादी पाठ्यक्रम में रचनात्मक तकनीकों को शामिल करना, ताकि क्रिएटर इकोनॉमी तक सभी की पहुँच सुनिश्चित की जा सके।
- उदाहरण: बजट प्रस्ताव के अनुसार, IICT मुंबई के माध्यम से 15,000 माध्यमिक विद्यालयों और 500 कॉलेजों में कंटेंट क्रिएटर लैब्स की स्थापना की जाएगी।
- क्षेत्रीय केंद्रों का विकास: प्रतिभा की कमी को दूर करने और क्षेत्रीय सांस्कृतिक निर्यात को बढ़ावा देने के लिए उपेक्षित क्षेत्रों में उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करना।
- उदाहरण: पूर्वी भारत में नया राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान (NID) स्थापित करने का प्रस्ताव क्षेत्रीय डिजाइन शिक्षा को मजबूती देने की दिशा में एक कदम है।
- उभरती तकनीकों का लाभ उठाना: रचनात्मक क्षेत्र को वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में आगे लाने के लिए उसमें AI और इमर्सिव मीडिया जैसी तकनीकों को बुनियादी ढाँचे के रूप में एकीकृत करना।
- उदाहरण: AI मिशन और नेशनल क्वांटम मिशन को ऑरेंज इकोनॉमी की वृद्धि के दो प्रमुख स्तंभों के रूप में पहचाना गया है।
- नियामक ढाँचे का औपचारीकरण: आयोजनों और समाग्री (कंटेंट) से जुड़ी लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं को सरल और पारदर्शी बनाना, ताकि रचनाकारों को नौकरशाही बाधाओं से राहत मिल सके।
निष्कर्ष
वर्ष 2026-27 का बजट “कर्तव्य-प्रेरित” दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो ऑरेंज इकोनॉमी को हाशिए से निकालकर वित्तीय मुख्यधारा में लाने का प्रयास करता है। इस परिवर्तन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या भारत “रचनात्मक सेवाओं के भंडार” से आगे बढ़कर “रचनात्मक नवाचार की वैश्विक प्रयोगशाला” बन सकता है। मूलभूत कौशल और संस्थागत अवसंरचना में निवेश करके, भारत विश्व की सबसे जीवंत रचनात्मक क्रांति का नेतृत्व करने के लिए तैयार है।